‘देखो मेरी सोहबतों में तुम खराब हो सकते हो
चली जरा हवा तो चिंगारी से तुम हो सकते हो’
यूपी से लेकर बंगाल तक इस इलेक्शन इंजीनियर का स्वअन्वेषित ‘बंसल मॉडल’ सुपर हिट है। ये इलेक्शन इंजीनियर कोई और नहीं बल्कि भाजपा महासचिव सुनील बंसल हैं, जिन्हें चुनाव के जमीनी और माइक्रो मैनेजमेंट में महारथ हासिल है। इनकी चुनावी रणनीति व बूथ मैनेजमेंट का अचूक नुस्खा भाजपा में पिछले 12-13 सालों में इतना कामयाब रहा है कि पार्टी व संघ दोनों ने ही इसे ‘बंसल मॉडल’ का नाम दे दिया है। बंगाल में भाजपा को 2 से 207 सीटों के जादूई आंकड़े तक पहुंचाने का श्रेय भी बहुत हद तक इसी चुनावी रणनीतिकार को जाता है, जो अपनी 1500 लोगों की एक समर्पित टीम के साथ 16-18 घंटे तक लगातार मैराथन चुनावी रणनीतियां बुनते हैं और इसे अमलीजामा पहनाते हैं। अपने व्यापक डेटा बैंक व इसके विश्लेषण से प्राप्त परिणामों पर अमल करते बंसल ने पहले भी यूपी के चार चुनावों में भाजपा को कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ाई हैं। 2014 से लेकर 2022 तक में संपन्न हुए लोकसभा, विधानसभा व स्थानीय निकायों के चुनावों में भाजपा ने इसी ‘बंसल मॉडल’ के बलबूते खूब कामयाबी हासिल की है। 2024 के लोकसभा चुनाव में जब भाजपा की सीटें 62 से घटकर मात्र 32 रह गई तो इस 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव की पूर्व बेला में पार्टी को फिर से ‘बंसल मॉडल’ की याद आई है। उन्हें 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव का जिम्मा अभी से सौंप दिया गया है, क्योंकि इस बार ‘बंगाल फतेह’ वाली टीम को भी सुनील बंसल ही लीड कर रहे थे। इस बार यूपी को लेकर भगवा पार्टी की चिंताएं किंचित गंभीर हैं, क्योंकि इस बार यहां जातिगत समीकरणों के आइने चटक रहे हैं, पीडीए अलग से अपनी ताकत दिखा रहा है, यूजीसी को लेकर अब भी अगडे़ वर्गों में नाराजगी है, राज्य का ब्राह्मण वर्ग अपने को छला हुआ महसूस कर रहा है, प्रदेश के नेताओं की आपसी रार से भी पार्टी का अहित हो रहा है, पार्टी ने पंकज चौधरी के रूप में नया पार्टी अध्यक्ष बना तो दिया है पर इनका असर दूरगामी नहीं दिख रहा। नए अध्यक्ष चौधरी के समक्ष सबसे महती चुनौती सरकार व संगठन के बीच फिसलते समन्वय पार्टी कार्यकर्ताओं में बढ़ते असंतोष और जमीनी फीड बैक की कमी को लेकर है। भाजपा के बड़े नेताओं का मानना है कि सुनील बंसल यहां रामबाण की तरह काम कर सकते हैं, क्योंकि वे पार्टी के सबसे बड़े संकटमोचक भी हैं, यह काम उन्होंने बखूबी ओडिशा में भी कर दिखाया था। ये बड़े नेता लगे हाथ इन्हें पंजाब की भी जिम्मेदारी सौंपना चाहते हैं, वे चाहते हैं कि पंजाब में भी बंसल माइक्रोमैनेजमेंट कर बूथ लेवल तक की रिपोर्ट से उन्हें अवगत कराएं, अब देखना होगा कि यह इलेक्शन इंजीनियर एक साथ इतनी चुनौतियों को कैसे स्वीकार कर पाता है।
