चुनौती अल नीनो की, संकल्प जल संचय का

Summary :

आधुनिक युग में पृथ्वी का पर्यावरण एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहां प्रकृति के संकेत अत्यधिक मुखर हो रहे हैं और ऋतुओं का पारंपरिक चक्र पूरी तरह प्रभावित होता दिख रहा है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपनी दूरदर्शिता से मई माह के अंत में ही स्पष्ट संकेत दिए थे कि इस बार गर्मी बहुत अधिक पड़ने वाली है। उन्होंने संपूर्ण देशवासियों से पर्याप्त मात्रा में पानी पीने और जल स्रोतों के संरक्षण के प्रति सजग रहने की भावपूर्ण अपील की थी। प्रधानमंत्री का यह आह्वान आज के इस अभूतपूर्व पर्यावरणीय संकट में देश को एक सुरक्षित दिशा दिखाने…

आधुनिक युग में पृथ्वी का पर्यावरण एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहां प्रकृति के संकेत अत्यधिक मुखर हो रहे हैं और ऋतुओं का पारंपरिक चक्र पूरी तरह प्रभावित होता दिख रहा है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपनी दूरदर्शिता से मई माह के अंत में ही स्पष्ट संकेत दिए थे कि इस बार गर्मी बहुत अधिक पड़ने वाली है। उन्होंने संपूर्ण देशवासियों से पर्याप्त मात्रा में पानी पीने और जल स्रोतों के संरक्षण के प्रति सजग रहने की भावपूर्ण अपील की थी।

प्रधानमंत्री का यह आह्वान आज के इस अभूतपूर्व पर्यावरणीय संकट में देश को एक सुरक्षित दिशा दिखाने वाला मार्गदर्शक सिद्ध हो रहा है। वर्तमान समय में पृथ्वी का निरंतर बढ़ता तापमान और ऋतु चक्र में आ रहे तीव्र उतार-चढ़ाव इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि जलवायु परिवर्तन अब कोई भविष्य की दूरस्थ आशंका मात्र रहने के बजाय हमारे आज की सबसे बड़ी प्रशासनिक और सामाजिक चुनौती बन चुका है।
असमय होने वाली भारी वृष्टि, लंबे समय तक खिंचने वाला सूखा और ग्रीष्मकाल का यह उग्र स्वरूप आज संपूर्ण विश्व समुदाय के लिए गहरी चिंता का विषय है।

इस वैश्विक वायुमंडलीय उथल-पुथल के ठीक केंद्र में प्रशांत महासागर से उत्पन्न होने वाली एक अत्यंत जटिल जल-मौसम वैज्ञानिक परिघटना है, जिसे आधुनिक विज्ञान की भाषा में ‘अल नीनो’ के नाम से जाना जाता है। भारत जैसे विशाल, सघन जनसंख्या वाले और मूलतः खेती पर निर्भर देश के लिए अल नीनो का यह चक्र केवल किसी प्रयोगशाला के शोध का विषय भर हो ही नहीं सकता। यह सीधे तौर पर देश के करोड़ों किसान परिवारों के जीवन, उनकी आजीविका, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और हमारी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा से जुड़ा हुआ अत्यंत गंभीर और व्यावहारिक प्रश्न है।

समुद्र विज्ञान के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर के भूमध्य रेखीय क्षेत्र में पूरब से पश्चिम की ओर चलने वाली तेज व्यापारिक पवनें गर्म सतही जल को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की दिशा में धकेलती हैं। इसके प्रभाव से दक्षिण अमेरिका के पेरू तट के पास समुद्र की गहराइयों से पोषक तत्वों से युक्त ठंडा पानी ऊपर की ओर आता है जो वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण को संतुलित रखने में सहायक सिद्ध होता है और हमारे भारतीय मॉनसून को एक सकारात्मक संबल प्रदान करता है। परंतु, अल नीनो के प्रभाव काल में ये व्यापारिक पवनें अचानक शिथिल पड़ जाती हैं और कभी-कभी इनकी दिशा भी पूरी तरह विपरीत हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप समुद्र का वह गर्म सतही जल पश्चिम की ओर बढ़ने के बजाय वापस दक्षिण अमेरिका के तटीय क्षेत्रों की ओर लौटने लगता है।

समुद्र की सतह का यह असामान्य तापन संपूर्ण वायुमंडलीय दबाव के क्षेत्रों को उलट-पुलट कर देता है जिससे वैश्विक स्तर पर बादलों के बनने और उनके बरसने का पूरा भूगोल ही बदल जाता है। जहां पेरू के क्षेत्रों में इसके कारण अत्यधिक वर्षा और बाढ़ की स्थितियां निर्मित होती हैं, वहीं दूसरी ओर भारत और दक्षिण-पूर्वी एशिया के क्षेत्रों में हवा का दबाव बढ़ जाता है जो हमारे मॉनसून की मानसूनी हवाओं की गति को कमजोर कर देता है। भारत के धरातल पर इसका सीधा असर वर्षा की भारी कमी, खंडित मानसून और ग्रीष्मकाल में रिकॉर्ड तोड़ती गर्मी के रूप में परिलक्षित होता है। यह एक ऐसी वैज्ञानिक विभीषिका है जो देश के संपूर्ण जल विज्ञान चक्र और वाटर सर्कुलेशन को असंतुलित करने की पूरी क्षमता रखती है।

