राजनीति का नासूर ‘परिवारवाद’

Summary :

स्वतन्त्र भारत की राजनीति शुरू से ही अन्तर्विरोधों से ग्रस्त रही है। आजादी के बाद जब कांग्रेस पार्टी से समाजवादी गुट टूट कर अलग हुआ तो आचार्य कृपलानी, डा. राम मनोहर लोहिया व आचार्य नरेन्द्र देव ने दो अलग पार्टियों का गठन किया। इनमें से आचार्य कृपलानी की पार्टी कृषक-मजदूर पार्टी थी और डा. लोहिया व आचार्य जी की समाजवादी पार्टी थी। बाद में समाजवादी पार्टी भी दो टुकड़ों संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी व प्रजा समाजवादी पार्टी में विभक्त हुई। मगर यह विभाजन विशुद्ध सैद्धान्तिक व वैचारिक आधार पर था। मगर जब 1967 के आम चुनावों में नौ राज्यों में कांग्रेस…

स्वतन्त्र भारत की राजनीति शुरू से ही अन्तर्विरोधों से ग्रस्त रही है। आजादी के बाद जब कांग्रेस पार्टी से समाजवादी गुट टूट कर अलग हुआ तो आचार्य कृपलानी, डा. राम मनोहर लोहिया व आचार्य नरेन्द्र देव ने दो अलग पार्टियों का गठन किया। इनमें से आचार्य कृपलानी की पार्टी कृषक-मजदूर पार्टी थी और डा. लोहिया व आचार्य जी की समाजवादी पार्टी थी। बाद में समाजवादी पार्टी भी दो टुकड़ों संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी व प्रजा समाजवादी पार्टी में विभक्त हुई। मगर यह विभाजन विशुद्ध सैद्धान्तिक व वैचारिक आधार पर था। मगर जब 1967 के आम चुनावों में नौ राज्यों में कांग्रेस के पूर्ण बहुमत से दूर रहने के कारण बगावत हुई तो कारण सैद्धान्तिक से अधिक सामाजिक बुनावट के राजनीति पर पड़ने वाले असर से था।
इस क्रम में पहली बगावत उत्तर प्रदेश से हुई जहां से स्व. चौधरी चरण सिंह ने 14 विधायकों के साथ अपना अलग गुट जन कांग्रेस बनाने की घोषणा की। उनकी देखा-देखी मध्य प्रदेश से लेकर हरियाणा व प. बंगाल तक भी यह क्रम चला और कांग्रेसियों की बगावत की वजह से आठ राज्यों में गैर कांग्रेसी संविद ( संयुक्त विधायक दल) की सरकारों का गठन हुआ जिनकी कमान विद्रोही कांग्रेस नेताओं के हाथों में ही थी। मगर संविद सरकारों का प्रयोग असफल रहा क्योंकि इन सरकारों में धुर विरोधी कम्युनिस्ट व जनसंघी एक साथ शामिल थे। केवल पंजाब में अकाली दल व भारतीय जनसंघ का गठजोड़ चुनावों के बाद बना जिसके संयुक्त विधायकों की संख्या कांग्रेसी विधायकों से ज्यादा थी। मगर इसमें भी बीच में ही अकाली दल में बगावत हो गई और इसका एक गुट टूट कर अलग हो गया और उसने जोड़तोड़ करके नई सरकार बना ली। मगर यह दौर सैद्धान्तिक राजनीति को तिलांजली देकर विशुद्ध सत्ता के लिए गठजोड़ करने का प्रथम प्रयास था जिसके परिणाम अच्छे नहीं निकले। मगर 1969 में इन नौ राज्यों में से अधिसंख्यक में मध्यावधि चुनाव हुए जिनमें सबसे प्रमुख उत्तर प्रदेश के चुनाव रहे क्योंकि इस राज्य में चौधरी चरण सिंह ने अपनी अलग से भारतीय क्रान्ति दल पार्टी गठित करके सम्पूर्ण ग्रामीण समाज को एक धर्म व जाति से निरपेक्ष रखते हुए एक मजबूत वोट बैंक की तरह खड़ा किया और कांग्रेस व जनसंघ दोनों ही पार्टियों की जमीन खिसका दी।