कई राज्यों के कांग्रेस प्रमुख बदले जाएंगे : आने वाले सात राज्यों में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद लगाए और 2029 के आम चुनाव में भाजपा से एक निर्णायक लड़ाई लड़ने को आतुर कांग्रेस आलाकमान अपने कई प्रदेशाें में अपने संगठन के चेहरे-मोहरे बदलने को आतुर हैं। सच पूछिए तो राहुल गांधी के दिशा-निर्देश पर यह शुरूआत कर्नाटक से हो चुकी है, जैसे ही डीके शिवकुमार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने उन्हें पार्टी अध्यक्ष की दोहरी जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया गया और उनकी जगह एक पुराने कांग्रेसी बीके हरिप्रसाद को कर्नाटक कांग्रेस की बागडोर सौंप दी गई है। बताया जा रहा है कि अगला नंबर केरल का आने वाला है, वहां के मौजूदा अध्यक्ष सनी जोसेफ नई नवेली बीडी सतीशन सरकार में मंत्री बन गए हैं, सो उनकी जगह अपेक्षाकृत एक युवा चेहरे को लाने की बात हो रही है। राहुल गांधी चाहते हैं कि दिल्ली, पंजाब, असम, तमिनाडु, राजस्थान, बिहार, यूपी, झारखंड, केरल व जम्मू-कश्मीर जैसे प्रदेशाें की जिम्मेदारी नए हाथों में सौंपी जाए। इसके अलावा इस बात के भी चर्चे हैं कि कम से कम चार राज्यों के प्रभारियों को भी बदला जाए। बीके हरिप्रसाद को कर्नाटक को कर्नाटक का अध्यक्ष बनाया गया है, सो हरियाणा के लिए उनकी जगह नए प्रभारी की तलाश जारी है। महाराष्ट्र की जिम्मेदारी वहां के प्रभारी रमेश चेन्निथला के पास थी, वे भी केरल के बीडी सतीशन मंत्रिमंडल में बतौर मंत्री नियुक्त हो चुके हैं, सो उनका विकल्प भी ढूंढा जाएगा। तमिलनाडु के प्रभारी गिरीश को गोवा अध्यक्ष बनाया गया है, असम के प्रभारी जितेंद्र सिंह वहां मुंह की खाने के बाद अपने पद से पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं। इसी प्रकार जम्मू-कश्मीर के प्रभारी सैयद नासिर हुसैन को भी बदले जाने की चर्चा है, जबकि वे कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे के बेहद करीबियों में शुमार होते हैं। जम्मू-कश्मीर के प्रदेश अध्यक्ष तारिक हमीद कर्रा यूं तो राहुल गांधी के निजी पसंद बताए जाते हैं, पर उनको लेकर प्रदेश कांग्रेस में खासा बवाल मचा हुआ है, वहां के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष विकार रसूल वानी गुट उनकी खिलाफत करता हुआ बकायदा सड़कों पर उतर आया है, कर्रा के विरोध में उनके प्रतिद्वंद्वी गुट ने ‘दिल्ली चलो’ का आह्वान कर रखा है। मामले की नजाकत को भांपते हुए कांग्रेस आलाकमान ने कर्रा व उनके विरोधी गुट के नेता विकार रसूल वानी को दिल्ली तलब किया है। कांग्रेस शीर्ष चाहता है कि अगले सप्ताह इन दोनों नेताओं को आमने-सामने बिठा कर उनमें सुलह-सफाई के प्रयास किए जाएं, वैसे भी कर्रा अपने कार्यकाल के दो वर्ष पूरे करने जा रहे हैं और कांग्रेस में आने से पहले वे महबूबा मुफ्ती की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) का हिस्सा रहे हैं, इस वजह से भी वे प्रदेश के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं से ठीक से तालमेल नहीं बिठा पाते हैं, शायद यह उनकी पद से रुखसती की एक बड़ी वजह हो सकती है।
