चाइल्ड ट्रैफिकिंग की बढ़ती घटनाएं चिंताजनक

Summary :

चाइल्ड ट्रैफिकिंग यानी बाल तस्करी के शिकार बच्चे शोषण, अपहरण और दुर्व्यवहार का शिकार होते हैं, तमाम कानून होने पर भी भारत में यह थम नहीं रहा। ना सिर्फ बच्चों के जीवन पर, बल्कि समाज पर भी इसके बहुत गंभीर प्रभाव हो रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 2023 में भारत में करीब बीस हजार बच्चे ऐसे थे जो सड़कों पर रहते थे। इनमें से सिर्फ दस हजार बच्चे ही ऐसे थे जो अपने परिवारों के साथ सड़कों पर रहते थे और बाकी बच्चे बेघर थे। ये बेघर बच्चे ना सिर्फ बाल श्रम और तस्करी का शिकार होते हैं,…

चाइल्ड ट्रैफिकिंग यानी बाल तस्करी के शिकार बच्चे शोषण, अपहरण और दुर्व्यवहार का शिकार होते हैं, तमाम कानून होने पर भी भारत में यह थम नहीं रहा। ना सिर्फ बच्चों के जीवन पर, बल्कि समाज पर भी इसके बहुत गंभीर प्रभाव हो रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 2023 में भारत में करीब बीस हजार बच्चे ऐसे थे जो सड़कों पर रहते थे। इनमें से सिर्फ दस हजार बच्चे ही ऐसे थे जो अपने परिवारों के साथ सड़कों पर रहते थे और बाकी बच्चे बेघर थे। ये बेघर बच्चे ना सिर्फ बाल श्रम और तस्करी का शिकार होते हैं, बल्कि उन्हें यौन शोषण, शारीरिक दुर्व्यवहार और उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ता है।

संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा के अनुसार किसी व्यक्ति को बल प्रयोग कर, डराकर, धोखा देकर, हिंसा जैसे तरीकों से भर्ती, तस्करी या बंधक बना कर रखना मानव तस्करी के अंतर्गत आता है। गरीबी और अशिक्षा है इसका सबसे बड़ा कारण है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के मुताबिक, भारत में हर आठ मिनट में एक बच्चा लापता होता है, जो बाल तस्करी की गंभीरता को दर्शाता है। हालांकि साल 2022 में आई रिपोर्ट में बाल तस्करी के मामलों को स्पष्ट रूप से अलग श्रेणी में नहीं दर्शाया गया है, लेकिन बच्चों से संबंधित अपराधों के आंकड़े इस समस्या की गंभीरता को उजागर करते हैं।

चाइल्ड ट्रैफिकिंग के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बीते साल अप्रैल में एक महत्वपूर्ण निर्देश दिया। इसमें कहा गया है कि सभी राज्यों के उच्च न्यायालय बाल तस्करी से संबंधित लंबित मुकदमों की स्थिति की जानकारी दें और छह महीने के भीतर ऐसे मुकदमों का निस्तारण करें। केंद्र सरकार ने तब सुप्रीम कोर्ट को बताया कि साल 2020 से लगभग 36 हजार बच्चे गायब हैं जिन्हें अभी तक खोजा नहीं जा सका है।
हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में बच्चों की खरीद-फरोख्त और तस्करी से जुड़े अंतर्राज्यीय गिरोह के भंडाफोड़ ने हरियाणा में भी बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से सटे होने के कारण हरियाणा लंबे समय से बच्चों की गुमशुदगी, बाल श्रम, भीख मंगवाने वाले गिरोहों और मानव तस्करी के नेटवर्क के निशाने पर रहा है।

हालांकि, हरियाणा पुलिस ने पिछले कुछ वर्षों में हजारों बच्चों को खोजकर उनके परिवारों से मिलाने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। हरियाणा मानवाधिकार आयोग ने हाल ही में एनसीआरबी के आंकड़ों पर चिंता जताते हुए कहा कि राज्य में बच्चों के खिलाफ अपराधों में वृद्धि दर्ज की गई है। आयोग के अनुसार, वर्ष 2024 में हरियाणा में बच्चों के खिलाफ अपराधों के 7547 मामले दर्ज हुए, जो 2023 की तुलना में करीब 18 प्रतिशत अधिक हैं। इनमें अपहरण, यौन अपराध, तस्करी और अन्य गंभीर अपराध शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि हर गुमशुदा बच्चा तस्करी का शिकार नहीं होता, लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे मानव तस्करी, बाल श्रम, जबरन भीख मंगवाने, अवैध गोद लेने और यौन शोषण के नेटवर्क में फंस जाते हैं।

