हवाई चप्पल में हवाई यात्रा का करिश्मा

Summary :

दुनिया में यात्रियों को लेकर हवाई जहाज को उड़ते हुए 114 वर्ष हो गए जबकि भारत में 94 वर्ष होने वाले हैं। मगर संभवत: कभी ऐसा नहीं हुआ कि विमान में बैठे हुए सारे यात्री किसान हों। कम से कम मेरी जानकारी में तो ऐसा कोई उदाहरण नहीं है। इतिहास रचने का यह काम किया है उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी कहा था कि उनका सपना है कि हवाई चप्पल वाले लोग भी हवाई जहाज में यात्रा करें, यह सपना सच होने की कहानी भी है। प्रसंगवश बता दूं कि भारत में लो…

दुनिया में यात्रियों को लेकर हवाई जहाज को उड़ते हुए 114 वर्ष हो गए जबकि भारत में 94 वर्ष होने वाले हैं। मगर संभवत: कभी ऐसा नहीं हुआ कि विमान में बैठे हुए सारे यात्री किसान हों। कम से कम मेरी जानकारी में तो ऐसा कोई उदाहरण नहीं है। इतिहास रचने का यह काम किया है उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी कहा था कि उनका सपना है कि हवाई चप्पल वाले लोग भी हवाई जहाज में यात्रा करें, यह सपना सच होने की कहानी भी है। प्रसंगवश बता दूं कि भारत में लो कॉस्ट एयरलाइंस की शुरुआत 2003 में कैप्टन जीआर गोपीनाथ ने एयर डेक्कन के रूप में की, मगर 2007 में एयर डेक्कन का विलय किंगफिशर एयरलाइंस में हो गया।

वह भी बंद हो गई, फिर गो फर्स्ट, एयर कोस्टा, ट्रू जेट, स्पाइसजेट, अकासा एयर, इंडिगो, एयर इंडिया एक्सप्रेस जैसी कंपनियां शुरु हुई। जब प्रफुल्ल पटेल विमानन मंत्री थे तब उन्होंने लो कॉस्ट एयर लाइंस पर खास ध्यान दिया था। छोटे-छोटे शहरों तक विमान सेवा शुरू की। मगर विभिन्न कारणों से कुछ एयरलाइंस बंद हो गई, कुछ अभी भी चल रही हैं, मगर कभी ऐसा नहीं हुआ कि किसी भी विमान के सारे यात्री केवल किसान रहे हों। नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट से 15 जून की सुबह जब इंडिगो विमान ने लखनऊ के लिए पहली उड़ान भरी तो उसमें 172 किसान यात्रा कर रहे थे जिनमें 20 महिला किसान थीं।

इन सभी ने एयरपोर्ट के लिए जमीन दी है, जरा सोचिए कि पहली उड़ान में किसानों को यात्रा कराने की कल्पना कितनी भावनात्मक रही होगी। इन किसानों ने हवा में विमानों को गुजरते हुए देखा होगा लेकिन कल्पना नहीं की होगी कि उनकी जमीन पर अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट बनेगा। वर्ष 2001 में राजनाथ सिंह ने इसकी कल्पना की थी और ताज इंटरनेशनल एविएशन हब नाम दिया था। मायावती ने 2010 में ब्लू प्रिंट तैयार कराया मगर बात आगे नहीं बढ़ी।

योगी आदित्यनाथ ने जब यूपी की कमान संभाली तो वे इंटरनेशनल एयरपोर्ट के लिए दृढ़ संकल्पित थे। भूमि अधिग्रहण के लिए किसानों की सहमति प्राप्त करने के लिए उन्होंने सौ दिनों का लक्ष्य दिया मगर किसानों ने ना कर दिया। इसके बाद योगी आदित्यनाथ खुद जेवर पहुंचे, फिर भी किसान नहीं माने, तब योगी जी ने कहा कि एक घंटे का समय देता हूं। यह अवसर आपके लिए खुद की किस्मत बदलने का है। योगी जी का करिश्मा कहिए कि किसान मान गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवंबर 2021 में निर्माण की आधारशिला रखी और पांच साल से भी कम समय में विमान ने टेक ऑफ कर लिया। मेरी हमेशा यह मान्यता रही है कि अधिकारी वही रहते हैं, व्यवस्था वही रहती है लेकिन नेतृत्व वो फैक्टर, है जो परिणामों को प्रभावित करता है।