गांधी परिवार के नए संकटमोचक बने केजे जॉर्ज : यूं तो दिल्ली की कांग्रेसी राजनीति में केजे जॉर्ज कोई इतने जाने-पहचाने चेहरे नहीं हैं, पर इस दफे कर्नाटक में सफलतापूर्वक नेतृत्व परिवर्तन करवाने में इनकी सबसे महती भूमिका रही। दरअसल, सिद्धारमैया से डीके शिवकुमार को सत्ता हस्तांतरण ऊपर से जितना शांत लगता है दरअसल वह दुरूह सियासी झंझावातों के पेंचोखम से होकर गुजरा है। जब गांधी परिवार ने पूरी तरह मन बना लिया कि अब कर्नाटक की कमान डीके शिवकुमार के हवाले करनी है तो उन्होंने इस बाबत सिद्धारमैया को तैयार करने और उन्हें मनाने का जिम्मा 6 बार के विधायक और राज्य सरकार में मंत्री केजे जॉर्ज को सौंपा, चूंकि जॉर्ज सिद्धारमैया के भी बेहद भरोसेमंदों में शुमार होते हैं। जब 26 मई को कांग्रेस अलाकमान ने सिद्धारमैया से दिल्ली आने को कहा था तो जॉर्ज भी उनके साथ दिल्ली आए थे, राहुल ने भले ही उस अहम मीटिंग से जिसमें सिद्धारमैया से वे वन-टू-वन बात कर रहे थे, अपने सभी लोगों को यहां तक कि केसी वेणुगोपाल से भी बाहर जाने को कह दिया दिया था, पर जॉर्ज सिद्धारमैया के साथ उस मीटिंग में बने रहे, जब राहुल ने यकबयक से सिद्धारमैया से अपना इस्तीफा सौंपने को कहा तो सिद्धारमैया स्तब्ध रह गए थे। फिर जॉर्ज अपने साथ सिद्धारमैया को लेकर नई दिल्ली के सुंदर नगर स्थित अपने घर पहुंचे, जहां दोनों नेताओं के बीच एक बंद कमरे में घंटों बातचीत हुई। जॉर्ज ने सिद्धारमैया का गुस्सा शांत कराया और उन्हें पार्टी शीर्ष का निर्णय स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया। जॉर्ज ने इसके बाद सिद्धारमैया समर्थक विधायकों से भी बात की जो जी. परमेश्वर के नेतृत्व में एक अलग गुट बनाने को हवा दे रहे थे। जॉर्ज ने सिद्धारमैया को जब उनके सम्मानजनक विदाई के लिए तैयार कर लिया तो 28 मई को सिद्धारमैया फिर से दिल्ली आए और हाईकमान को अपना इस्तीफा सौंप दिया। इसके बाद जार्ज सिद्धारमैया के पुत्र यतीन्द्र को अपने निजी जेट से दिल्ली लेकर आए और फिर उन्हें राहुल गांधी व खड़गे से मिलवाया। कहते हैं सिद्धारमैया की केसी वेणुगोपाल के साथ ब्रेकफास्ट मीटिंग जॉर्ज ने ही आयोजित करवाई थी। अब राजनैतिक पर्यवेक्षक जार्ज को गांधी परिवार का नया ऑस्कर फर्नांडिस बता रहे हैं, जो हर वक्त संकटमोचक की भूमिका के लिए मुस्तैद रहते थे। फिलहाल जार्ज राज्य के कांग्रेसी नेताओं व दिल्ली के बीच की एक अहम कड़ी बन कर उभरे हैं, मुमकिन है आने वाले दिना में गांधी परिवार उनकी भूमिका को और ज्यादा विस्तार दे, क्योंकि वे सोनिया गांधी के भी उतने ही भरोसेमंद हैं।
