बांग्लादेश में चुनाव

Summary :

बांग्लादेश में 12 फरवरी को संसदीय चुनाव होने जा रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्तापलट के बाद देश छोड़कर भारत आने और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के​ निधन के बाद यह पहला चुनाव है। भारत सहित पड़ोसी देशों की नजरें इन चुनावों पर लगी हुई हैं। भले ही इन चुनावों को मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार लोकतांत्रिक चुनाव करार दें लेकिन शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया गया है। यह प्रतिबंध शेख हसीना को सत्ता से हटाने और पार्टी के 15 वर्ष के शासन को समाप्त करने वाले जन…

बांग्लादेश में 12 फरवरी को संसदीय चुनाव होने जा रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्तापलट के बाद देश छोड़कर भारत आने और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के​ निधन के बाद यह पहला चुनाव है। भारत सहित पड़ोसी देशों की नजरें इन चुनावों पर लगी हुई हैं। भले ही इन चुनावों को मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार लोकतांत्रिक चुनाव करार दें लेकिन शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया गया है। यह प्रतिबंध शेख हसीना को सत्ता से हटाने और पार्टी के 15 वर्ष के शासन को समाप्त करने वाले जन विद्रोह के बाद हुई कार्रवाई के कारण लगाया गया है। अवामी लीग की अनुपस्थिति में बांग्लादेश के चुनाव एक नौटंकी आैर धोखा ही हैं। यह चुनाव अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय की आंखों में धूल झोंकने वाले हैं। पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी समेत कई पार्टियां मैदान में हैं। मुख्य मुकाबला बीएनपी और जमात के बीच ही है। शेख हसीना की सरकार गिराने वाले जेन-जी य​ानि छात्र आंदोलन से जन्मी नेशनल सिटिजन पार्टी भी चुनाव मैदान में है।
चुनावों के साथ प्रधानमंत्री पद की शक्ति को सीमित करने के उद्देश्य से जनमत संग्रह भी कराया जा रहा है। यह जनमत संग्रह शेख हसीना शासन के तख्तापलट के बाद संवैधानिक सुधार के ​िलए गठित राष्ट्रीय सर्वसम्मति आयोग द्वारा तैयार किए गए दस्तावेज, जुलाई चार्टर में की गई सिफारिशों को लागू करने के उद्देश्य से किया जा रहा है। चार्टर की कई सिफारिशों में से एक बांग्लादेश के राष्ट्रपति की शक्ति को बढ़ाना है। इसमें वर्तमान संविधान के अनुच्छेद से बंगाली शब्द को हटाकर उसके स्थान पर बांग्लादेशी शब्द का इस्तेमाल करने की सिफारिश की गई है। यद्यपि चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में बीएनपी के 200 से ज्यादा सीटों पर जीत की भविष्यवाणियां की जा रही हैं। यानि तारिक रहमान देश के नए प्रधानमंत्री बन सकते हैं। तो दूसरी तरफ जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11 पार्टियों के गठबंधन की हालत कमजोर मानी जा रही है लेकिन कुछ चुनाव विशेषज्ञों का मानना है कि जमात-ए-इस्लामी चौंकाने वाले परिणाम दे सकती है। चुनावों में राजनीतिक दल भारत विरोधी भावनाओं का जबरदस्त फायदा उठाने की को​िशश कर रहे हैं। सोशल मीडिया एआई जनरेटड कंटेंट से भरा हुआ है। चुनावी माहौल में क्रिकेट को लेकर जमकर सियासत की जा रही है। सियासी पार्टियां बांग्लादेश की टी-20 वर्ल्ड कप की निराशा को राष्ट्रीय गरिमा और विदेशी हस्तक्षेप पर सवाल खड़े कर रही है। जमात-ए-इस्लामी ने भारत विरोध को मुद्दा बनाया हुआ है। छात्रों की एनसीपी ने भी भारत विरोध को मुद्दा बनाया है, जिसमें सीमा पर हुई हत्याओं, सीमापार नदियों पर विवाद और बांग्लादेश के आंतरिक मामलों में भारत के कथित हस्तक्षेप शामिल हैं।
