राहुल गांधी नहीं तो और कौन

Summary :

कांग्रेस कार्यकारिणी की हालिया बैठक में राहुल गांधी ने बहुत दिलचस्प टिप्पणी की है। उनका कहना था कि पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता उन पर भरोसा नहीं करते और उनका पूरा साथ नहीं देते। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के साथ एक बैठक के दौरान उन्होंने महसूस किया कि दोनों समझते हैं कि अगर भाजपा सत्ता से बाहर होती है तो जगह कांग्रेस ही लेगी। तब राहुल गांधी ने अपने ही नेताओं से सवाल किया, “जब देश के शीर्ष नेतृत्व को यह यकीन है कि कांग्रेस सत्ता में वापसी करेगी तो पार्टी के अंदर कुछ…

कांग्रेस कार्यकारिणी की हालिया बैठक में राहुल गांधी ने बहुत दिलचस्प टिप्पणी की है। उनका कहना था कि पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता उन पर भरोसा नहीं करते और उनका पूरा साथ नहीं देते। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के साथ एक बैठक के दौरान उन्होंने महसूस किया कि दोनों समझते हैं कि अगर भाजपा सत्ता से बाहर होती है तो जगह कांग्रेस ही लेगी। तब राहुल गांधी ने अपने ही नेताओं से सवाल किया, “जब देश के शीर्ष नेतृत्व को यह यकीन है कि कांग्रेस सत्ता में वापसी करेगी तो पार्टी के अंदर कुछ नेताओं को ‘वोट चोरी’ या चुनावी सूची से जुड़े अभियान पर अब तक भरोसा क्यों नहीं था”? राहुल गांधी की शिकायत अजीब है।

अब तक तो यह ही समझा गया कि गांधी परिवार के इशारे के बिना कांग्रेस में पत्ता नहीं हिलता,पर यहां तो खुद राहुल शिकायत कर रहे थे कि उनको पूरा सहयोग नहीं मिलता। क्या इसका कारण है कि कार्यकारिणी में चले हुए कारतूस भरे हुए हैं जो समय के साथ बदलना नहीं चाहते जबकि देश तेज़ी से बदल रहा है? वोट में गड़बड़ी, इसे ‘चोरी’ न भी कहा जाए, का मामला सबसे पहले राहुल गांधी ने ही उठाया था। अब यह विस्फोटक बनता जा रहा है, पर राहुल के सिवाय किसी भी कांग्रेस के नेता ने पहले इसकी गम्भीरता को क्यों नहीं भांपा? क्या समय आ गया है कि भाजपा की ही तरह कांग्रेस को भी ‘मार्ग दर्शक मंडल’ तैयार करना चाहिए? लेकिन यह अलग बात है। सवाल एक और है।

अगर कांग्रेस के अपने नेताओं को राहुल गांधी पर भरोसा नहीं है तो बाक़ी देश क्यों करेगा? इसमें काफ़ी कसूर राहुल गांधी का अपना है। उनकी नीयत सही है। मेहनत कर सकते हैं जैसे उन्होंने भारत जोड़ो यात्रा कर प्रदर्शित भी किया था। वह मुद्दे उठाते हैं, पर उन पर टिकते नहीं। कहीं पलायन की प्रवृत्ति है जिसे उनके विरोधी उछालने में सफल रहे हैं। आज्ञाकारी मीडिया की मदद से उनकी ‘पप्पू’ वाली छवि बना दी गई। जब किसी नेता का मज़ाक बनना शुरू हो जाए तो लोग उसे गम्भीरता से नहीं लेते। राहुल गांधी कभी भी ‘पप्पू’ नहीं थे, जैसे मैं पहले भी लिख चुका हूं, पर परिपक्वता जो एक राजनेता में होनी चाहिए, की कमी ज़रूर थी।

‘चौकीदार चोर है’ जैसे जुमले फेल रहे। मणिपुर, अग्निवीर,चीन से खतरा, राफ़ेल की खरीद, पेपर लीक, किसानों के लिए एमएसपी जैसे कई मुद्दे वह उठा चुके हैं। सरकार को कुछ देर रक्षात्मक बना कर वह आगे बढ़ जाते हैं। उनका अचानक विदेश में ग़ायब हो जाना भी चर्चा का विषय रहा है। यहां राजनीति तो 24 घंटे का काम है। विशेषतौर पर जब मुक़ाबला भाजपा जैसे मज़बूत संगठन और नरेन्द्र मोदी जैसे नेता से हो। नरेन्द्र मोदी हर चुनाव को अति गंभीरता से लेते हैं। इंडिया टुडे के मूड ऑफ द नेशन सर्वेक्षण ने बताया है कि जनवरी और अगस्त के बीच प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता में छह अंक की गिरावट आई है।

