छात्रों की गूंज बनाम झूठ की गूंज

Summary :

विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने एक बार फिर भाजपा की बढ़ाई बेचैनी, श्री राहुल गांधी ने एक बार फिर वही कर दिखाया है। उन्होंने भाजपा को एक और ऐसी रात दी है, जिसमें शायद ही उसे चैन की नींद आई हो। यह पहली बार नहीं है, जब राहुल गांधी की किसी पहल ने सत्तारूढ़ दल को असहज किया हो। उनकी ‘छात्रों की गूंज’ पहल ने भाजपा को इसके जवाब में ‘झूठ की गूंज’ के साथ सामने आने पर मजबूर कर दिया है। नीट परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने और नई दिल्ली में छात्रों के बेहद प्रभावशाली एवं सफल विरोध-प्रदर्शन…

विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने एक बार फिर भाजपा की बढ़ाई बेचैनी, श्री राहुल गांधी ने एक बार फिर वही कर दिखाया है। उन्होंने भाजपा को एक और ऐसी रात दी है, जिसमें शायद ही उसे चैन की नींद आई हो। यह पहली बार नहीं है, जब राहुल गांधी की किसी पहल ने सत्तारूढ़ दल को असहज किया हो। उनकी ‘छात्रों की गूंज’ पहल ने भाजपा को इसके जवाब में ‘झूठ की गूंज’ के साथ सामने आने पर मजबूर कर दिया है।

नीट परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने और नई दिल्ली में छात्रों के बेहद प्रभावशाली एवं सफल विरोध-प्रदर्शन के बाद कांग्रेस पार्टी ने देशभर में छात्रों से संपर्क का एक व्यापक अभियान शुरू किया है। इसका उद्देश्य मोदी सरकार को घेरना और प्रश्नपत्रों के लीक होने, कोचिंग संस्थानों के बढ़ते आर्थिक दबाव, बेरोजगारी तथा सरकारी भर्ती व्यवस्था में व्याप्त अनियमितताओं जैसे मुद्दों पर जवाब मांगना था।

राजस्थान से शुरू की गई इस पहल के माध्यम से कांग्रेस छात्रों से सीधे संवाद स्थापित करना और देश के युवाओं के साथ अपने संबंधों को मजबूत करना चाहती है। इसका उद्देश्य छात्रों को अपनी चिंताओं और समस्याओं को सामने रखने में मदद करना तथा उन मुद्दों के समाधान में सरकार की विफलताओं को उजागर करना है। शुरुआती कार्यक्रमों को मिली सफलता के बाद कांग्रेस ने इस पहल का दायरा बढ़ाने का फैसला किया और शिक्षा से आगे बढ़कर सुरक्षा जैसे मुद्दों को भी इसमें शामिल किया।

इस शृंखला का नवीनतम कार्यक्रम महिलाओं की सुरक्षा पर केंद्रित था। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम का चेहरा राहुल गांधी ही हैं। यदि छात्रों की प्रतिक्रिया और उनकी भागीदारी को कसौटी माना जाए, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि गांधी ने बिल्कुल सही निशाना साधा है। कुछ छात्रों ने इसे ‘अपने आप में अनूठा कार्यक्रम’ बताया है, जबकि कुछ का कहना है कि इस पहल ने उन्हें ‘सहजता का अनुभव’ कराया और उन मुद्दों पर खुलकर चर्चा करने की स्वतंत्रता दी, जिन्हें चर्चा के केंद्र में होना चाहिए लेकिन जो अक्सर केंद्र में नहीं होते।

इस पूरी पहल के केंद्र में एक विचार प्रमुखता से उभरकर सामने आया है ‘बदलाव की आवश्यकता।’ यह बदलाव की मांग किसी राजनीतिक दल के समर्थन से अधिक व्यवस्था में सुधार की मांग है। इस पहल के माध्यम से सरकार की विफलताओं को भी प्रमुखता से सामने लाया जा रहा है। यह अभियान विशेष रूप से छात्रों और नई पीढ़ी के युवाओं तक पहुंच बनाने पर केंद्रित है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि इसका उद्देश्य उन युवाओं को अपने साथ जोड़ना है, जो पहली बार मतदान करने जा रहे हैं।

