खेलो इंडिया खेलो…

Summary :

क्रिकेट के जुनून में डूबे देश से भारत अब तेजी से एक खेल प्रधान राष्ट्र के रूप में उभर रहा है। जिस खेल का नाम लीजिए, भारत ने उसमें अपनी पहचान बनाई है और यदि अभी नहीं बनाई है तो उस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसे महज एक उपलब्धि कहना कमतर आंकना होगा। ऐसा कहना उन तमाम उपलब्धियों को भी छोटा करना होगा जो भारत ने क्रिकेट के मैदान से बाहर हासिल की हैं। एक ऐसा देश जहां क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों में वैश्विक पहचान हासिल करना कभी बेहद मुश्किल था, वहां अब तस्वीर तेजी…

क्रिकेट के जुनून में डूबे देश से भारत अब तेजी से एक खेल प्रधान राष्ट्र के रूप में उभर रहा है। जिस खेल का नाम लीजिए, भारत ने उसमें अपनी पहचान बनाई है और यदि अभी नहीं बनाई है तो उस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसे महज एक उपलब्धि कहना कमतर आंकना होगा। ऐसा कहना उन तमाम उपलब्धियों को भी छोटा करना होगा जो भारत ने क्रिकेट के मैदान से बाहर हासिल की हैं। एक ऐसा देश जहां क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों में वैश्विक पहचान हासिल करना कभी बेहद मुश्किल था, वहां अब तस्वीर तेजी से बदल रही है और इसके परिणाम सबके सामने हैं। यह बदलाव केवल किसी एक खेल तक सीमित नहीं है, बल्कि उन खिलाड़ियों और नायकों की भी कहानी है जो अपनी जीत को अपने कंधों पर लेकर देश का गौरव बढ़ा रहे हैं।
नीरज चोपड़ा को ही उदाहरण के तौर पर लीजिए। वह एक सनसनी बन चुके हैं और उतने ही चर्चित हैं जितने भारत के क्रिकेट खिलाड़ी। अपनी दमदार भाला फेंकने की क्षमता के दम पर चोपड़ा ने ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। आज भारतीय खेल केवल जीत तक सीमित नहीं रह गया है। न ही यह किसी एक खेल, क्रिकेट या किसी अन्य खेल की कहानी है। आज यह उस विश्वास की कहानी है कि भारत और उसके खिलाड़ी बड़े लक्ष्य हासिल कर सकते हैं और करेंगे, वे अपनी पहचान बनाएंगे, इतिहास रचेंगे और समय की रेत पर अपने पदचिह्न छोड़ जाएंगे। जिन खिलाड़ियों और खेलों का लंबे समय से दबदबा रहा है उन्हें अब नीरज चोपड़ा जैसे खिलाड़ियों के लिए अपनी जगह बनानी पड़ रही है। हो सकता है कि हिमा दास उतनी लोकप्रिय न हों लेकिन उनका नाम सुनते ही पहचान की एक घंटी जरूर बजती है और ऐसी कई अन्य प्रतिभाएं भी हैं जिन्होंने भारतीय खेल जगत को नई दिशा दी है।
लेकिन क्या यह कहानी केवल हिमा दास, मैरीकॉम या ज्योति याराजी की है? या फिर लवलीना बोरगोहेन, मनप्रीत कौर और मीराबाई चानू की। इसका जवाब हां भी है और नहीं भी। हां, क्योंकि इन खिलाड़ियों ने भारत को गौरवान्वित किया है। उनकी जिजीविषा न केवल अनुकरणीय है, बल्कि प्रेरणादायक भी है और नहीं, क्योंकि कहानी केवल इन खिलाड़ियों और उनकी जीत तक सीमित नहीं है। इसके पीछे इससे कहीं बड़ी कहानी है, एक ऐसे देश में खेल की कहानी, जिसे नए सिरे से लिखा जा रहा है। एक ऐसा देश जो कभी केवल क्रिकेट को समझता था और क्रिकेट खेले जाने पर ही तालियां बजाने के लिए उठ खड़ा होता था, आज उसके खेल का परिदृश्य बदल रहा है।
