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जम्मू-कश्मीर में जल्द होंगे चुनाव

जम्मू-कश्मीर आरक्षण संशोधन विधेयक और पुनर्गठन संशोधन विधेयक लोकसभा में ध्वनिमत से पारित किए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव जल्द कराए जाने के संकेत मिल गए हैं। गृहमंत्री अमित शाह ने इन विधेयकों पर हुई चर्चा के जवाब में विपक्ष कांग्रेस को जमकर घेरते हुए जहां कश्मीर समस्या के लिए स्वर्गीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की महा भूलों का उल्लेख किया, वहीं उन्होंने मोदी सरकार द्वारा एक झटके में अनुच्छेद 370 उखाड़ फैंकने के साहस का भी उल्लेख किया। गृहमंत्री ने यह भी कहा कि जो बिल लोकसभा में लाए गए हैं वह उन लोगों को न्याय दिलाने और उनको अधिकार​ दिलाने से सम्बन्धित हैं जिनके खिलाफ अन्याय हुआ, जिनका अपमान हुआ और जिनकी अनदेखी की गई। उन्होंने तीखे प्रहार करते हुए यह भी कहा कि 1980 के बाद राज्य में आतंकवाद का प्रहार बढ़ा तो किसी ने इसको रोकने का प्रयास नहीं किया। जिनकी जिम्मेदारी इसको रोकने की थी वो लंदन में बैठकर छुट्टियां मना रहे थे। अगर उस समय आतंकवाद को रोकने के प्रयास किए होते तो 46,000 कश्मीरी पंडित परिवार विस्थापित नहीं होते।
कुछ दिन पहले ही जम्मू-कश्मीर के उप राज्यपाल मनोज सिन्हा ने कहा था कि निर्वाचन आयोग जब भी विधानसभा चुनाव कराने का निर्देश देगा उनका प्रशासन केन्द्र शासित प्रदेश में चुनाव कराने के लिए तैयार है। इसी बीच निर्वाचन आयोग भी राज्य में विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव की तैयारियों की समीक्षा कर चुका है। अब सभी की निगाहें निर्वाचन आयोग पर लगी हुई हैं। इस बार जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव बदले-बदले माहौल में होंगे। पूर्ण राज्य से केन्द्र शासित प्रदेश बनने के बाद यहां पहले विधानसभा चुनाव होंगे। परिसीमन के बाद जम्मू क्षेत्र और कश्मीर घाटी दोनों में ही सियासी समीकरण बदल गए हैं। नए परिसीमन के बाद जम्मू क्षेत्र में 43 विधानसभा सीटें हो गई हैं। जबकि कश्मीर घाटी में 47 विधानसभा सीटें हो गई हैं। जम्मू के लोग हमेशा से ही प्रतिनिधित्व को लेकर अन्याय की बात करते रहे हैं। उनका कहना था कि जम्मू क्षेत्र की आबादी घाटी से ज्यादा है लेकिन विधानसभा में सीटें कम हैं। अब दोनों क्षेत्रों में सीटों का अंतर 9 से घटकर 4 रह गया है।
पहली बार जम्मू-कश्मीर विधानसभा में अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के लिए सीट आरक्षित की गई हैं। एसटी के लिए 9 सीटें आरक्षित की गई हैं। इनमें से 6 जम्मू क्षेत्र में और 3 सीट कश्मीर घाटी में हैं। अनुसूचित जाति (एससी) के लिए पहले से आरक्षित 7 सीटों को बरकरार रखा गया। जम्मू-कश्मीर में 5 लोकसभा सीट (बारामूला, श्रीनगर, अनंतनाग-राजौरी, ऊधमपुर और जम्मू) हैं। परिसीमन आयोग ने जम्मू और कश्मीर क्षेत्र को एकल केंद्र शासित प्रदेश