डिग्री नहीं, रोज़गार चाहिए

Summary :

पीढ़ियों से भारतीय मध्यमवर्गीय सपने का एक तय और सख्त फॉर्मूला रहा है-खूब पढ़ाई करो, किसी अच्छे कॉलेज में एडमिशन लो, एक चमचमाती डिग्री हासिल करो और आराम से एक स्थिर करियर की तरफ बढ़ जाओ। शिक्षा को हमेशा सबसे बड़ा सुरक्षा कवच और आगे बढ़ने का जरिया माना जाता था। आज वह सुरक्षा कवच कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। नुक्कड़ की चाय की दुकानों से लेकर टियर-2 शहरों के कोचिंग हब और कॉर्पोरेट बोर्डरूम तक, हर जगह एक ही गूंज सुनाई देती है-“डिग्री नहीं, रोज़गार चाहिए।” आज भारत एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। दुनिया की सबसे बड़ी…

पीढ़ियों से भारतीय मध्यमवर्गीय सपने का एक तय और सख्त फॉर्मूला रहा है-खूब पढ़ाई करो, किसी अच्छे कॉलेज में एडमिशन लो, एक चमचमाती डिग्री हासिल करो और आराम से एक स्थिर करियर की तरफ बढ़ जाओ। शिक्षा को हमेशा सबसे बड़ा सुरक्षा कवच और आगे बढ़ने का जरिया माना जाता था। आज वह सुरक्षा कवच कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। नुक्कड़ की चाय की दुकानों से लेकर टियर-2 शहरों के कोचिंग हब और कॉर्पोरेट बोर्डरूम तक, हर जगह एक ही गूंज सुनाई देती है-“डिग्री नहीं, रोज़गार चाहिए।”

आज भारत एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश के रूप में, जहां हमारे पास एक विशाल युवा ताकत (डेमोग्राफिक डिविडेंड) है, हर साल लाखों युवा कार्यबल में शामिल होते हैं लेकिन इसके साथ ही एक बड़ी विडंबना भी है कि एक तरफ इंडस्ट्रीज को बेहतरीन टैलेंट की कमी खल रही है, तो दूसरी तरफ डिग्रियां हाथ में लिए लाखों युवा या तो बेरोजगार हैं या अपनी योग्यता से कम स्तर का काम करने को मजबूर हैं।

गौरतलब है कि नीति आयोग ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट में बताया है कि देश में 15 से 20 वर्ष की आयु के करीब आठ करोड़ सत्तर लाख (8.7 करोड़) युवा ऐसे हैं जो न तो पढ़ाई कर रहे हैं,न रोजगार में हैं और किसी तरह का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। अगर इतनी बड़ी सख्या में युवा एक तरह से खाली बैठे हैं तो आखिर किस आधार पर सरकार की ओर से दावा किया जाता है कि युवा आबादी ही देश की ताकत है और वही भविष्य की दिशा तय करेगी। आज समस्या शिक्षा की कमी नहीं है, बल्कि रोज़गार में योग्यता की गहरी खाई है।

इसके पीछे कई कारण हैं। देश भर के कई उच्च शिक्षण संस्थान आज भी दशकों पुराने सिद्धांतों और तरीकों को पढ़ा रहे हैं। जब तक छात्र अपनी पढ़ाई पूरी करता है, तब तक तकनीक और कॉर्पोरेट जगत पूरी तरह बदल चुका होता है।
पारंपरिक विश्वविद्यालय रट्टा मारने और सैमेस्टर परीक्षाओं पर ज्यादा जोर देते हैं, जबकि असल दुनिया में प्रॉब्लम-सॉल्विंग, क्रिटिकल थिंकिंग और हाथों-हाथ काम सीखने की जरूरत होती है। कई रोजगार सर्वे बताते हैं कि एक बड़ा प्रतिशत युवा कॉलेज पास करने के बाद भी कॉर्पोरेट या इंडस्ट्री के बेसिक टेस्ट पास नहीं कर पाता।

