हमारे भारत में बरसात हो तो बाढ़ का कहर टूट पड़ता है। गर्मी हो तो आग की घटनाएं तेजी से सामने आती हैं। पिछले दिनों मालवीय नगर की दर्दनाक आग की घटना दिल को दहला देने वाली बहुत ही दुखद घटना थी। परिवारों ने अपने प्रियजनों को खो दिया। कई विदेशी मारे गए और घायल हुए। एक पूरा परिवार ही जलकर ईश्वर को प्यारा हो गया। आखिर यही सामने आया कि सुरक्षा नियमाें और अग्नि सुरक्षा व्यवस्थाओं में बहुत बड़ी कमी थी।
सब कुछ बहुत पीड़ादायक, दुखद होने के साथ-साथ इस घटना में मानवता की सबसे सुन्दर तस्वीर भी देखने को मिली। जब लोग आग में फंसे हुए थे तब आसपास के कई स्थानीय नागरिक मदद के लिए आगे आए। मानवता का धर्म निभाकर मालवीय नगर में अनेक घायलों की जान बचाने के लिए वहां के लोगों ने अपनी जान लड़ा दी। जिस होटल में आग लगी उसके सामने ही रियाजुद्दीन मंसूरी और उसके बेटे अरमान की गद्दे की दुकान थी। उसने जलते हुए होटल के सामने जमीन पर दर्जनों गद्दे बिछा दिए इसके बाद दूसरी, तीसरी और चौथी मंजिल पर लोगों को कहा कि वह जम्प कर जाएं उन्हें कुछ नहीं होगा। जो अनेक लोग कूदे वे सुरक्षित हैं। अरमान की तरह अनेक लोग देवदूत बनकर घायलों की मदद करते रहे लेकिन पिता-पुत्र ने यह सिद्ध कर दिया कि मानवता के कामकाज में जात-पात या मजहब नहीं देखा जाता। ऐसे सामाजिक सद्भाव का उदाहरण प्रस्तुत करने वाले इन मुस्लिम भाइयों को सैल्यूट तो बनता ही है। यही नहीं जो पिछले दिनों हिन्दू-मुसलमानों के युवाओं ने आपस में लड़कर एक-दूसरे की हत्याएं की हैं उन सभी के परिवारों को सीख लेनी चाहिए कि न कोई दुर्घटना हिन्दू-मुस्लिम देखती है और न ही जब अस्पतालों में खून चढ़ता है वो देखता है कि खून किसका है हिन्दू का या मुसलमान का।
मालवीय नगर की घटना यह बताती है कि अग्निशमन उपकरण हमेशा कार्यशील स्थिति में होने चाहिएं। आपातकालीन निकास खुले और बाधा रहित होने चाहिएं। यहां तो मालवीय नगर का होटल कैदखाने का नजारा पेश कर रहा था। कर्मचारियों को आग लगने की स्थिति में प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। नियमित सुरक्षा ऑडिट और मॉकड्रिल अनिवार्य होनी चाहिए। भवन निर्माण और संचालन में सुरक्षा नियमों का सख्ती से पालन होना चाहिए। मेरा दावा है कि यदि इन बुनियादी बातों को गंभीरता से लागू किया जाए तो अनेक जानें बचाई जा सकती हैं। सच यही है कि यदि किसी होटल, व्यावसायिक भवन या सार्वजनिक स्थल पर अग्नि सुरक्षा व्यवस्था का अभाव केवल एक तकनीकी कमी नहीं बल्कि गंभीर प्रशासनिक और कानूनी विफलता है। जिम्मेदारी कई स्तरों पर तय होनी चाहिए।
यदि किसी भवन को संचालन की अनुमति दी गई थी तो संबंधित विभागों को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि सभी सुरक्षा मानक पूरे किए गए हैं। नियमित निरीक्षण में कमियां मिलने पर तत्काल कार्रवाई आवश्यक थी। जो हमारे यहां नहीं की जाती क्योंकि ‘जनसेवक’ और अफसर उसकी आड़ में कमाई करते हैं। नगर निगम, अग्निशमन विभाग तथा अन्य नियामक संस्थाओं की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे समय-समय पर निरीक्षण करें और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर दंडात्मक कार्रवाई करें।