व्यक्तिगत स्तर पर भारतीय खिलाड़ियों ने समय-समय पर सुर्खियां जरूर बटोरी हैं लेकिन वे लंबे समय तक लोगों के मन-मस्तिष्क पर अपनी छाप नहीं छोड़ पाए। आज जो बदलाव सबके सामने है, वह यह है कि ये व्यक्तिगत उपलब्धियां अब तेजी से एक ऐसे आंदोलन का रूप ले रही हैं, जहां जीत अपवाद नहीं बल्कि नियमितता बनती जा रही है। ऐसी जीतें इस बात की पुष्टि करती हैं कि भारत एक बड़े बदलाव और खेलों के एक नए आंदोलन का साक्षी बन रहा है और यह बदलाव किसी एक खेल, किसी एक मुकाबले, किसी एक मैच या किसी एक चैंपियन तक सीमित नहीं है। यह अलग-अलग खेलों, अलग-अलग मुकाबलों और अलग-अलग खिलाड़ियों के स्तर पर दिखाई दे रहा है। भारत आज जिस बदलाव का साक्षी है, वह एक व्यवस्थित परिवर्तन है, एक ऐसा परिवर्तन जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने गति दी है।
‘खेलो इंडिया’ ‘टारगेट ओलंपिक पोडियम योजना’ और आंकड़ों पर आधारित ‘कीर्ति’ जैसे कार्यक्रम सराहनीय पहल हैं। इससे भी महत्वपूर्ण है खेलों के लिए बढ़ता बजट और मजबूत होता ढांचागत सहयोग, जिसने प्रशिक्षण के स्तर को बेहतर बनाने और भारतीय खिलाड़ियों के लिए सुविधाओं में सुधार करने में अहम भूमिका निभाई है। मौजूदा खेल नीति की जगह लाई गई राष्ट्रीय खेल नीति 2025 का उद्देश्य एक ऐसा रोडमैप तैयार करना है। जिसके माध्यम से विज्ञान आधारित प्रशिक्षण, जमीनी स्तर पर भागीदारी और खेलों के समग्र विकास के जरिए भारत को एक ऐसी ताकत के रूप में स्थापित किया जा सके, जिसे दुनिया गंभीरता से ले।
यह नीति खेलों को जन आंदोलन के रूप में भी देखती है और देशभर में अभियानों के माध्यम से बड़े पैमाने पर लोगों की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में काम करेगी। इसके साथ ही खेल सुविधाओं तक सभी की समान पहुंच सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया गया है। नई नीति एक लंबे समय से चली आ रही कमी को भी दूर करने की दिशा में कदम बढ़ाती है। इसके तहत खेलों को स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने के साथ-साथ शिक्षकों को खेल शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सक्षम बनाने पर भी जोर दिया गया है।
शूटर अभिनव बिंद्रा का वह मशहूर कथन कि भारतीय खिलाड़ी जीतने के लिए नहीं, बल्कि आखिरी स्थान पर न आने के लिए खेलते हैं, अब बीते दौर की बात हो चुका है। क्योंकि आज प्रशिक्षण कहीं अधिक वैज्ञानिक और बेहतर तरीके से किया जा रहा है। खिलाड़ियों को वैश्विक स्तर का अनुभव मिल रहा है और छोटे शहरों से आने वाले खिलाड़ी भी जीतने की मानसिकता और प्रतिस्पर्धी जज्बे के साथ मैदान में उतर रहे हैं। आज सरकार खेलों की हर संभव विधा को उसका उचित स्थान दिलाने के लिए हरसंभव प्रयास कर रही है। यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि प्रतिभा जहां कहीं भी मौजूद हो उसे खोजा जाए, तराशा जाए और वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया जाए।