यही बात भाजपा को वास्तव में सतर्क होने और इस पहल पर प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर करती दिखाई देती है। भाजपा ने ‘छात्रों की गूंज’ को झूठे प्रचार का माध्यम बताते हुए इसकी आलोचना की है। साथ ही उसने राहुल गांधी के बयानों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाते हुए उन्हें भ्रामक करार दिया है। त्वरित कार्रवाई के लिए जानी जाने वाली भाजपा ने राहुल गांधी के दावों का जवाब देने के लिए एक वेबसाइट भी शुरू कर दी है। ‘झूठ की गूंज’ नाम से शुरू की गई यह तथ्य जांच वेबसाइट सीधे तौर पर ‘छात्रों की गूंज’ पहल के जवाब में सामने आई है।

भाजपा के नेता राहुल गांधी को ‘झूठ का ध्वजवाहक’ तक कह चुके हैं। उनका आरोप है कि गांधी के बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सफलता से उपजी उनकी हताशा को दर्शाते हैं। हालांकि इस बीच राहुल गांधी का उद्देश्य पूरा होता दिखाई देता है। ‘झूठ की गूंज’ नाम से जवाबी वेबसाइट का शुरू किया जाना इस बात की पुष्टि करता है कि ‘छात्रों की गूंज’ लोगों के बीच अपनी जगह बना रही है और उसकी प्रतिध्वनि सुनाई दे रही है। भाजपा यह दावा करती रह सकती है कि उसकी तथ्य जांच वेबसाइट राहुल गांधी के दावों को तेजी से उजागर कर रही है।

लेकिन तथ्य यह है कि ‘छात्रों की गूंज’ अपनी छाप छोड़ चुकी है। और फिलहाल राहुल गांधी की इस पहल को नजरअंदाज करना भाजपा के लिए आसान नहीं है। और यह कोई एकमात्र घटना नहीं है। राहुल गांधी के आलोचक और अतीत में उन्हें निशाना बनाने वाला ‘पप्पू गिरोह’ भी अब यह मानने को मजबूर होगा कि गांधी एक प्रमुख विरोध स्वर के रूप में उभरे हैं और जब भी उन्हें अवसर मिलता है, वह सरकार को घेरने से पीछे नहीं हटते।

मुद्दों की प्रकृति चाहे जो भी हो उनकी सक्रियता भाजपा नेतृत्व की नींद हराम करने के लिए पर्याप्त है। भाजपा के भीतर कई लोग उन्हें ‘लगातार सिरदर्द’ के रूप में देखते हैं ऐसा सिरदर्द जो संसद के भीतर भी और बाहर भी लगातार बना रहता है। संसद के भीतर तो उन्होंने हाल ही में संपन्न हुए मानसून सत्र को लगभग पूरी तरह ठप्प कराने में विपक्ष के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। छात्रों के विरोध-प्रदर्शन को लेकर सत्र के दौरान लगातार हंगामा और व्यवधान होता रहा। विपक्ष ने पुलिस की जवाबदेही तय करने की मांग उठाई।

इसी बीच राहुल गांधी ने मांग की कि केंद्रीय गृह मंत्री सदन में उपस्थित हों और इस मुद्दे पर बयान दें। विपक्ष ने एकजुट होकर सरकार के सामने मजबूती से मोर्चा संभाला और कई महत्वपूर्ण विधेयकों को आगे बढ़ने से रोक दिया। इनमें विदेशी अंशदान (विनियमन’ संशोधन विधेयक, जिसे सामान्यतः एफसीआरए के नाम से जाना जाता है, भी शामिल था।
दरअसल विपक्ष के कड़े विरोध के सामने सरकार को अंततः पीछे हटना पड़ा और विवादास्पद विधेयक को समीक्षा तथा व्यापक विचार-विमर्श के लिए संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजना पड़ा।

जहां तक केंद्रीय गृह मंत्री की सदन में उपस्थिति का सवाल है, सत्र के अंतिम चरण में जाकर संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने घोषणा की कि गृह मंत्री सदन में बोलने और विपक्ष की चिंताओं का जवाब देने के लिए तैयार हैं लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। सरकार को पहले ही विपक्ष की मांगों का जवाब देना चाहिए था। इसके बजाय उसका लगातार अड़ियल रुख और गृह मंत्री की संसद से अनुपस्थिति सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा करती रही। जब रिजिजू ने विपक्ष से सरकार का जवाब सुनने की अपील की, तब तक विपक्ष या यूं कहें कि कांग्रेस, यह राजनीतिक मुकाबला अपने पक्ष में कर चुकी थी।

इससे पहले प्रियंका गांधी ने भी जोर देकर कहा था कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को सदन की कार्यवाही आगे बढ़ने से पहले सदन को संबोधित करना चाहिए। बताया जाता है कि उन्होंने कहा था, अगर आप सदन चलाना चाहते हैं तो आइए और इस मुद्दे पर सदन को संबोधित कीजिए। सरकार को चाहे विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक के मामले में पीछे हटना पड़ा हो या गृह मंत्री को सदन में आने और अपनी बात रखने के लिए तैयार होना पड़ा हो, यह विपक्ष की सफलता के बारे में बहुत कुछ कहता है।

