विदेशी मुद्रा आवक बढ़ेगी

Summary :

मोदी सरकार ने पश्चिम एशिया में ईरान-अमेरिका व इजराइल युद्ध के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था को हुए नुक्सान के झटके से बचने और भारतीय मुद्रा रुपये के मूल्य को डाॅलर के मुकाबले संभालने की गरज से बड़ा व दमदार कदम उठाते हुए भारत में विदेशी मुद्रा की आवक को सुगम बनाने के उद्देशय को प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस कदम के तहत विदेशी निवेशकों द्वारा भारत सरकार के बांडों में किये गये निवेश पर दीर्घकालिक व लघुकालिक कर को समाप्त कर दिया है। सरकार ने एक अध्यादेश जारी करके इन बांडों में किये गये विदेशी निवेश से पाये…

मोदी सरकार ने पश्चिम एशिया में ईरान-अमेरिका व इजराइल युद्ध के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था को हुए नुक्सान के झटके से बचने और भारतीय मुद्रा रुपये के मूल्य को डाॅलर के मुकाबले संभालने की गरज से बड़ा व दमदार कदम उठाते हुए भारत में विदेशी मुद्रा की आवक को सुगम बनाने के उद्देशय को प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस कदम के तहत विदेशी निवेशकों द्वारा भारत सरकार के बांडों में किये गये निवेश पर दीर्घकालिक व लघुकालिक कर को समाप्त कर दिया है। सरकार ने एक अध्यादेश जारी करके इन बांडों में किये गये विदेशी निवेश से पाये गये लाभ को लम्बे समय तक रोके रखने से प्राप्त ब्याज पर लगने वाले कर को भी समाप्त करने का निर्णय लिया है। फिलहाल विदेशी निवेशक बांडों में दीर्घकालिक निवेश करके जो लाभ कमाते हैं उस पर 12.5 प्रतिशत कर लगता है और लघुकालिक निवेश से प्राप्त लाभ पर 30 प्रतिशत कर लगता है जबकि लाभ को रोक कर पाये गये अतिरिक्त ब्याज लाभ पर 20 प्रतिशत कर लगता है। सरकार ने विदेशी निवेशकों के लिए अब ये तीनों कर ही समाप्त कर दिये हैं। इस बाबत सरकार ने कल एक अध्यादेश जारी किया मगर यह व्यवस्था आगामी 1 अप्रैल से लागू होगी।
अध्यादेश पर कल राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने हस्ताक्षर किये। इससे भारत के विदेश भुगतान सन्तुलन के घाटे की समस्या भी हल होगी। क्योंकि चालू वित्तीय वर्ष 2026-27 में यह घाटे का सन्तुलन 50 अरब डाॅलर तक का हो सकता है। सरकार के इस कदम से सरकारी ऋण प्रतिभूतियों में विदेशी निवेश बढ़ने के कारण डाॅलर की आवक में इजाफा होगा जिससे भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार में ठहराव पैदा होगा। यह अध्यादेश 2025 के भारतीय आयकर कानून में संशोधन के तौर पर भी लागू होगा। इसके समानान्तर कल भारतीय रिजर्व बैंक ने भी सरकारी या सार्वजनिक कम्पनियों के लिए विदेशी मुद्रा ऋण विदेशी बाजारों से लेने सम्बन्धी नियमों को भी बहुत लचीला व सरल बनाने की घोषणा की। सरकार व रिजर्व बैंक के इस सामूहिक प्रयास से उम्मीद है कि भारत में पिछले एक-दो वर्षों से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मोर्चे पर जो कमी दर्ज हो रही है उस पर लगाम लगेगी और विदेशी मुद्रा भंडार में निरन्तर वृद्धि होगी जिससे रुपये की कीमत पर बढ़ता दबाव भी कम होगा क्योंकि इसकी कीमत अब 95 से 97 रुपये प्रति डाॅलर के हिसाब से झूल रही है। सरकारी कम्पनियों के साथ ही रिजर्व बैंक ने भारतीय बैंकों के लिए भी विदेशी बाजारों से ऋण लेने के नियमों में ढील दी है। चिन्ता की बात यह भी थी कि पिछले कुछ सालों से विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों में निवेश की गई अपनी पूंजी निकाल रहे थे जिसकी वजह से रुपये की डाॅलर के मुकाबले विनिमय दर पर दबाव बढ़ रहा था और यह लगातार नीचे की तरफ चल रही थी। इस स्थिति को विगत 27 फरवरी से शुरू हुए पश्चिम एशिया युद्ध ने और बिगाड़ा व कच्चे तेल के लगातार महंगा होने और डाॅलर के महंगा होने की वजह से इस मद में भारत का आयात बिल और बढ़ा।
भारत विश्व का दूसरे नम्बर का सबसे बड़ा तेल आयातक देश हैं। इस प्रकार रुपये पर चारों तरफ से दबाव बढ़ रहा था। सरकार के इन निर्णायक सुधार कदमों से एक तरफ विदेशी मुद्रा की आवक बढ़ेगी और दूसरी तरफ रुपये पर दबाव कम होगा। सार्वजनिक कम्पनियों व बैंकों को विदेशी बाजारों से वाणिज्यिक ऋण उठाने की प्रक्रिया को आकर्षक व सुगम बनाने हेतु रिजर्व बैंक ने घोषणा की है कि वह आगामी सितम्बर महीने तक रियायती दरों पर विनियम व्यवस्था रखेगा। इससे स्पष्ट होता है कि सरकार व रिजर्व बैंक मिलकर समय रहते भारतीय अर्थव्यवस्था के उन मानकों को मजबूती देना चाहते हैं जिनकी वजह से विदेशी निवेशकों का भारत में निवेश करना आकर्षक बनता है। फिलहाल सरकारी बांडों में विदेशी निवेश लगभग 3.75 लाख करोड़ रुपये का है। हालांकि यह कुल बांड मूल्य 112.42 लाख करोड़ रुपये का 3.34 प्रतिशत ही है मगर इसमें सीधे डाॅलर मुद्रा में निवेश होता है।
सरकारी कदमों को समयानुकूल मानते हुए कुछ वित्तीय विशेषज्ञों की राय है कि इससे अगले दो सालों में 40 से 50 अरब डाॅलर तक की विदेशी मुद्रा आवक बढे़गी जबकि इसके आसपास ही भारत का भुगतान सन्तुलन घाटा है। इसका प्रभाव रुपये की कीमत पर पड़े बिना नहीं रह सकता जिससे भविष्य में रुपया मजबूती पकड़ेगा। सरकार ने बांडों में विदेशी निवेश पर जो दीर्घकालिक व लघुकालिक कर छूट दी है वह वैश्विक स्तर पर बैंकिग निपटान करने वाली संस्था को भी प्राप्त होगी।
यह संस्था भी विदेशों में निवेश करती है हालांकि इसने अभी तक भारत में कोई निवेश नहीं किया है मगर सरकार द्वारा उठाये गये कदमों की वजह से यह भी भारत में निवेश कर सकती है। विदेशी मुद्रा मोर्चे पर भारत की हालत ढीली होने के बावजूद इसके पास आगामी 11 महीनों की आयात पूर्ति करने के लिए पर्याप्त विदेशी भंडार है तथा इसकी वार्षिक वृद्धि दर काफी मजबूत बनी हुई है और यह 7 प्रतिशत से ऊपर रहने की उम्मीद है। अतः भारतीय अर्थव्यवस्था के सकल आधारभूत मानक कमजोर नहीं हैं।

Aditya Chopra

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