केवल बैचलर या मास्टर डिग्री होना अब इस बात की गारंटी नहीं है कि वह व्यक्ति नौकरी का काम संभाल पाएगा।
नतीजतन, कई युवा एक के बाद एक कई डिग्रियां या पोस्ट-ग्रेजुएट डिप्लोमा लेते चले जाते हैं। यह पढ़ाई के प्रति प्रेम की वजह से नहीं, बल्कि बेरोजगारी के सामाजिक ताने-बाने से बचने या सरकारी नौकरियों की पुरानी शर्तों को पूरा करने की मजबूरी बन जाता है। पूरे विश्व में कौशल-आधारित अर्थव्यवस्था का उदय हो रहा है। नौकरी का बाजार चुपचाप एक बड़े बदलाव से गुजर रहा है। डिजिटल क्रांति, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और वैश्विक बदलावों के कारण अब कंपनियां हायरिंग का तरीका बदल रही हैं।

आज के रिक्रूटर यह पूछने के बजाय कि “आपने कहां से पढ़ाई की है?”, यह सवाल पूछते हैं कि “आप अभी क्या काम कर सकते हैं?” टेक, डिजिटल मार्केटिंग, डेटा एनालिटिक्स और क्रिएटिव क्षेत्रों में छोटे-छोटे स्किल बूटकैम्प, स्पेशलाइज्ड सर्टिफ़िकेशन और प्रोजेक्ट-बेस्ड पोर्टफोलियो तीन साल की पारंपरिक डिग्री पर भारी पड़ रहे हैं। इंटरनेट और आधुनिक टूल्स की बदौलत आज के युवा कॉर्पोरेट कतारों में खड़े रहने के बजाय खुद अपनी राह बना रहे हैं। वे पोर्टफोलियो तैयार कर रहे हैं, फ्रीलांसिंग कर रहे हैं, ई-कॉमर्स स्टोर चला रहे हैं और पढ़ाई के साथ ही डिजिटल सेवाएं दे रहे हैं।

बड़ी कंपनियां अब ‘स्किल्स-फर्स्ट’ (कौशल-आधारित) हायरिंग की तरफ बढ़ रही हैं। वे समझ चुकी हैं कि काम करने की व्यावहारिक क्षमता, नई चीजें सीखने की ललक किसी यूनिवर्सिटी के कागज़ से कहीं ज्यादा मायने रखती है। सरकार को इस खाई को पाटने के लिए देश की शिक्षा व्यवस्था में स्कूल स्तर से लेकर यूनिवर्सिटी तक जरूरी बदलाव करने होंगे। “डिग्री बनाम नौकरी” के अंतर को खत्म करने के लिए केवल ऊपरी बदलावों से काम नहीं चलेगा, बल्कि सिस्टम में बड़े सुधार की जरूरत है। इसके लिए सभी संबंधित पक्षों को मिलकर काम करना होगा।

यूनिवर्सिटीज अब अलग-थलग होकर काम नहीं कर सकतीं। इंडस्ट्री के लीडर्स के साथ मिलकर ऐसा पाठ्यक्रम तैयार किया जाना चाहिए जो बाजार की वास्तविक जरूरतों के बिल्कुल मुताबिक हो। उच्च शिक्षा में अनिवार्य इंटर्नशिप, लाइव प्रोजेक्ट्स और प्रॉब्लम-सॉल्विंग असाइनमेंट्स को पढ़ाई का मुख्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए, ताकि छात्र सिर्फ मार्कशीट नहीं, बल्कि काम का पक्का सबूत लेकर बाहर निकलें। जब नीतियां, संस्थान और इंडस्ट्री मिलकर वास्तविक कौशल को प्राथमिकता देंगे तभी देश की इस विशाल युवा शक्ति को एक सच्ची और अजेय आर्थिक ताकत में बदला जा सकेगा।

Aakash Chopra