इसके साथ ही, भूगोलीय स्तर पर पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने के बदलते स्वरूप और अल नीनो के इस प्रभाव ने मिलकर देश के सम्मुख एक आसन्न जल संकट और मौसमी विक्षोभ की स्थिति उत्पन्न कर दी है। प्रधानमंत्री ने जल सुरक्षा को हमेशा से राष्ट्र की संप्रभुता और रक्षा सुरक्षा के समान ही सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान की है। उनका स्पष्ट मत रहा है कि जल संरक्षण को प्रत्येक नागरिक के दैनिक जीवन का एक स्वाभाविक संस्कार और एक विराट जन आंदोलन बनना होगा। इसी सोच के आधार पर उन्होंने ‘कैच द रेन’ अभियानों की शुरुआत की थी, जिसका मूल मंत्र यही है कि आधुनिक तकनीकों का उपयोग करके हमें वर्षा के जल की एक-एक बूंद को वहीं सहेजना होगा जहां वह धरती पर गिरती है।

वर्तमान सरकार ने देश के इतिहास में पहली बार ‘जल शक्ति मंत्रालय’ के रूप में एक एकीकृत और शक्तिशाली प्रशासनिक ढांचे का सृजन किया, जो देश के जल नियोजन (वाटर प्लानिंग) को एक नई, वैज्ञानिक और सुसंगत दिशा देने का एक अत्यंत युगांतकारी प्रयास साबित हुआ है। वहीं दूसरी ओर, ‘अटल भूजल योजना’ के अंतर्गत अत्यधिक दोहन वाले क्षेत्रों में सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देकर भूजल स्तर का वैज्ञानिक प्रबंधन और पुनर्भरण किया जा रहा है। कृषि क्षेत्र की स्थिरता के लिए ‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना’ के तहत ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ के सिद्धांत पर ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों का देशव्यापी विस्तार किया जा रहा है ताकि पानी के एक-एक अंश का सर्वोत्तम उपयोग हो सके।

इसके साथ ही, जल निकायों के संरक्षण के लिए शुरू किया गया ‘अमृत सरोवर मिशन’ अत्यंत प्रभावी सिद्ध हो रहा है, जिसके तहत देश के प्रत्येक जिले में न्यूनतम 75 ऐतिहासिक और नए तालाबों का निर्माण व जीर्णोद्धार करके स्थानीय जल स्रोतों को एक नया जीवन प्रदान किया जा रहा है। इन तमाम राष्ट्रीय पहलों के साथ-साथ सरकार ‘रिवर इंटरलिंकिंग’ (नदियों को आपस में जोड़ने) के साहसिक प्रोजेक्ट्स और समुद्र के खारे पानी को शुद्ध करने की आधुनिक ‘डीसेलिनेशन’ तकनीकों पर भी पूरी गति से काम कर रही है ताकि देश का कोई भी हिस्सा जल संकट से प्रभावित न रहे।

जलवायु परिवर्तन और जल संकट की यह विकराल मार केवल मानव समाज की सीमाओं तक ही सीमित रहने वाली है। विकसित भारत बनने की राह में जल सुरक्षा और जल स्रोतों का संरक्षण एक अत्यंत महत्वपूर्ण और आधारभूत पहल सिद्ध होगी। ‘जल है तो कल है’ का यह कालजयी उद्घोष मात्र एक साधारण नारा रहने के बजाय मानव सभ्यता के अस्तित्व का सबसे बड़ा और अटल सत्य है। आज समय का यही तकाजा है कि हम सब मिलकर यह अटूट संकल्प लें कि हम पानी की प्रत्येक बूंद का संपूर्ण आदर करेंगे, इसके अनावश्यक अपव्यय को पूरी तरह रोकेंगे और अपने आसपास के पारंपरिक जल स्रोतों को प्रदूषण मुक्त रखकर उन्हें पुनर्जीवित करेंगे।

बेजुबान जीव-जंतुओं के प्रति अपनी करुणा को अपने व्यवहार में उतारते हुए प्रकृति के साथ एक संतुलित, मर्यादित और आत्मीय संबंध स्थापित करना आज के समय की सबसे बड़ी पुकार है। आज सामूहिक रूप से लिया गया हमारा यह छोटा सा संकल्प ही आने वाले समय में एक अत्यंत सशक्त, समृद्ध, आत्मनिर्भर, सुरक्षित और जल-सुरक्षित भारत के रूप में ‘विकसित भारत’ की सबसे सुदृढ़ नींव रखने में पूरी तरह सफल सिद्ध होगा।

Team Desk