मारे गए लोगों की याद में सहानुभूतिवश कैंडल मार्च अलग बात है परंतु व्यवस्था का ठोस होना और लागू होना जरूरी है। कई बार कागजों पर सुरक्षा प्रमाणपत्र जारी हो जाते हैं लेकिन वास्तविक स्थिति अलग होती है। यदि जांच में ऐसी बातें सामने आती हैं तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। उसे दंड भी मिलना चाहिए। सभी होटल, गेस्ट हाउस, अस्पताल, मॉल और व्यावसायिक भवनों का विशेष सुरक्षा ऑडिट कराया जाए।
आप किसी भी मृतक के परिजन को आर्थिक नुक्सान की भरपाई कर सकते हैं लेकिन उनके लिए उनके अपनों की जिन्दगी तो वापस नहीं ला सकते। दिल्ली और अन्य शहरों में होने वाली आग की घटनाएं केवल दुर्घटनाएं नहीं बल्कि चेतावनी हैं। यदि हर बड़ी घटना के बाद भी सुरक्षा मानकों की अनदेखी होती रहे तो यह सामूहिक विफलता मानी जाएगी। होटल मालिकों, प्रशासन, निरीक्षण एजेंसियों और सरकार-सभी को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। मेरा मानना है कि सच्ची श्रद्धांजलि केवल शोक व्यक्त करने से नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्थाएं बनाने से होगी जिनसे भविष्य में किसी परिवार को अपने प्रियजनों को इस तरह न खोना पड़े। आग की हर घटना हमें यह याद दिलाती है कि सुरक्षा पर किया गया निवेश खर्च नहीं, बल्कि मानव जीवन की रक्षा का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी और नियमों का कठोर पालन नहीं होगा, तब तक ऐसी त्रासदियों की पुनरावृत्ति का खतरा बना रहेगा। मुझे याद है कि गोवा अग्निकांड के बाद हाईकोर्ट ने हर क्लब, रेस्तरां और होटलों व माल में फायर सेफ्टी आडिट के निर्देश दिए गए हैं। अगर यह काम कर लिया जाता तो इतनी जिन्दगियां आग की भेंट चढ़ जाने की घटना से बचाई जा सकती थीं। जो बेचारे चले गए उनके लिए प्रभु से प्रार्थना है कि उनकी आत्मा को अपने चरणों में स्थान दें तथा पीड़ितों को प्रभु यह हादसा सहने के लिए मजबूती प्रदान करे। हमें यह अग्निकांड सीख दे गया कि अच्छा या बुरा किसी धर्म, जाति या समुदाय से नहीं जुड़ा होता। अच्छे लोग हर धर्म, हर जाति और हर समाज में होते हैं। यदि हम सभी इंसानियत, करुणा और एक-दूसरे की मदद करने की भावना को अपनाएं तो समाज और देश दोनों अधिक मजबूत बनेंगे। आज आवश्यकता इस बात की है िक हम नफरत नहीं, बल्कि उन लोगों के साहस और सेवा-भाव से प्रेरणा लें जिन्होंने संकट की घड़ी में मानवता का परिचय दिया। सच तो यही है कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है।
न हिन्दू, न मुसलमान… सिर्फ इंसानियत
Summary :
हमारे भारत में बरसात हो तो बाढ़ का कहर टूट पड़ता है। गर्मी हो तो आग की घटनाएं तेजी से सामने आती हैं। पिछले दिनों मालवीय नगर की दर्दनाक आग की घटना दिल को दहला देने वाली बहुत ही दुखद घटना थी। परिवारों ने अपने प्रियजनों को खो दिया। कई विदेशी मारे गए और घायल हुए। एक पूरा परिवार ही जलकर ईश्वर को प्यारा हो गया। आखिर यही सामने आया कि सुरक्षा नियमाें और अग्नि सुरक्षा व्यवस्थाओं में बहुत बड़ी कमी थी। सब कुछ बहुत पीड़ादायक, दुखद होने के साथ-साथ इस घटना में मानवता की सबसे सुन्दर तस्वीर भी देखने…


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