यह 48.7% है, पर इस गिरावट का राहुल गांधी को कोई फ़ायदा नहीं पहुंचा क्योंकि उनकी लोकप्रियता 26.6% से केवल 27.1% तक ही खिसकी है। नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता में गिरावट का राहुल गांधी फ़ायदा क्यों नहीं उठा सके ?
2024 के चुनाव के बाद प्रदेशों में जो चुनाव हुए है कांग्रेस केवल 18% सीटें ही जीत सकी है। वह केरल जीते और जम्मू-कश्मीर तथा झारखंड में दूसरों के सहारे सत्ता में हैं, पर पार्टी हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार और असम में हार गई है। कांग्रेस किस तरह सैल्फ गोल करती है यह पंजाब के उदाहरण से पता चलता है।

प्रदेश के नेताओं के लम्बे गृहयुद्ध के कारण पार्टी आप सरकार के खिलाफ शासन विरोधी भावना का फ़ायदा नहीं उठा सकी, क्योंकि दिल्ली कोई निर्णायक कदम उठाने को तैयार नहीं थी।अब जबकि चुनाव में छह महीने का समय रह गया है। परगट सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया है, अच्छा फ़ैसला है। वह हाकी कप्तान रहे हैं और एक प्रकार से नेशनल आइकॉन भी हैं, पर उनका चुनाव करने में इतना समय क्यों बर्बाद कर दिया गया जबकि आप और भाजपा के नेता यहां लगातार सक्रिय हैं?

अब देश बदल गया है। नीट पेपर लीक के खिलाफ जंतर-मंतर पर विरोध से पता चलता कि सतह के नीचे कितनी बेचैनी है। चुनाव आयोग पर इंडियन एक्सप्रेस की विस्फोटक रिपोर्ट के बाद तो भूचाल सा बन रहा है। चुनाव आयोग के संदिग्ध आचरण जिसके कारण करोड़ों लोग मताधिकार से वंचित रह गए हैं, से देश परेशान है। सुप्रीम कोर्ट के ही जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा है कि “करोड़ों लोगों को उनके मताधिकार से वंचित रखना संविधान का उल्लंघन है”। याद रखना चाहिए कि राहुल गांधी ने इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से भी पहले यह मुद्दा उठाया था कि संविधान खतरे में है और वोट चोरी हो रही है।

वह कॉकरोच जनता पार्टी से भी पहले शिक्षा,पेपर लीक, भर्ती में धांधली, नौकरियों में कमी के मामले उठाते आ रहे हैं। अभिजीत दीपके द्वारा जंतर मंतर पर आंदोलन शुरू होने से तीन दिन पहले कोटा में राहुल गांधी ने छात्रों की गूंज अभियान शुरू किया था। राहुल का छात्रों को साथ संवाद भारत जोड़ो यात्रा की तरह सफल रहा है क्योंकि वह युवाओं से बात करते हैं, जो भाजपा के नेता नहीं करते। युवा भी शिकायत करतें हैं कि हमें बताया जाता है, हमें सुना नहीं जाता। दोनों प्रधानमंत्री मोदी और संघ प्रमुख मोहन भागवत ने जेन-जी से संवाद शुरू किया था, पर यह बहुत सफल नहीं रहा क्योंकि संघ परिवार में ऊपर से आदेश देने की परम्परा है, सुनने की नहीं।

कई लोग कह रहे हैं कि राहुल गांधी रोज़ नया मुद्दा छेड़ देते हैं। पर यही तो विपक्ष के नेता का काम है। विपक्ष का काम सरकार का समर्थन करना नहीं है। राहुल गांधी ने चेतावनी दी थी कि नोटबंदी से छोटे उद्योग कुचले जाएंगे, जो हुआ भी। कई महीनों से वह महाराष्ट्र, बंगाल, कर्नाटक और हरियाणा में वोट घपले की शिकायत करते रहे हैं। भाजपा और चुनाव आयोग दोनों ही इलज़ाम रद्द करते रहे हैं, पर समय ने राहुल गांधी को सही सिद्ध कर दिया।

