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प्रणव दा और राहुल गांधी का कर्त्तव्य सम्बन्ध

तीन दिन बाद 11 दिसम्बर आने वाला है जो कि स्व. राष्ट्रपति और वर्तमान सदी के राजनेता ( स्टेट्समैन) श्री प्रणव मुखर्जी का जन्मदिन होता है। जब तक प्रणव दा जीवित रहे 2004 से मैं हर वर्ष उनके जन्मदिवस पर पंजाब केसरी में ही ‘बधाई लेख’ लिख कर उनकी राजनीति की कुछ पर्तें खोलता रहा और बताता रहा कि उनके बारे में कुछ अंग्रेजी अखबारों द्वारा स्थापित की गई यह अवधारणा पूरी तरह तथ्यों के विपरीत है कि वह एक ‘ड्राइंग रूम पालिटिशियन’ हैं। संयोग से 2004 में ही पहली बार प्रणव दा प. बंगाल की जंगीपुर की सीट से लोकसभा चुनाव भी सवा लाख से अधिक मतों से जीते थे। इस वर्ष उनके चुनाव क्षेत्र का दौरा करने जब मैं जंगीपुर गया था तो बांग्ला भाषा में उनके द्वारा चुनाव सभाओं के सम्बोधन को सुनकर उनके बारे मंे मेरा अखबारों की खबरों पर आधारित यह मत बुरी तरह खंड- खंड हो गया कि वह जनता के नेता नहीं बल्कि शिखर राजनीति के कुशल खिलाड़ी हैं।
बांग्ला भाषा में उनके ओजस्वी भाषणों की तुलना उत्तर भारत के किसी लोकप्रिय राजनीतिज्ञ से ही की जा सकती थी। प्रणव दा निश्चित रूप से वैचारिक रूप से क्रान्तिकारी गांधीवादी नेता थे जो पाइप पीने के भी 2004 तक शौकीन रहे मगर इसी वर्ष उन्होंने तम्बाकू को छोड़ दिया और फिर कभी हाथ नहीं लगाया। अपने ग्रामीण संस्कारों से बंधे प्रणव दा को पूरे दिन का काम निपटाने के बाद निजी डायरी लिखने की आदत थी जिसे उन्होंने राष्ट्रपति पद से रिटायर होने के बाद तक लिखा मगर श्री मुखर्जी ने अपने जीते जी ही यह भी घोषणा कर दी थी कि उनकी इस निजी डायरी पर उनकी एकमात्र पुत्री शर्मिष्ठा का अधिकार होगा। इसी डायरी के अंशों के आधार पर शर्मिष्ठा मुखर्जी ने उनकी मृत्यु के तीन साल बाद अब एक पुस्तक ‘प्रणव मुखर्जी, मेरे पिता-एक पुत्री के स्मरण’ लिखी है जिसे रूपी प्रकाशन ने स्व. दादा द्वारा लिखी गई पुस्तकों की भांति ही प्रकाशित किया है। इस पुस्तक में दादा की डायरी के आधार पर शर्मिष्ठा जी ने कहा है कि श्री मुखर्जी को डा. मनमोहन सिंह सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा एक सरकारी अध्यादेश को सरेआम एक प्रेस कांफ्रेंस मंे फाड़ कर फेंकने से इतना अचम्भा हुआ कि उन्होंने अपनी डायरी में लिखा कि राहुल गांधी का अध्यादेश को फाड़ा जाना किसी नाटक से कम नहीं था। इस घटना से प्रणव दा को यहां तक महसूस हुआ कि राजनी​ित राहुल गांधी के बस का खेल नहीं है। प्रणव दा को बहुत दूरदर्शी राजनीतिज्ञ माना जाता था। शर्मिष्ठा जी ने अपनी पुस्तक मंे इस रहस्य से भी पर्दा उठा दिया है कि केन्द्र मंे 2004 के चुनावों के बाद कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए गठबन्धन के गठित होने के बाद और इसे पूर्ण बहुमत मिलने के बाद कांग्रेस में सर्वाधिक धीर-गंभीर और वरिष्ठतम होने के बावजूद इस गठबन्धन को पूर्ण बहुमत मिलने पर श्रीमती सोनिया गांधी ने उन्हें प्रधानमन्त्री क्यों नहीं बनाया? इसकी वजह प्रणव दा ने अपने हाथ से लिखी है कि सोनिया गांधी व डा. मनमोहन सिंह के सम्बन्ध बहुत घनिष्ठ थे। इसका प्रमाण हम 2004 से पहले की राजनीति में भी देख सकते हैं। डा. मनमोहन सिंह 2004 तक वाजपेयी सरकार के सत्ता में रहने तक राज्यसभा में विपक्ष के नेता थे और प्रणव दा इसी सदन में मनमोहन सिंह से बहुत वरिष्ठ होने के बावजूद उपनेता या मुख्य सचेतक बनाये गये थे। प्रणव दा को 1969 में कांग्रेस में लाने वाली कोई और नहीं बल्कि स्वयं इन्दिरा गांधी ही थीं। प्रणव दा के निवास के कार्यालय मंे इन्दिरा जी के साथ उनकी पुरानी फोटो हमेशा लगी रहती थी। वह इंदिरा गांधी के एक समय में सबसे निकटतम व विश्वासपात्र नेता समझे जाते थे। इन्दिरा गांधी ने 1980 में उन्हें वित्तमन्त्री बनाने के लिए यह पुरानी परंपरा तोड़ दी थी कि वित्तमन्त्री केवल लोकसभा सदस्य बनना चाहिए। उन्होंने इंदिरा जी को अच्छे और खराब मूड (इमरजेंसी हटने पर हारने के बाद) दोनों में ही करीब से देखा था। शर्मिष्ठा जी ने पुस्तक मंे दादा का हवाला देते हुए लिखा है कि उनके पिता ने स्व. इंदिरा गांधी व वर्तमान प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी मंे काफी समानताएं देखीं थी।
