सिख समुदाय की उम्मीदें और पीएम मोदी से अपेक्षाएं

Summary :

भारत के सामाजिक, धार्मिक और राष्ट्रीय जीवन में सिख समुदाय का योगदान सदैव महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी रहा है। देश की आजादी से लेकर सीमाओं की रक्षा, कृषि, उद्योग, व्यापार, सेवा और समाज कल्याण तक सिख समाज ने अपनी मेहनत, साहस और सेवा भावना की विशिष्ट पहचान बनाई है। यही कारण है कि केंद्र की किसी भी सरकार से सिख समुदाय की अपेक्षाएं केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रहती, बल्कि धार्मिक विरासत, ऐतिहासिक स्थलों, न्याय और लंबे समय से लंबित सामुदायिक मुद्दों के समाधान से भी जुड़ी होती हैं। वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में भाजपा…

भारत के सामाजिक, धार्मिक और राष्ट्रीय जीवन में सिख समुदाय का योगदान सदैव महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी रहा है। देश की आजादी से लेकर सीमाओं की रक्षा, कृषि, उद्योग, व्यापार, सेवा और समाज कल्याण तक सिख समाज ने अपनी मेहनत, साहस और सेवा भावना की विशिष्ट पहचान बनाई है। यही कारण है कि केंद्र की किसी भी सरकार से सिख समुदाय की अपेक्षाएं केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रहती, बल्कि धार्मिक विरासत, ऐतिहासिक स्थलों, न्याय और लंबे समय से लंबित सामुदायिक मुद्दों के समाधान से भी जुड़ी होती हैं।

वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद सिख समुदाय से जुड़े कई विषय राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं भी सिख इतिहास, गुरुओं की शिक्षाओं और सिख समुदाय के योगदान का कई अवसरों पर उल्लेख करते रहे हैं। आपातकाल के दौरान उनके पंजाब प्रवास और सिख वेश में रहने से जुड़े उनके सार्वजनिक रूप से बताए गए अनुभवों का भी उल्लेख किया जाता रहा है। इन अनुभवों ने सिख इतिहास और परंपराओं के प्रति उनकी समझ को प्रभावित किया, ऐसा उनका स्वयं का कथन रहा है।

मोदी सरकार के कार्यकाल में सिख समुदाय से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसले और पहल सामने आईं। इनमें करतारपुर साहिब कॉरिडोर का निर्माण और संचालन एक प्रमुख कदम रहा, इसके अलावा गुरुद्वारों में संचालित लंगर को कर राहत, श्री हरमंदिर साहिब को एफसीआरए से संबंधित अनुमति तथा गुरु साहिबान के प्रकाश पर्वों को राष्ट्रीय स्तर पर मनाने जैसी पहलों को भी सरकार सिख समुदाय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के रूप में प्रस्तुत करती रही है। सिख इतिहास की सबसे मार्मिक घटनाओं में से एक साहिबजादों की शहादत है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की पहल पर 26 दिसंबर को ‘वीर बाल दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। इस पहल के माध्यम से साहिबजादों के अद्वितीय साहस और बलिदान को देश की नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया गया। इसी क्रम में अफगानिस्तान से श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के पावन स्वरूपों को सम्मानपूर्वक भारत लाने की पहल भी सिख समुदाय के लिए भावनात्मक और धार्मिक महत्व रखती है। वर्ष 1984 के सिख कत्लेआम के पीड़ितों को न्याय दिलाने का प्रश्न भी लंबे समय से सिख समाज की प्रमुख चिंताओं में रहा है।