और जहां तक हमारे खिलाड़ियों की बात है, उनके नजरिए में भी बदलाव आया है और यह बदलाव बेहद बड़ा है। वे अब केवल हिस्सा लेने से संतुष्ट नहीं हैं, बल्कि देश के लिए पदक घर लाने को लेकर जुनूनी हैं। इतना ही नहीं, वे केवल पोडियम तक पहुंचने के लक्ष्य से भी संतुष्ट नहीं हैं। उनकी कोशिश अब सबसे ऊंचे पायदान पर कब्जा करने और स्वर्ण पदक जीतने की है। आज वे केवल लक्ष्य के प्रति केंद्रित नहीं बल्कि निडर भी हैं। वे उन पुरानी कहानियों को फिर से लिख रहे हैं जिनमें अब केवल एक शब्द है जीत।
अब बात केवल मैदान में उतरने और जीत-हार के बीच झूलने की नहीं रह गई है। यह उस जज्बे की कहानी है जो सिर्फ हम यह कर सकते हैं तक सीमित नहीं है, बल्कि उस अटूट आत्मविश्वास से भरा है जो कहता है ‘-हम यह करेंगे’और वह भी पूरे विश्वास के साथ। बेशक इस बदलाव को साबित करने के लिए उदाहरणों की लंबी सूची है लेकिन हाल के एशियाई खेलों की पदक तालिका पर एक नजर डालना ही काफी है, भारत ने कुल 85 पदक अपने नाम किए।
इनमें 21 स्वर्ण, 27 रजत और 37 कांस्य पदक शामिल हैं। कुल पदकों की संख्या के लिहाज से यह भारत का दूसरा सर्वश्रेष्ठ अभियान हो सकता है। तीन साल पहले 106 पदकों के रिकॉर्ड प्रदर्शन के मुकाबले यह संख्या कम जरूर है लेकिन 21 स्वर्ण पदक किसी एक संस्करण में भारत का दूसरा सर्वाधिक स्वर्ण पदक हासिल करने का रिकॉर्ड है।
सबसे उत्साहजनक बात यह है कि ये उपलब्धियां कई अलग-अलग खेलों में आई हैं, कबड्डी, निशानेबाजी, तीरंदाजी, एथलेटिक्स, कुश्ती और निश्चित रूप से क्रिकेट तथा हॉकी। इसके अलावा स्क्वैश, नौकायन और कुराश जैसे खेलों में भी भारत की मौजूदगी और सफलता कम नहीं रही। कुल मिलाकर ये दो सप्ताह भारतीय खेलों के लिए अविस्मरणीय रहे और इसे कम करके आंकना मुश्किल होगा।
अगर कुमकुम महोत्त ने एशियाई खेलों में व्यक्तिगत रिकर्व स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनकर इतिहास रचा, तो उनकी इस जीत ने भारत के लिए लॉस एंजिलिस 2028 ओलंपिक में महिला व्यक्तिगत रिकर्व स्पर्धा का कोटा हासिल करने में भी मदद की। प्रणवी उर्स ने गोल्फ में अपनी अलग पहचान बनाई और एशियाई खेलों में व्यक्तिगत स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनकर इतिहास रच दिया। खिलाड़ियों की मेहनत, समर्पण और अथक परिश्रम को किसी भी तरह कम करके नहीं आंका जा सकता। देश के लिए गौरव और सम्मान हासिल करने का श्रेय पूरी तरह उन्हें जाता है लेकिन इसके साथ ही खेलों को बढ़ावा देने और उन्हें केंद्र में लाने के लिए मोदी सरकार द्वारा किए गए प्रयासों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों को उनका उचित स्थान दिलाने, प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को चुनकर उन्हें बड़े मंच पर प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने और खेलों की सोच को केवल भागीदारी से आगे बढ़ाकर जीत तथा पोडियम के शीर्ष पायदान के लक्ष्य तक पहुंचाने में सरकार की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है।

Team Desk