दिल्ली पुलिस द्वारा हाल के वर्षों में कई बाल तस्करी गिरोहों का पर्दाफाश किया गया है, जिनमें नवजात बच्चों को लाखों रुपये में बेचने और फर्जी दस्तावेजों के जरिए अवैध गोद दिलाने के मामले सामने आए हैं। इन गिरोहों के तार कई राज्यों से जुड़े पाए गए। बच्चों की गुमशुदगी और तस्करी पर अंकुश लगाने के लिए हरियाणा पुलिस ने ‘ऑपरेशन मुस्कान’ और एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट के जरिए लगातार अभियान चलाए हैं। वर्ष 2020 में हरियाणा पुलिस ने 1716 गुमशुदा बच्चों को खोजकर उनके परिवारों से मिलाया। इनमें से 283 बच्चों को विशेष एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग इकाइयों ने बरामद किया था।

गुरुग्राम, फरीदाबाद, पलवल, नूंह, पानीपत, सोनीपत और बहादुरगढ़ जैसे एनसीआर से जुड़े जिले लंबे समय से संवेदनशील माने जाते हैं। औद्योगिक क्षेत्रों, निर्माण स्थलों और शहरी झुग्गियों में बाल श्रम तथा बाल तस्करी के मामलों की आशंका अधिक रहती है। पुलिस और बाल संरक्षण इकाइयां ऐसे क्षेत्रों में नियमित अभियान चलाती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, अपहरण के मामले देश भर में सबसे ज्यादा यूपी में ही दर्ज होते हैं। साल 2022 में यूपी में 16,262 अपहरण के मामले दर्ज किए गए थे। कोविड के बाद यूपी में चाइल्ड ट्रैफिकिंग के मामलों में अचानक काफी बढ़ाैतरी हुई। कोविड से पहले यानी साल 2019 में यूपी में चाइल्ड ट्रैफिकिंग के जहां 267 मामले दर्ज थे, वहीं 2022 में ये संख्या बढ़कर 1214 हो गई।

बाल श्रम पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता और नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी की संस्था कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रन फाउंडेशन की ओर से तैयार की गई एक रिपोर्ट बताती है कि कोविड-19 के बाद चाइल्ड ट्रैफिकिंग के मामलों में 68 फीसदी तक की बढ़ाैतरी दर्ज की गई है। चाइल्ड ट्रैफिकिंग की मुख्य वजहें अशिक्षा, गरीबी और बेरोजगारी तो हैं ही, इसके अलावा सामाजिक भेदभाव की वजह से दलित और आदिवासी समुदाय के बच्चों के लिए इसका शिकार होने का जोखिम ज्यादा रहता है। आर्थिक तंगी के कारण कई परिवार अपने बच्चों को काम पर भेजने के लिए मजबूर होते हैं और कई बार ये बच्चे तस्करों के हाथ लग जाते हैं।

महानगरों में घरेलू कामों के लिये भी लड़कियों की तस्करी होती है। चाइल्ड पोर्नोग्राफी के लिये भी बच्चों की तस्करी होती है। राज्यों की पुलिस बाल तस्करी को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है लेकिन कई बार कानूनी दांव-पेंच और इस अपराध में लगे लोगों के राजनीतिक गठजोड़ उसे भी असहाय कर देते हैं। जानकारों का कहना है कि चाइल्ड ट्रैफिकिंग को लेकर कानून तो हैं लेकिन सबसे बड़ी कमी उन्हें लागू करने और बच्चों की देखभाल में है। गरीबी और आर्थिक असमानता के चलते बच्चे अक्सर तस्करी के शिकार हो जाते हैं और आसान लक्ष्य बन जाते हैं।

कानूनों का कमजोर प्रवर्तन भी इसे बढ़ावा देता है। कानूनों का सख्ती से पालन नहीं किया जाता है तो तस्कर बच निकलते हैं। और हां, प्रौद्योगिकी का दुरुपयोग भी चाइल्ड ट्रैफिकिंग को बढ़ावा देता है। आजकल तस्कर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का उपयोग करके बच्चों से मेलजोल बढ़ाते हैं और फिर उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं। कानूनों का कमजोर प्रवर्तन भी इसे बढ़ावा देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यों के बीच बेहतर समन्वय, त्वरित सूचना साझा करने की व्यवस्था और गुमशुदा बच्चों की तत्काल खोज ही इस अपराध पर प्रभावी रोक लगा सकती है।

Team Desk