वास्तव में यह गांधी परिवार या कहें भाई-बहन की उस जोड़ी के बारे में और भी अधिक बताता है, जो इस समय अपने सबसे आक्रामक तेवर में नजर आ रही है और जरा सी बात पर भी सड़क पर उतरने को तैयार रहती है। इस कसौटी पर देखें तो वे एक मजबूत विपक्ष की भूमिका बखूबी निभा रहे हैं। बेशक इस बात पर बहस हो सकती है कि सदन की कार्यवाही को बाधित करना अच्छी संसदीय परंपरा है या नहीं। लेकिन स्वराज-जेटली सिद्धांत को आधार मानें तो गांधी भाई-बहन इस कसौटी पर खरे उतरते दिखाई देते हैं।

रिकॉर्ड के लिए यह उल्लेख करना जरूरी है कि दिवंगत सुषमा स्वराज और अरुण जेटली दोनों का स्पष्ट मत रहा था कि विपक्ष का काम विरोध करना है, जबकि सदन को सुचारू रूप से चलाना सरकार की जिम्मेदारी है। संसद के बाहर भी राहुल गांधी ने हाल में सुर्खियां बटोरी। कांग्रेस के एक नेता ने इसे राहुल गांधी की ‘पुलिस थाने की यात्रा’ के रूप में वर्णित किया। मामला नई दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में छात्रों के विरोध मार्च के दौरान कथित रूप से चली पुलिस की छर्रों वाली बंदूक से घायल हुए एक छात्र के लिए प्राथमिकी दर्ज कराने का था। मामला साहिल लोचब को लगी छर्रों की चोटों से जुड़ा था। आरोप है कि पुलिस की गोलीबारी में लोचब घायल हुए थे।

बताया जाता है कि अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद पुलिस द्वारा प्राथमिकी दर्ज नहीं किए जाने पर लोचब ने राहुल गांधी से संपर्क किया। 19 वर्षीय लोचब की आंखों में छर्रे लगने के बाद उनकी दृष्टि चली गई थी। उनका शल्य उपचार किया गया लेकिन चिकित्सकों ने बताया कि उनकी दृष्टि वापस आने की संभावना केवल एक प्रतिशत है। राहुल गांधी न केवल पुलिस थाने पहुंचे, बल्कि उन्होंने पुलिस उपायुक्त के कार्यालय के बाहर छह घंटे से अधिक समय तक धरना दिया। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि जब तक प्राथमिकी दर्ज नहीं होती वह वहां से नहीं हटेंगे।

यही वजह है कि जब जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि राहुल गांधी सरकार को जवाबदेह ठहराकर अपने संवैधानिक दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं तो वह बिल्कुल सही बात कह रहे थे। अब्दुल्ला ने कहा-अगर विपक्ष का नेता विरोध ही नहीं करेगा तो फिर उसके होने का क्या अर्थ है? इससे बेहतर तरीके से बात शायद ही कही जा सकती थी। जहां तक अभियानों का सवाल है, राहुल गांधी की सफलता का अनुपात फिलहाल काफी ऊंचा दिखाई देता है। यदि वह इस गति को बनाए रखते हैं और इसे चुनावी राजनीति में भी उसी प्रभावी ढंग से लागू कर पाते हैं, तो एकजुट विपक्ष 2029 में 2024 के अपने प्रदर्शन को बेहतर कर सकता है और संभवतः मोदी सरकार को कड़ी चुनौती भी दे सकता है।

लेकिन राहुल गांधी की असंगतता और बार.बार बदलते रुख को देखते हुए यह फिलहाल एक दूर की कौड़ी ही लगती है। यही कारण है कि जिन मुद्दों पर विपक्ष इस समय एकजुट दिखाई दे रहा है, संभव है कि 2029 में वही एकजुटता नजर न आए। आम चुनाव के समय तक इंडिया गठबंधन के घटक दल अलग-अलग दिशाओं में जाते दिखाई दे सकते हैं। लेकिन सरकार का क्या? क्या वह विचलित है? क्या वह घबराई हुई है? और इससे भी महत्वपूर्ण सवाल -क्या वह संसद को सुचारू रूप से चलाने की अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रही है? इन सवालों पर अंतिम फैसला अभी बाकी है।

Team Desk