देश के राजनीतिक पटल पर फिलहाल भारी घमासान मचा हुआ है। एक तरफ सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी अपने कुछ क्षेत्रीय व आंचलिक दलों के साथ एनडीए के रूप में खड़ी हुई है तो दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के साथ विभिन्न क्षेत्रीय दल इंडिया गठबन्धन बना कर डटे हुए हैं। दोनों के बीच देश की चुनाव प्रणाली खासकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर भयंकर युद्ध होता दिखाई पड़ रहा है किन्तु जहां तक विपक्षी एकता का सवाल है तो यह अभी तक बटी हुई है और इसमें क्षेत्रवार दरार साफ दिखाई पड़ती है।
उदाहरण के तौर पर दक्षिण भारत के प्रमुख राज्य तमिलनाडु की सबसे प्रभावी व प्रमुख पार्टी द्रमुक इंडिया गठबन्धन से बाहर हो चुकी है। इसी प्रकार सुदूर पूर्वी भारत की ओडिशा की प्रमुख बीजू जनता दल पार्टी भी इंडिया गठबन्धन का हिस्सा नहीं है। इसी प्रकार आन्ध्र प्रदेश की प्रमुख विपक्षी पार्टी वाईएसआर कांग्रेस और तेलंगाना की भारत राष्ट्रीय समिति भी इसका अंग नहीं है। इतना ही नहीं पश्चिम भारत की महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना पार्टी हालांकि सैद्धान्तिक रूप से इंडिया गठबन्धन का भाग है मगर व्यावहारिक तौर पर वह इस गठबन्धन से दूरी दिखाने का कोई भी अवसर नहीं गंवाती है।
हाल ही में जब इंडिया गठबन्धन ने चुनाव आयोग के विरुद्ध अपना प्रदर्शन किया तो शिवसेना ने मुम्बई की पार्टी महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के साथ मिलकर मुम्बई में अपना अलग प्रदर्शन ज्ञानेश कुमार के खिलाफ किया। बेशक दिल्ली में कांग्रेस के लोकसभा में विपक्ष के नेता श्री राहुल गांधी के नेतृत्व में इंडिया गठबन्धन के चुनाव आयोग के विरुद्ध हुए प्रदर्शन में बीजू जनता दल के नेता श्री नवीन पटनायक ने अपने दो राज्यसभा सांसदों को शिरकत करने के लिए भेजा परन्तु उनकी पार्टी इंडिया गठबन्धन की सदस्य तो नहीं है।
सवाल पैदा होता है कि यदि सभी विपक्षी दलों के लिए देश की चुनाव प्रणाली में ज्ञानेश कुमार गड़बड़ी कर रहे हैं तो ये सभी एक मंच को साझा करने से क्यों गुरेज कर रहे हैं? इनमें किस बात की हिचकिचाहट है? यह समीकरण क्यों इतनी उलझी हुई है कि दिल्ली की आम आदमी पार्टी गोवा में जाकर वहां की क्षेत्रीय पार्टी गोवा फाॅरवर्ड पार्टी के साथ मिलकर आसन्न विधानसभा चुनावों के लिए भारतीय जनता पार्टी व कांग्रेस दोनों के खिलाफ संयुक्त मोर्चा गठित करती है? आम आदमी पार्टी कल तक खुद को राष्ट्रीय स्तर पर इंडिया गठबन्धन का सदस्य बताती थी मगर पंजाब विधानसभा चुनावों को देखते हुए इसने अपनी राह बदल ली और यह पार्टी गठबन्धन से बाहर हो गई।
इसकी असली वजह यह है कि पंजाब में इस पार्टी की टक्कर विपक्ष में बैठी हुई कांग्रेस पार्टी से ही है। पिछले चुनावों में इसने पंजाब की गद्दी कांग्रेस से ही छीनी थी। भाजपा का इस राज्य में कोई खास प्रभाव नहीं है फिर भी यह पार्टी क्षेत्रीय दल अकाली दल के साथ मिलकर चुनावों को त्रिकोणीय बनाने के फेर में लगी हुई है। अकाली दल और भाजपा ऐतिहासिक तौर पर एक-दूसरे के सहयोगी भी रहे हैं मगर फिलहाल इनमें अनबन चल रही है। दरअसल देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के साथ कई प्रकार की जनाधार सम्बन्धी दिक्कते हैं।
खास कर उन क्षेत्रीय दलों के साथ जो इसी से बाहर निकले हैं। ऐसे दलों में श्री शरद पंवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस, ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस व आन्ध्र प्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस प्रमुख हैं। यदि ये पार्टियां राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार करती हैं तो इनका वोट बैंक या जनाधार खिसकने का खतरा खड़ा हो जाता है। इसलिए इन पार्टियों की कोशिश रहती है कि भाजपा के खिलाफ लड़ते हुए उनका कांग्रेस के साथ केवल सीटों पर समझौता हो जाये जिससे उनके स्वतन्त्र अस्तित्व पर कोई आंच न आये।
ऐसे दल कांग्रेस के साथ सहयोग तभी करते हैं जब उनकी निपट मजबूरी हो लेकिन उत्तर भारत में भी कांग्रेस के समक्ष विकट संकट रहता है क्योंकि इस क्षेत्र में भी जितनी क्षेत्रीय पार्टियां उभरी हैं वे सभी कांग्रेस का जनाधार हड़प कर ही उभरी हैं। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश के प्रभावी क्षेत्रीय दल समाजवादी पार्टी के साथ इसके सम्बन्ध खट्टे-मीठे रहते हैं। इस पार्टी के अध्यक्ष श्री अखिलेश यादव कभी कांग्रेस के साथ घी-शक्कर हो जाते हैं तो कभी दूध में पड़े नींबू की तरह। उत्तर प्रदेश के आसन्न विधानसभा चुनावों को देखते हुए दोनों पार्टियों के बीच सीटों को लेकर खींचतान इस कदर चल रही है कि इसका असर इंडिया गठबन्धन की एकता पर भी देखने को मिल जाता है।
मगर ये सभी क्षेत्रीय दल यह तथ्य भी भली-भांति जानते हैं कि राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में उनकी कोई हैसियत नहीं है और इसके लिए उन्हें कांग्रेस के छाते की जरूरत अनिवार्य है। इसी वजह से वे कांग्रेस के साथ अपने सम्बन्ध लुका-छिपी के खेल के मानिन्द रखते हैं। इस तरह हम देखते हैं कि पूर्व से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्षिण तक विपक्षी एकता की राह में अड़चनें बहुत हैं। इन अड़चनों को क्या ये दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कारगुजारियों के खिलाफ इकट्ठा होकर तोड़ सकेंगे ? यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा।


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