मानते हुए घाटी में अनंतनाग क्षेत्र और जम्मू क्षेत्र के राजौरी और पुंछ को मिलाकर एक संसदीय क्षेत्र बना दिया। इस पुनर्गठन के बाद जम्मू-कश्मीर की हर लोकसभा सीट के तहत 18 विधानसभा सीटें हो गई हैं। अनंतनाग-राजौरी लोकसभा सीट में 7 विधानसभा सीटें जम्मू क्षेत्र से हैं, जो राजौरी और पुंछ जिले में आती हैं। वहीं इस लोकसभा सीट में 11 विधानसभा सीटें कश्मीर क्षेत्र से होंगी। ये अनंतनाग, कुलगाम और शोपियां जिले में हैं। परिसीमन के दौरान इस बात का ख्याल रखा गया कि प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र पूरी तरह से एक जिले में ही हो। सबसे निचली प्रशासनिक इकाई यानी पटवार मंडल (जम्मू नगर निगम में वार्ड) को बांटा नहीं गया और उन्हें एक विधानसभा क्षेत्र में रखा गया। यहां 13 विधानसभा सीटों के नाम में भी बदलाव किए गए हैं। इनमें से 7 जम्मू डिविजन और 6 कश्मीर से हैं। तांगमर्ग सीट का नाम बदल कर गुलमर्ग, जुनीमार का नाम बदल कर जैदीबल, सोनवार का नाम बदल कर लाल चौक कर दिया गया। इसी तरह से पैडर सीट नाम बदल कर पैडर-नागसेनी और कठुआ नॉर्थ का नाम बदल कर जसरोटा कर दिया गया। कठुआ-साउथ का नाम बदल कर कठुआ, खुर सीट का नाम छंब, महोर का गुलाबगढ़, दरहाल का नाम बदल कर बुधल कर दिया गया।
अब प्रश्न यह उठता है कि प​रिसीमन के बाद समीकरण बदलने से किसको फायदा और किसको नुक्सान होगा। जम्मू क्षेत्र की सीटें बढ़ने से विधानसभा में कश्मीर का दबदबा कम होगा। इसका लाभ भाजपा को मिल सकता है।
जम्मू-कश्मीर में पहली बार 9 सीटें एसटी समुदाय के लिए आरक्षित की गई हैं। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पहले ही कह चुके हैं कि यहां गुर्जर और बकरवाल की तरह पहाड़ी समुदाय को भी अनुसूचित जनजाति के तहत आरक्षण का फायदा मिलेगा। इस सियासी दांव का फायदा बीजेपी को मिल सकता है। यहां के 20 जिलों में से 13 जिलों में पहाड़ी आबादी है। राजौरी और पुंछ जिलों में कुल आबादी के आधे से ज्यादा पहाड़ी समुदाय के लोग ही हैं। जम्मू-कश्मीर में कुल आबादी में 8 फीसदी से ज्यादा पहाड़ी समुदाय के लोग हैं। कश्मीर क्षेत्र की 8 और जम्मू क्षेत्र की 4 सीटों पर पहाड़ी समुदाय के वोट ही निर्णायक साबित होते हैं। एसटी के लिए सीटों के आरक्षण से कश्मीर क्षेत्र में बीजेपी का जनाधार बढ़ाने में मदद मिल सकती है। साथ ही हिन्दू वोटरों के साथ-साथ बीजेपी इस दांव के जरिए मुस्लिम समुदाय में भी अपनी पैठ बढ़ाना चाहती है।
पहाड़ी समुदाय का एक बड़ा हिस्सा नैशनल कांफ्रैंस का परम्परागत वोटर रहा है। पीडीपी और कांग्रेस ने भी इसके कुछ हिस्से पर पकड़ बना रखी है। पहाड़ी समुदाय को एसटी में शामिल करने से इनके वोट बंट सकते हैं। जम्मू-कश्मीर में 7 लाख 72 हजार के लगभग वोट बढ़े हैं। हर पार्टी की नजर इन नए मतदाताओं पर होगी। यह इतनी बड़ी संख्या है कि किसी का भी खेल बिगाड़ सकती है।

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