सदियों से समुद्र ने भारत के व्यापार को आगे बढ़ाया है, इसके तटीय क्षेत्रों की संस्कृतियों को आकार दिया है और इसके रणनीतिक प्रभाव को मजबूत किया है। आज कुल11,098 किलोमीटर लंबी तटरेखा, विशाल समुद्री संसाधनों और हिंद महासागर में एक प्रभावशाली स्थिति के साथ, यह भारत के विकास का एक नया आयाम प्रस्तुत करता है।
अब जबकि यह देश ‘विकसित भारत 2047’ की दिशा में आगे बढ़ रहा है, ‘नीली अर्थव्यवस्था’ (ब्लू इकोनॉमी) समृद्धि, स्थिरता और राष्ट्रीय शक्ति के एक सशक्त मार्ग के रूप में उभर रही है।
माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने इस अवसर को भारत के विकास के विजन के केन्द्र में रखा है। 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दिए गए अपने भाषण में उन्होंने ‘नीली अर्थव्यवस्था’को उन सात धाराओं या ‘सप्त-धारा’ में से एक बताया जो देश को आगे ले जाएंगी। नीली अर्थव्यवस्था’महज समुद्र से जुड़ी एक अर्थव्यवस्था भर नहीं है, बल्कि यह लोगों, विचारों और संभावनाओं से जुड़ी अर्थव्यवस्था है।
इसका संबंध मछुआरों व तटीय समुदायों के लिए बेहतर आजीविका सुनिश्चित करने, उद्यमियों व निवेशकों के लिए अवसर सृजित करने, खाद्य व ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और विज्ञान का सदुपयोग करके जलवायु के अनुकूल तट का निर्माण करने से है। इन सबसे भी ऊपर, यह आर्थिक प्रगति और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी को साथ-साथ निभाने से जुड़ी है। भारत ‘नीली अर्थव्यवस्था’को भिन्न-भिन्न योजनाओं के समूह के तौर पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास की एक समन्वित रणनीति के रूप में देखता है।
इसका मुख्य सिद्धांत यह है कि विज्ञान को ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जो लोगों तथा इस धरती के लिए ठोस मूल्य सृजित कर सकने वाले उद्यमों एवं संस्थानों को बढ़ावा दें। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय इस बदलाव के लिए वैज्ञानिक, तकनीकी और संस्थागत आधार तैयार कर रहा है। अगले चरण की पहचान पैमाने, तेजी और प्रभाव से होनी चाहिए। भारत को समुद्री गतिविधियों का एकीकृत प्रबंधन (इंटीग्रेटेड ओशन गवर्नेंस), बेहतर तालमेल, भरोसेमंद परियोजना पाइप लाइन और साक्ष्य आधारित निर्णय लेने हेतु डिजिटल तकनीक के अधिक उपयोग की जरूरत है।
‘नीली अर्थव्यवस्था’ में निवेश 2015–2025 के दौरान लगभग 3.9 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2026–2035 के दौरान लगभग 25.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच जाने का अनुमान है, जोकि एक ऐतिहासिक अवसर है। इस क्षमता को स्थायी नतीजों में बदलने हेतु नए प्रकार का वित्त पोषण, जिम्मेदार निजी पूंजी, स्टार्टअप की भागीदारी और पारदर्शी कार्यान्वयन जरूरी होगा। इस पूरी यात्रा में तटीय समुदायों का सक्रिय भागीदार और मुख्य लाभार्थी बने रहना जरूरी रहेगा।
सबसे रोमांचक अध्याय भारत के युवाओं से जुड़ा है। हर युवा उद्यमी, निवेशक, वैज्ञानिक, तकनीकी विशेषज्ञ,पेशेवर और कुशल श्रमिक के लिए समुद्री अर्थव्यवस्था (ओशन इकॉनमी) अनंत संभावनाएं लेकर आई है। बंदरगाह, नौवहन (शिपिंग), लॉजिस्टिक्स, मत्स्यपालन और पर्यटन जैसे पारंपरिक क्षेत्रों को स्वचालन (ऑटोमेशन), डिजिटल प्लेटफॉर्म, स्वच्छईंधन, विद्युत आधारित आवागमन (इलेक्ट्रिक मोबिलिटी) तथा भरोसेमंद कामकाज के जरिए नए सिरे से तैयार किया जा रहा है।
अपतटीय नवीकरणीय ऊर्जा, समुद्री जैव प्रौद्योगिकी, गहरे समुद्र से जुड़ी प्रौद्योगिकी, जलीय कृषि, मरीन रोबोटिक्स, समुद्र से संबंधित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, द्वीप पर्यटन (आइलैंड टूरिज्म), विद्युत चालित नाव (इलेक्ट्रिक बोट) और हरित समुद्री प्रणालियां (ग्रीन मैरीटाइम सिस्टम) जैसे उभरते हुए क्षेत्र नए करियर, कारोबार एवं निवेश के अवसर सृजित कर रहे हैं। ‘नीली अर्थव्यवस्था’ कोई भविष्य का वादा नहीं है। यह एक ऐसा राष्ट्रीय मिशन है, जिसके लिए ऐसी पीढ़ी की जरूरत है जो इसे आगे बढ़ाने का हौसला दिखाए। मैं भारत के युवाओं का आह्वान करता हूं कि वे बदलाव की इस ‘नीली लहर’ में अपनी कल्पनाशीलता, साहस और नई सोच का योगदान दें।
आइए, हम अपने महासागरों को नवाचार की प्रयोगशाला, आजीविका के स्रोत और स्थायी समृद्धि का जरिया बनाएं। हम सब मिलकर एक ऐसी समुद्री अर्थव्यवस्था का निर्माण करें जो उत्पादक होने के साथ-साथ जिम्मेदार भी हो, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी होने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर लोगों को सशक्त भी बनाए और ‘सप्त-धारा’की भावना के अनुरूप हो। ‘विकसित भारत 2047’ की दिशा में हमारी यात्रा न केवल जमीन पर, बल्कि उस विशाल नीले समुद्र में भी तय होगी जो इस देश को घेरे हुए है और हमें आपस में जोड़ता है।


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