क्या फिर से टीम बदल सकते हैं कैप्टन? : कैप्टन अमरिंदर सिंह की भगवा अहाते में छटपटाहट साफ महसूस की जा सकती है। पंजाब के इस पूर्व मुख्यमंत्री की अपने घर वापसी को लेकर अटकलों का बाजार गर्म है। हालिया दिनों में भूपिंदर सिंह हुड्डा ने यह बयान देकर और खलबली मचा दी है कि कैप्टन कांग्रेस के संपर्क में हैं। वहीं कैप्टन की ओर से तो पंजाब भाजपा के नए चीफ केवल सिंह ढिल्लों की नियुक्ति का लगातार विरोध तो किया जा रहा है, दूसरी ओर वे यह कहना भी नहीं भूल रहे हैं कि उनका भाजपा छोड़ने का कोई इरादा नहीं। सनद रहे कि ढिल्लों 4 जून 2022 से पहले तक कांग्रेस में ही थे, वे कांग्रेस के टिकट पर ही 2012 में बरनाला से विधानसभा चुनाव भी जीते थे। हालांकि कुछ समय पहले कैप्टन ने यह कह कर खलबली मचा दी थी कि उनके भाई की मौत पर संवेदना व्यक्त करने के लिए उन्हें एक भी भाजपा नेता का फोन नहीं आया, वहीं राहुल गांधी ने व्यक्तिगत रूप से उन्हें फोन कर संवेदना व्यक्त की थी। सूत्रों की मानें तो कोई चार-पांच महीने पहले ही कैप्टन के कांग्रेस में आने का रोड मैप तैयार हो गया था, इससे पहले कि कैप्टन अपना निर्णय सार्वजनिक कर पाते उन्हें ईडी का नोटिस आ गया और वे उसमें उलझ कर रह गए। भाजपा जानती है कि भले ही कैप्टन पार्टी में रह कर उनका कोई फायदा न करवा पाएं, पर एक बार वे फिर से कांग्रेस में चले गए तो कांग्रेस की जीत की संभावनाएं जरूर बेहतर बना सकते हैं, इसीलिए भगवा पार्टी चाहती है कि कैप्टन के ऊपर जांच एजेंसियों की तलवारें यूं ही लटकती रहें।
…और अंत में : कई हाई कोर्ट में जजों की रुकी पड़ी नियुक्तियों को सुप्रीम कोर्ट व केंद्र सरकार की हरी झंडी मिल गई है। सो, आने वाले कुछ समय में बिहार समेत कई राज्यों के हाई कोर्ट को नए जज मिल सकते हैं। पर इस बारे में हाई कोर्ट व राज्य सरकार दोनों की ही अपनी कुछ दिक्कते हैं, जिन्होंने अपनी भावनाओं से केंद्र सरकार व सुप्रीम कोर्ट को अवगत करा दिया है। इस मामले में अब सारे कामकाज के लिए नए बंगल की व्यवस्था कब होगी, इसका इंतजार रहेगा।
इलेक्शन इंजीनियर का ‘बंसल मॉडल’
Summary :
‘देखो मेरी सोहबतों में तुम खराब हो सकते हो चली जरा हवा तो चिंगारी से तुम हो सकते हो’ यूपी से लेकर बंगाल तक इस इलेक्शन इंजीनियर का स्वअन्वेषित ‘बंसल मॉडल’ सुपर हिट है। ये इलेक्शन इंजीनियर कोई और नहीं बल्कि भाजपा महासचिव सुनील बंसल हैं, जिन्हें चुनाव के जमीनी और माइक्रो मैनेजमेंट में महारथ हासिल है। इनकी चुनावी रणनीति व बूथ मैनेजमेंट का अचूक नुस्खा भाजपा में पिछले 12-13 सालों में इतना कामयाब रहा है कि पार्टी व संघ दोनों ने ही इसे ‘बंसल मॉडल’ का नाम दे दिया है। बंगाल में भाजपा को 2 से 207 सीटों के…


Download Android App
Download iOS App



