अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते के अंतिम परिणाम को लेकर अनिश्चितता का वातावरण बना हुआ है। स्विट्जरलैंड में दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच हुई पहले दौर की बातचीत में भी तनातनी बनी रही। अमेरिका प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व जे.डी. वेंस, विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और वरिष्ठ सलाहकार जेरेड कुशनर ने किया। जबकि ईरान की तरफ से प्रतिनिधित्व विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसदीय अध्यक्ष मोहम्मद गालिबाफ ने किया। यद्यपि 80 मिनट की वार्ता के बाद ईरान प्रतिनिधिमंडल बैठक से बाहर आ गया और उसने शांति समझौते के उल्लंघन का आरोप लगाया।
तनाव के बावजूद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने सकारात्मक रुख अपनाते हुए कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प व्यापक क्षेत्रीय युद्ध विराम हासिल करने के लिए तेहरान के साथ राजनयिक संंबंध फिर से शुरू करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। जेडी वेंस ने वार्ता को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि हमारे सामने सवाल यह है कि हम मिलकर और कितना कुछ हासिल कर सकते हैं? क्या हम एक नई शुरुआत कर सकते हैं? क्या हम मध्य पूर्व में संबंधों को स्थायी रूप से बदल सकते हैं? या फिर हम पुराने तरीके पर लौट जाएंगे, जो हमारी पसंद नहीं है लेकिन निश्चित रूप से ऐसा होने की पूरी संभावना है।”
वेंस ने कहा कि ट्रम्प ने अमेरिकी टीम को ईरान के साथ संबंधों में मौलिक बदलाव लाने का निर्देश दिया था, यदि तेहरान उन गतिविधियों को छोड़ने की इच्छा दिखाता है जिन्हें वाशिंगटन अस्थिरता पैदा करने वाला मानता है। वेंस ने कहा, “राष्ट्रपति ट्रम्प ने हमसे जो करने को कहा है, वह ईरान के लोगों के साथ हमारे संबंधों को बदलने के लिए एक नई शुरुआत करना है।” यदि ईरान का नेतृत्व क्षेत्रीय अस्थिरता का कारक बनने से पीछे हटने को तैयार है, यदि वे दीर्घकालिक रूप से परमाणु हथियार बनाने की महत्वाकांक्षाओं को छोड़ने को तैयार हैं तो संयुक्त राज्य अमेरिका उस देश के साथ अपने संबंधों को मौलिक रूप से बदलने को तैयार है।
लेकिन असली मुद्दा लेबनान में इजराइली हमलों का रहा। यद्यपि डोनाल्ड ट्रम्प ने इजराइल को कड़ी फटकार लगाते हुए उन्हें लेबनान और हिजबुल्लाह के मामले में जिम्मेदारी दिखाने को कहा है। इजराइल लगातार हिजबुल्लाह के ठिकानों को निशाना बनाता जा रहा है। जिसकी वजह से रोज लोग मर रहे हैं लेकिन नेतन्याहू शांति समझौते के विरुद्ध सख्त रवैया अपनाए हुए है। ईरान कई सालों से हिजबुल्लाह का पालन पोषण कर रहा है और इजराइल के विरुद्ध प्रोक्सी युद्ध में उसका इस्तेमाल कर रहा है। यद्यपि जेडी वेंस सुलह का रुख अपनाए हुए हैं लेकिन ट्रम्प वार्ता के दौरान भी तेहरान को कड़ी चेतावनियां देने से बाज नहीं आ रहे।
ट्रम्प दबाव की रणनीति अपना रहे हैं और लगातार धमकी दे रहे हैं कि अगर ईरान ने लेबनान में हिजबुल्लाह की गतिविधियों पर लगाम नहीं लगाई तो फिर अमेरिका ईरान पर बहुत बड़ा प्रहार करेगा। इसी बीच ट्रम्प ने एक नया राग छेड़ दिया है। ट्रम्प लेबनान और हिजबुल्लाह से जुड़े मामलों में सीरिया को जिम्मेदारी सौंपने की बात कह रहे हैं। ट्रम्प का मानना है कि सीरियाई सरकार लेबनान में ईरान समर्थित आतंकी समूह हिजबुल्लाह की गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए एक बड़ी भूमिका निभा सकता है जबकि सीरिया के राष्ट्रपति अहमद अल लेबनान के मामलों में अपने हाथ नहीं जलाना चाहते। उनका कहना है कि वे लेबनान में कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे लेकिन वे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए प्रयासों का समर्थन करते हैं।
सवाल यह भी है कि क्या इजराइल सीरिया की भूमिका को स्वीकार करेगा। स्विट्जरलैंड में टकराव के बावजूद बातचीत की निगरानी के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन भी किया गया। दोनों पक्षों ने लेबनान में सैन्य अभियानों को समाप्त करने के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य पर एक संचार लाइन और एक संघर्ष निवारण सैल की स्थापना की। इसी बीच अमेरिका ने ईरानी तेल निर्यात पर लगे कुछ प्रतिबंधों को हटा दिया है और कुछ जब्त सम्पतियों को भी जारी कर दिया है। बातचीत में मध्यस्थ कतर का कहना है कि वार्ता में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है क्योंकि दोनों पक्षों ने 60 दिवसीय रोड मैप पर सहमति जताई है। जेडी वेंस शांति समझौते को लेकर सकारात्मक रुख इसलिए अपनाए हुए हैं क्योंकि उनका राजनीतिक भविष्य इसी समझौते पर टिका हुआ है।
जेडी वेंस अमेरिका के भावी राष्ट्रपति पद के चुनावों में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हो सकते हैं। उन्हें डोनाल्ड ट्रम्प के राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में माना जा रहा है। अगर शांति समझौता विफल रहता है तो ट्रम्प इसका पूरा दोष वेंस पर डाल देंगे। अमेरिका में भी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। जेडी वेंस के लिए शांति समझौता उनके राजनीतिक करियर के लिए दोधारी तलवार बन चुका है। हालांकि मार्को रूबियो भी राष्ट्रपति पद के लिए संभावित दावेदार हैं लेकिन ज्यादातर सर्वेक्षणों में वेंस को बढ़त दिखाई दे रही है। अमेरिका और खाड़ी देश जल्द से जल्द होर्मुज को खुलवाना चाहते हैं क्योंकि ऐसा न होने की स्थिति में तेल और ऊर्जा का संकट बढ़ जाएगा।
संयुक्त अरब अमीरात तो होर्मुज पर निर्भरता कम करने की रणनीति पर काम कर रहा है। भारत के लिए भी होर्मुज संकट एक बड़ा सबक है। भारत के लिए आपूर्ति शृंखला में विविधता लाना वैकल्पिक समुद्री एवं जमीनी गलियारों में निवेश करना और रणनीतिक साझेदारियों को मजबूत बनाना प्राथमिकता होनी चाहिए। तनातनी में खत्म हुई शांति वार्ता में प्रगति तो हुई है लेकिन रास्ते अभी भी जटिल हैं। बेहतर यही होगा कि अमेरिका-ईरान संयम से काम लेते हुए नई शुरूआत करें और पूरी दुनिया को राहत प्रदान करें।


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