योगी जी का नेतृत्व कौशल और उसके पीछे की भावनात्मकता ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी है। पहली फ्लाइट में वहां के किसानों को यात्रा करवा कर उन्होंने बड़ा भावनात्मक सम्मान तो दिया ही, लखनऊ में प्रत्यक्ष तौर पर किसानों को सम्मानित भी किया। अभी एयरपोर्ट का पहला चरण पूरा हुआ है, तीन चरण अभी बाकी हैं। यह सबसे ग्रीन एयरपोर्ट तो है ही, यहां घने कोहरे में भी विमान सुरक्षित लैंडिंग कर सकेंगे, जो दिल्ली-एनसीआर के लिहाज से बड़ी सुविधा होगी। जब इसके सभी चरण पूरे हो जाएंगे तो आठ रनवे के साथ यह एशिया का सबसे बड़ा एयरपोर्ट होगा और इसमें सालाना 7 करोड़ यात्रियों को संभालने की क्षमता होगी। वाकई योगी जी कमाल कर रहे हैं।
हम छोड़ चले हैं इस महफिल को…

जो कल तक गलबहियां डाले घूम रहे थे, दोस्ती की कसमें खाते थकते नहीं थे, अपने नेता की हर बात पर न्यौछावर हो जाने को लालायित रहते थे, नेता ने कुछ कहा कि उस बात को हवा में ही लोक लेने को उतावले रहते थे, वे न जाने क्यों अचानक महफिल छोड़ गए। पश्चिम बंगाल में दीदी की तूती बोलती थी, बाकी सब चुप रहते थे, दीदी राजनीतिक रूप से जरा कमजोर क्या हुईं, कुछ तो एकदम से बेवफा हो गए। वो कोरस गाने लगे… हम छोड़ चले हैं महफिल को! बात यहीं तक नहीं रुकी, महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के कुछ अपने तो पहले ही जा चुके थे, जो बचे थे उनमें से कुछ और महफिल छोड़े जा रहे हैं। कितनी अजीब बात है ना कि जिस राजनीति की बुनियाद में विश्वास सबसे बड़ा तत्व होना चाहिए, वही अविश्वासी हो रहा है।

जनता विश्वास के आधार पर वोट देती है कि ये बंदा ठीक महफिल में है तो ठीक काम करेगा। मगर बंदे ने तो महफिल ही बदल ली। अब यह तो आपको स्वीकार करना ही पड़ेगा कि बड़ी महफिल का बड़ा चार्म होता है। वैसे यह सब पहली बार नहीं हो रहा है, याद ही होगा कि बड़ी महफिल के आकर्षण में कांग्रेस के भी न जाने कितने दिग्गज बेवफा हो गए।
वो तो आका की बात भी नहीं सुन रहा !

मुहावरे की भाषा में कहें तो अमेरिका-ईरान के बीच एमओयू पर सिग्नेचर की स्याही सूखी भी नहीं थी कि तलवारें फिर खिंच गईं, इधर इजराइल है कि अपने आका अमेरिका की बात ही नहीं सुन रहा। ट्रम्प की डांट के बाद भी उसने लेबनान पर हमला जारी रखा है, मैं लेबनान गया हूं और जानता हूं कि वहां के लोग बड़े आत्मसम्मान वाले हैं। वे हार नहीं मानेंगे, अब अमेरिका की समस्या है कि वो इजराइल को काबू में कैसे रखे। ये फोटो भी बड़ी अजीब चीज है…

ट्रम्प साहब भी बड़े दिलचस्प इंसान हैं! अब वे कह रहे हैं कि इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी ने उनके साथ तस्वीर खिंचवाने के लिए मिन्नतें कीं। जाहिर सी बात है कि मेलोनी नाराज हो गई हैं। उन्होंने कहा कि ये सच नहीं है लेकिन ट्रम्प साहब कहां मानने वाले हैं, वे तो बस अपनी बात दोहराए जा रहे हैं। आपको क्या लगता है? मेलोनी ने मिन्नतें की होंगी?

विजय दर्डा