तारिक रहमान की बीएनपी ने अपने घोषणापत्र में भारत का नाम तो नहीं लिया लेकिन तारिक रहमान के भाषणों में तथाकथित ‘मौत का जाल’ फरक्का बांध के विकल्प के रूप में पद्मा बैराज के निर्माण का प्रस्ताव कठोर रुख का संकेत दे रहा है। सबसे अहम सवाल यह है कि बांग्लादेश की अगली संसद अल्लाह के कानून से चलेगी या अपना नफा-नुक्सान सोच कर। इस समय बांग्लादेश भारत के अहसानों को भुलाकर पाकिस्तान की गोद में बैठ चुका है। यह चुनाव तय कर देगा कि आखिर बांग्लादेश भारत से संतुलन बनाकर चलेगा या पाकिस्तान और चीन की तरफ जाएगा। इस चुनाव से दक्षिण एशिया शक्ति संतुलन बिगड़ सकता है। शेख हसीना के तख्तापलट केे बाद जिस तरह से अल्पसंख्यक हिन्दुओं की हत्याएं हुईं, उनके घर और धर्मस्थान जलाए गए। वह भारत के लिए चिंता का विषय है। शेख हसीना जब से सत्ता से बेदखल होकर भारत में रह रही हैं, तब से भारत के साथ बांग्लादेश के संबंध तनावपूर्ण रहे हैं। भारत और बांग्लादेश की क्रिकेट को लेकर भी विवाद हुआ। बांग्लादेश का पाकिस्तान के साथ संबंध हाल के समय में बेहतर हुए हैं जबकि 1971 में पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश जब एक नया देश बना था, उसके बाद से दोनों देशों के बीच संबंध तनावपूर्ण ही रहे थे। मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार में बांग्लादेश के चीन के साथ रणनीतिक रिश्ते और मजबूत हुए हैं। ऐसे में बांग्लादेश में होने जा रहे चुनाव पर भारत, पाकिस्तान और चीन नजर बनाए हुए हैं।
भारत चाहता है कि इस चुनाव के बाद बांग्लादेश में ऐसी सरकार बने जो भारत के साथ रिश्ते सुधार सके। राजनीति के जानकारों का कहना है कि भारत चाहता है कि अवामी लीग के चुनाव नहीं लड़ने पर बांग्लादेश में बीएनपी की सरकार बने। जमात-ए-इस्लामी पार्टी की जीत होने पर भारत की चिंता बढ़ सकती है। जमात-ए-इस्लामी के सत्ता में आने पर सुरक्षा और कट्टरपंथ को लेकर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि भारत दोनों पार्टियों से संपर्क बनाए हुए है। उधर, चीन भी बांग्लादेश में अपनी मौजूदगी लगातार बढ़ा रहा है। उसने मोहम्मद यूनुस की सरकार में काफी निवेश किया है। उधर, पाकिस्तान भी बांग्लादेश को अपने पक्ष में करने में लगा है। पाकिस्तान ने बांग्लादेश से वीजा के नियम आसान करने पर बात की है। अन्तर्राष्ट्रीय बैठकों में पाकिस्तान खुलकर बांग्लादेश का साथ दे रहा है। दक्षिण एशिया के पाॅवर बैलेंस के लिए बांग्लादेश इसलिए अहम है क्योंकि यह देश भूगोल, राजनीति, अर्थव्यवस्था और रणनीतिक हितों चारों मोर्चों पर एक साथ असर डालता है। दक्षिण एशिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के नाते बांग्लादेश की स्थिरता दक्षिण एशिया की कूटनीतिक तस्वीर को महत्वपूर्ण रूप से आकार दे सकती है। विशेषज्ञों ने जनमत संग्रह के औचित्य पर भी सवाल उठाने शुरू कर ​िदए हैं। उनका मानना है कि जनमत संग्रह के ​िवचार और उद्देश्यों के बारे में जनता में बहुत कम समझ है और यह प्रक्रिया तनाव को जन्म दे सकती है, जिससे देश में राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ सकती है। बांग्लादेश का राजनीतिक चरित्र ​फिलहाल बदला हुआ नजर आ रहा है। अवामी लीग के शासन से भी वहां के लोग खुश नहीं थे ले​िकन अवामी लीग की सहभागिता के​ बिना होने वाले चुनाव में मतदान का प्रतिशत घट सकता है। जातीय आैर धार्मिक अल्पसंख्यकों के बीच आतंक का ऐसा माहौल है कि वे वोट डालने नहीं जा सकते। ऐसे में इन चुनावों को निष्पक्ष और ईमानदार कैसे माना जा सकता है।

Aditya Chopra

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