सबसे बड़ी समानता यह थी कि इन्दिरा जी की तरह ही नरेन्द्र मोदी भी देश की जनता का दिल और दिमाग जानने व पढ़ने में पूरी तरह निपुण हैं। प्रणव दा हालांकि स्वयं दिल से बहुत ही साफ और बहुत सुलझे इंसान थे। जिन लोगों को उन्हें करीब से जानने का अवसर मिला वे जरूर जानते होंगे कि वह किसी घाघ राजनीतिज्ञ की तरह अपने चहरे के भावों को छिपा पाने में असमर्थ रहते थे। उन्हें गलत बात पर गुस्सा भी बहुत जल्दी आता था और मनमाफिक बात होने पर उनके चेहरे पर बाल सुलभ खुशी भी बहुत जल्दी चमक जाती थी। मगर अपने साथी सत्ता पक्ष व विपक्ष के राजनीतिज्ञों को पढ़ने में भी उनका सानी नहीं था। अतः नरेन्द्र मोदी के बारे में उनका आकलन उनकी मृत्यु के बाद भी आज तक सही साबित हो रहा है। श्री मोदी यदि जनता के मन को पढ़ना न जानते तो चुनाव पर चुनाव न जीतते जाते और आम जनता में इतने लोकप्रिय भी न हो पाते। जिस नोटबन्दी को लेकर विपक्षी दल नरेन्द्र मोदी की कड़ी आलोचना आज तक करते हैं , उसके सामाजिक व मनोवैज्ञानिक प्रभावों का आकलन श्री मोदी ने इसकी घोषणा करने से पहले नहीं कर लिया होगा? एेसा ​विश्वास के साथ कौन कह सकता है क्योंकि इस घोषणा के बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा की एेसी धुआंधार विजय हुई कि इसने सारे पिछले कांग्रेसी रिकार्डों को भी तोड़ते हुए तीन चौथाई से ऊपर बहुमत प्राप्त किया। इसलिए प्रणव दा ने राहुल गांधी के बारे में जो आकलन किया वह निश्चित रूप से उस समय तथ्यपरक रहा होगा। उन्होंने अपनी डायरी में लिखा कि राहुल बहुत ही सभ्य और जिज्ञासा से भरे व्यक्ति हैं । उनमें बहुत सवाल दोड़ते रहते हैं परन्तु उन्हें अभी राजनीति में परिपक्व होने की जरूरत है। उनका अध्यादेश को फाड़ना दादा की निगाह में अनुचित था जो कि सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ लाया गया था कि यदि किसी विधायक या सांसद के विरुद्ध फौजदारी मुकदमा में सजा हो जाती है तो उसकी सदस्यता उसी समय से समाप्त हो जायेगी। तब की केन्द्र सरकार इस फैसले के विपरीत ही अध्यादेश लाई थी। मगर यह कैसा संयोग बना कि इसके लगभग एक दशक बाद स्वयं राहुल गांधी ही इस कानून के शिकार बने क्योंकि आपराधिक अवमानना के मुकदमें में उन्हें दो साल की सजा गुजरात की एक निचली अदालत ने सुना दी थी। इस सजा के आते ही उनकी लोकसभा सदस्यता समाप्त कर दी गई थी जिस पर बाद में सर्वोच्च न्यायालय से मोहल्लत मिली। मैंने अभी पुस्तक पढ़ी नहीं है। अतः मैं नहीं जानता कि प्रणव दा ने अपनी डायरी में 2008 में हुए भारत- अमेरिकी परमाणु करार के बारे में क्या लिखा है क्योंकि उस समय देश के विदेश मन्त्री के रूप में भारत की ओर से यह समझौता प्रणव दा ने ही किया था और इस प्रकार किया था कि अमेरिका जैसी महाशक्ति को भी नाकों चने चबाने पड़ गये थे। यह प्रणव मुखर्जी का ही दम था कि उन्होंने वाशिंगटन जाकर अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश से साफ कह दिया था कि भारत तब तक इस समझौते पर हस्ताक्षर नहीं कर सकता जब तक कि उसकी संसद इसकी इजाजत न दे , हालांकि भारत सरकार के लिए नीतिगत व संवैधानिक रूप से एेसा करना जरूरी नहीं था। इसी समझौते पर लोकसभा में बहस करते हुए प्रणव दा ने एेतिहासिक वचन कहे थे और बयान दिया था कि ‘हमें जनता ने इस सदन लोकसभा में चुनकर भेजा है। उन्होंने हम पर विश्वास किया है। हमें अपने पर विश्वास होना चाहिए कि हम जो कुछ भी कर रहे हैं वह देश के हित और आने वाली पीढि़यों की भलाई के लिए कर रहे हैं”

-राकेश कपूर

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