इसके बाद 1969 में ही राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पार्टी का विघटन दो पार्टियों में हुआ और इंदिरा जी के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी अन्ततः असली कांग्रेस के रूप में 1971 के लोकसभा चुनावों में प्रतिष्ठापित हो गई। इसके बाद 1974 में चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व की लोकप्रियता व उनके ग्रामीण वोट बैंक के समस्त उत्तर भारत में विस्तार को देखते हुए उनके गांधीवादी विचारों के छाते तले संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, स्वतन्त्र पार्टी व बीजू पटनायक की पार्टी सहित कुछ अन्य छोटे दलों का भी भारतीय क्रान्ति दल में विलय हो गया और इसे नया नाम लोकदल दिया गया। लेकिन इसी वर्ष पूरे देश में स्व. जय प्रकाश नारायण का सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन शुरू हो गया जिसके तेवरों को देखते हुए देश में 1975 में इमरजेंसी लागू कर दी गई और सभी विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया। इसी आन्दोलन के दौरान ग्रामीण पृष्ठभूमि के कई होनहार युवा नेता श्री चरण सिंह के सम्पर्क में आये और जब 1977 में इमरजेंसी उठने पर लोकसभा चुनाव हुए तो इनमें से अधिसंख्य को चौधरी साहब ने लोकसभा का टिकट नई बनी जनता पार्टी का दिया जो कि लोकदल व जनसंघ के साथ इन्दिरा विरोधी कांग्रेस के विलय से बनी थी।
इन नेताओं में लालू प्रसाद यादव से लेकर मुलायम सिंह यादव व नीतीश कुमार व रामविलास पासवान आदि थे। साथ ही हरियाणा के चौधरी देवी लाल उनके निकट सहयोगी थे। मगर 1980 में जनता पार्टी के बिखर जाने और इन्दिरा गांधी के पुनः सत्तारूढ़ हो जाने से लोकदल पार्टी का नया नामकरण दलित मजदूर किसान पार्टी (दमकिपा) हुआ और ग्रामीण पृष्ठभूमि के सभी बड़े नेता इसके साथ जुड़े रहे। 1984 में अचानक प्रधानमन्त्री रहते हुए जब श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या हुई तो इसके तुरन्त बाद हुए लोकसभा चुनावों में उनके पुत्र स्व. राजीव गांधी को प्रधानमन्त्री बना दिया गया और उन्हीं के नेतृत्व में इस वर्ष हुए लोकसभा चुनाव लड़े गये जिनमें कांग्रेस को रिकार्ड बहुमत प्राप्त हुआ जबकि पंजाब व असम में ये चुनाव मुल्तवी रखे गये थे। 1984 के लोकसभा चुनावों मैं चौधरी चरण सिंह के साथ अपने तत्कालीन राष्ट्रीय हिन्दी अखबार की तरफ से चुनाव ब्यौरे के लिए भेजा गया था।
चौधरी साहब ग्रामीण जनता के एकछत्र नेता थे जिन्हें किसान नेता कह कर भी पुकारा जाता था। चौधरी साहब का चुनाव प्रचार करने का अन्दाज निराला था। वह ग्रामीणों को समझाते थे कि जिस देश में किसान या खेती पर निर्भरता ज्यादा होगी वह देश गरीब होगा और जिस देश में लोग दूसरे धंधों में ज्यादा लगे होंगे वह अमीर होगा। इस सन्दर्भ में वह अमेरिका का उदाहरण दिया करते थे और कहते थे कि किसानों की नई पीढि़यों को दूसरे धंधों में लगना चाहिए मगर इसके लिए किसानों की आमदनी बढ़ानी जरूरी है जो पैदावार बढ़ा कर और सरकारी उपायों से की जानी चाहिए क्योंकि जैसे-जैसे कालों की नई पी​ि​ढ़यां आती जायेंगी वैसे-वैसे ही उनके परिवारों की जमीनों का भी बंटवारा होता जायेगा। अतः जरूरी है कि किसानों के बेटे-बेटियां इंजीनियर व डाक्टर तथा प्रोफेसर व वैज्ञानिक बने। इसी क्रम में चौधरी चरण सिंह जब उत्तर प्रदेश के मैनपुरी शहर के राजकीय इंटर कालेज के प्रांगण में आयोजित विशाल जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे तो उन्होंने राजनीति में परिवारवाद या वंशवाद के खिलाफ एेसा उद्घोष किया जिसकी कल्पना आज की राजनीतिक पीढ़ी सपने में भी नहीं कर सकती है।