इस मामले में विभिन्न न्यायिक प्रक्रियाओं और जांच के बाद कुछ मामलों में दोषियों को सजा मिली तथा पीड़ित परिवारों के लिए मुआवजे और अन्य राहत संबंधी कदम उठाए गए। हालांकि, न्याय की प्रक्रिया को लेकर सिख समाज के विभिन्न वर्गों की अपेक्षाएं आज भी बनी हुई हैं। इन पहलों के बावजूद सिख समुदाय से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषय अभी समाधान की प्रतीक्षा में हैं। हरिद्वार स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारा ज्ञान गोदड़ी, गुरुद्वारा डांगमार और लंबे समय से बंदी सिखों की रिहाई जैसे मुद्दे आज भी सिख समाज के बीच चर्चा और चिंता का विषय हैं। इन मामलों को लेकर सिख संगठनों और समुदाय की ओर से लगातार आवाज उठाई जाती रही है।

ऐसे में समुदाय की उम्मीद है कि आने वाले समय में इन विषयों पर भी संवाद और संवैधानिक एवं कानूनी प्रक्रियाओं के माध्यम से कोई ठोस रास्ता निकलेगा। लेकिन सिख समुदाय की अपेक्षाएं केवल धार्मिक और ऐतिहासिक मुद्दों तक सीमित नहीं हैं। पंजाब का आर्थिक और सामाजिक भविष्य भी उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है। रोजगार के अवसर, नए निवेश, कृषि की बदलती आवश्यकताएं, युवाओं के लिए रोजगार एवं उद्यमिता के अवसर, उद्योग और नशे जैसी सामाजिक चुनौतियां पंजाब के सामने गंभीर विषय हैं।

राजनीतिक स्तर पर भी एक बदलाव देखने को मिल रहा है। लंबे समय से सिख समाज के एक वर्ग की भाजपा से दूरी की चर्चा होती रही है। लेकिन मनजिंदर सिंह सिरसा, अरविंदर सिंह लवली, तरविंदर सिंह मारवाह और दिल्ली भाजपा में डॉ. गुरमीत सिंह सूरा जैसे सिख नेताओं की सक्रिय भागीदारी ने पार्टी और सिख समुदाय के बीच संवाद को लेकर नई चर्चा को जन्म दिया है।

इसी के चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर दिल्ली के इंदिरा गांधी स्टेडियम में आयोजित कार्यक्रम में सिख समुदाय की बड़ी भागीदारी को भी देखा गया। दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में सिखों का कार्यक्रम में पहुंचना इस बात का संकेत माना जा सकता है। गतका-सिख विरासत का गौरव
सिख धर्म की पहचान केवल गुरबाणी, सेवा, सिमरन और लंगर तक सीमित नहीं है, बल्कि शौर्य, साहस, अनुशासन और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की परंपरा भी इसकी आत्मा में समाहित है।

सिख इतिहास इस बात का प्रमाण है कि जब भी मानवता, धर्म और कमजोरों की रक्षा का प्रश्न सामने आया, तब सिख गुरुओं और उनके अनुयायियों ने त्याग तथा वीरता की मिसाल पेश की। इसी गौरवशाली परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है गतका, जिसे सिख मार्शल आर्ट के रूप में जाना जाता है। लेकिन आज युवाओं के सामने शिक्षा, करियर, प्रतियोगी परीक्षाओं, डिजिटल मनोरंजन और सोशल मीडिया की अनेक चुनौतियां के रहते पारंपरिक खेलों और शारीरिक प्रशिक्षण के लिए समय निकालना युवाओं की प्राथमिकता में नहीं रह गया है।

इसी सोच के साथ गुरुद्वारा राजौरी गार्डन के अध्यक्ष हरमनजीत सिंह और उनकी टीम ने युवाओं को खासकर लड़कियों को गतका सिखलाई की शुरुआत की है। उनका मानना है कि यदि नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़े खेलों को नहीं सीखेगी, तो धीरे-धीरे इन परंपराओं को आगे बढ़ाने वाले प्रशिक्षित युवाओं की संख्या कम हो सकती है। इसलिए गुरुद्वारों, धार्मिक संस्थाओं, स्कूलों और सामाजिक संगठनों को मिलकर ऐसे प्रयास करने चाहिए, जिनसे बच्चों और युवाओं को गतका सीखने के लिए प्रेरित किया जा सके।

Team Desk