अब तो सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि फ़ार्म 6 में संशोधन की उन्होंने अनुमति नहीं दी थी जो चुनाव आयोग दावा करता रहा है। देश की नज़रें सुप्रीम कोर्ट पर हैं। अभी तक चुनाव आयोग को नियंत्रण में रखने में बड़ी अदालत ने बहुत सक्रियता नहीं दिखाई। चुनाव में हिस्सा लेने का नागरिक का अधिकार हर हालत में सुरक्षित रखा जाना चाहिए। पश्चिम बंगाल में उपचुनावों से पहले 18000 अपील की सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी कि “यह तो मात्र उपचुनाव है। डैट्स ऑल”, बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। लोकतंत्र में हर चुनाव, हर वोट, मायने रखता है।

अगर चुनाव आयोग को परवाह नहीं है तो सुप्रीम कोर्ट को जरूर होनी चाहिए। अगर ऊपर से न्याय नहीं मिलेगा तो सड़क अशांत हो जाएगी। राहुल गांधी की त्रासदी है कि देश ने उन्हें वह श्रेय नहीं दिया जिसके वह अधिकारी हैं। बार-बार चुनावों में पार्टी की हार बताती है कि राहुल गांधी मुद्दों को चुनावी फायदे में परिवर्तित नहीं कर सके। उनकी एक समस्या पुरानी है और एक नई समस्या खड़ी हो रही है। पहली समस्या ‘इंडिया’ गठबंधन है। एक को सम्भालते हैं तो दूसरा बिदक जाता है। अब पहले से अधिक शांत ममता बनर्जी का कहना है कि अगर विपक्ष की सरकार बनती है तो कांग्रेस का प्रधानमंत्री होना चाहिए।

पर अब द्रमुक कोप भवन में हैं और तमिलनाडु में सत्तारूढ़ टीवीके का रवैया अस्पष्ट है।अब संयुक्त तौर पर चुनाव आयोग के खिलाफ प्रभावशाली ‘सेव डिमौक्रैसी’ मार्च किए गया है। राहुल गांधी तो बैरिकेट पर चढ़ गए और खूब हंगामा किया(न्यू राहुल?), पर यह कड़वी सच्चाई है कि कई-कई महीने गठबंधन की बैठकें नहीं होती और न ही कोई संयुक्त कार्यक्रम ही है। नई चुनौती कॉकरोच जनता पार्टी से मिल रही है जिसका युवाओं में समर्थन बढ़ता जा रहा है। कांग्रेस अभी तक तय नहीं कर पा रही कि इस नई जमात का क्या किया जाए?कांग्रेस पुरानी पार्टी है जो मर्यादा में रह कर, जैसे होना भी चाहिए,राजनीति करती है। पर कॉकरोच की शब्दावली तीखी है।

वह न नरेन्द्र मोदी की परवाह करते है, न ज्ञानेश कुमार की। क्योंकि युवा हैं कुछ खोने को नहीं है, इसलिए निडर हैं। वह भी पेपर लीक और ‘स्कूल ठीक करो’ से सफ़र कर ज्ञानेश कुमार तक पहुंच गए हैं। राहुल 56 साल के हैं और अभिजीत दीपके 31 साल के हैं। अर्थात एक प्रकार का पीढ़ी का अंतर है। कांग्रेस को सीजेपी से संवाद शुरू करना चाहिए जैसे, अरविंद केजरीवाल और उद्धव ठाकरे ने किया है।

देश की राजनीति में तेज़ी से उथल-पुथल शुरू हो गई है। धर्म और जाति की राजनीति को बेरोज़गारी, महंगाई और युवाओं की आकांक्षाओं से ज़बरदस्त टक्कर मिल रही है। देश में अशान्ति है। इस बदलते माहौल में विपक्ष के नेता की भूमिका महत्वपूर्ण होगी, बशर्ते कि वह एकला चलो रे की नीति त्याग दें। जो राहुल गांधी के बारे सवाल उठाते हैं, कई मित्र इसमें शामिल हैं, उन्हें मेरा जवाब है कि अगर राहुल गांधी नहीं तो विपक्ष के पास और कौन नेता है जो सरकार से टक्कर ले सकता है और उसे जवाब देने के लिए मजबूर कर सकता है? राहुल गांधी नहीं तो और कौन ?

चन्द्रमोहन