चौधरी साहब ने स्व. राजीव गांधी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि मेरा एक बेटा है अ​िजत सिंह। वह कम्प्यूटर का बहुत बड़ा इंजीनियर है जो अमेरिका में नौकरी करता है। लोग मुझसे कहते हैं कि उसे राजनीति में लाओ। मगर मैं कहता हूं कि वह राजनीति में आने के काबिल नहीं है। उसे भारत के लोगों और गांवों की हालत के बारे में क्या पता? वह तो शुरू से ही एक मिनिस्टर का बेटा रहा है (चौधरी साहब 1952 से ही उत्तर प्रदेश की सरकारों में शामिल रहे थे) उसे क्या पता गांवों में मढैया कैसे पड़ती है। उसे क्या पता किसान रैहट चला कर अपने खेतों की सिंचाई किस तरह करता है। भाइयों राजनीति शासन करने के लिए नहीं बल्कि जनता की सेवा करने के लिए होती है। अतः राजनीति में परिवारवाद के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। मगर राजनीति का वह विरोधाभास देखिये कि जो नेता कभी चौधरी साहब के शिष्य व साथी बने रहे थे उन्होंने ही बाद में उनकी मत्यु बाद देश की राजनीति में चौधरी साहब के बनाये ग्रामीण वोट बैंक को जातियों व सामाजिक वर्गों में तोड़ कर परिवारवाद की बेल को राजनीति में पनपाया। चाहे मुलायम सिंह यादव हों या लालू प्रसाद यादव अथवा रामविलास पासवान सभी ने अपनी अलग-अलग पार्टी बना कर अपने पुत्र व सम्बन्धियों को उनका सर्वेसर्वा बनाया। इसका असर दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य तक में हुआ क्योंकि यहां के जनता दल (एस) के नेता श्री एच.डी. देवेगौड़ा भी लोकदल में रहे थे। इस परिवारवादी राजनीति से लोकतन्त्र में एक नये तरह की
राजशाही पैदा हुई जिसकी वजह से चुनावी युद्ध में जाति व सामाजिक वर्गों का आपसी गठबन्धन व्यक्ति पूजा के बहाने चलता रहा।
अतः हम जिस राज्य में भी क्षेत्रीय दल देखते हैं वह परिवार की एक राजनैतिक परचून की दुकान बना हुआ है। मगर लोकतंत्र की बागडोर नेताओं के हाथ में नहीं बल्कि लोगों के हाथ में होती है और वह चुनावों में प्रयोग करने की अभ्यस्त होती है। इसलिए प. बंगाल में ममता दीदी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के बुरी तरह हार जाने के बाद जिस तरह उनकी पार्टी के भीतर उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की तानाशाही व मनमानी के विरुद्ध विद्रोह हो रहा है वह एक समयानुकूल राजनैतिक प्रक्रिया है जिसके प्रभाव से सभी परिवारवादी दल भीतर ही भीतर घबरा रहे हैं। चाहे वह समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव हों या बिहार में राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू यादव के सुपुत्र तेजस्वी यादव हों या महाराष्ट्र तक में श्री शरद यादव की सुपुत्री सुप्रिया शुले हों। मगर इस राजनैतिक विक्षोभ के बहुआयामी कारण भी हैं जिनका सम्बन्ध लोगों को मिले एक वोट के सबसे बड़े संवैधानिक अधिकार से होता है और भारत गणतन्त्र कहलाता है।

Shera Rajput