लोकतन्त्र में चुनाव सुधार

पंजाब केसरी के डायरेक्टर आदित्य नारायण चोपड़ा

लोकसभा में चुनाव सुधारों पर चली बहस का निष्कर्ष अभी तक यह निकला है कि विपक्ष ईवीएम मशीनों से मतदान के स्थान पर पुनः बैलेट पेपर की वापसी चाहता है और चुनाव आयोग के चुनाव आयुक्तों को कानून से मिली छूट की समाप्ति चाहता है। ये दोनों विषय ही चुनाव सुधारों के लिए बहुत आवश्यक दिखाई पड़ते हैं क्योंकि ईवीएम मशीनों के बारे मंे देश के मतदाताओं में सन्देह का वातावरण छंटा नहीं है और चुनाव आयुक्तों को सेवा के उपरान्त भी गलत कार्यों के लिए कानून से छूट मिलने का कोई औचित्य नहीं बनता है। चुनाव आयुक्तों को विशेष दर्जा देना लोकतन्त्र में कहीं न कहीं यह आशंका पैदा करता है कि इस पद पर बैठने वाले व्यक्ति की जबावदेही भारतीय संविधान व कानून के प्रति वैसी नहीं है जैसी कि अन्य उच्चाधिकारियों की होती है। इस विसंगति को दूर तभी किया जा सकता है जबकि कानून ‘सभी के लिए एक समान’ के सिद्धान्त को सख्ती से लागू किया जाये। हालांकि भारतीय संविधान के अनुसार कोई भी ऊंचे से ऊंचा पद निरापद नहीं है और राष्ट्रपति तक के विरुद्ध संसद में महाभियोग लाया जा सकता है। इस प्रकार चुनाव आयुक्तों के विरुद्ध भी संसद में महाभियोग लाया जा सकता है परन्तु सेवा उपरान्त उन्हें कानून से छूट देना लोकतन्त्र के हित में दिखाई नहीं पड़ता। बेशक चुनाव आयोग एक स्वतन्त्र व स्वायत्तशासी संवैधानिक संस्था है मगर यह देश के लोगों के प्रति सीधे जवाबदेह होती है और सरकार का इससे कोई लेना– देना नहीं होता। इसलिए नैतिक रूप से यह और भी जरूरी हो जाता है कि चुनाव आयोग हर सूरत में पाक-साफ बना रहे और इसके आयुक्तों पर किसी भी प्रकार की शक की अंगुली न उठ सके। यह मुद्दा इसलिए भी गंभीर है कि चुनाव आयोग ही देश के नागरिकों को मिले सबसे बड़े संवैधानिक ‘एक वोट’ के अधिकार का संरक्षक होता है। मताधिकार की पवित्रता के लिए भी यह आवश्यक है कि चुनाव आयोग हर हालत में पवित्र बना रहे। भारत के नागरिकों को एक वोट का अधिकार कोई सौगात में नहीं मिला है, बल्कि इसके लिए पुरानी पीढि़यों ने स्वतन्त्रता संग्राम लड़ते हुए भारी संघर्ष किया है अतः इस अधिकार की शुचिता को हर हालत में कायम रखना चुनाव आयोग का परम कर्त्तव्य है। हमारे संविधान निर्माताओं की दूरदर्शिता के कारण ही स्वतन्त्र भारत में ‘स्वतन्त्र’ चुनाव आयोग की स्थापना की गई थी जिससे यह प्रमाणित होता रहे कि इस देश का असली राजा आम नागिक ही है जिसके एक वोट की ताकत से सरकारें बनती और बिगड़ती हैं। यह एक वोट का अधिकार महात्मा गांधी ने देने का फैसला 1928 में ही कर लिया था और कहा था कि यह अधिकार भारत के नागरिकों के हाथ में सरकारों के विरुद्ध सबसे बड़ा अस्त्र होगा क्योंकि इसके माध्यम से ही भारत वास्तव में गणतन्त्र में तब्दील होगा परन्तु स्वतन्त्र भारत में आजकल इस वोट को लेकर ही भारी विवाद पैदा हो रहा है और चुनाव आयोग पर विपक्ष आरोप लगा रहा है कि वह एसआईआर (गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण) के बहाने नागरिकों के वोट काट रहा है। विपक्ष का यह आरोप कितना सही है इस बारे में निश्चित रूप से विवाद हो सकता है मगर इतना तय है कि चुनाव आयोग का कार्य अधिक से अधिक संख्या में वयस्क नागरिकों को मतदान प्रक्रिया से जोड़ने का है। साथ ही यह भी तय है कि केवल भारत के नागरिक ही मतदाता हो सकते हैं। इस बारे मंे चुनाव आयोग यदि आवश्यक कदम उठाता है तो उसे एक सिरे से खारिज भी नहीं किया जा सकता। देखना केवल यह होगा कि कोई भी जायज भारतीय नागरिक मतदाता बनने से वंचित न रहने पाये। इसके लिए चुनाव आयोग को यदि अपने नियमों मे ढील भी देनी पड़े तो उसे गलत नहीं माना जाना चाहिए। जहां तक ईवीएम मशीनों का सवाल है तो इनकी संदिग्धता 2009 से ही बनी हुई है। बेहतर होता कि तभी की मनमोहन सरकार ने इस बाबत जरूरी कदम उठाया होता क्योंकि तब सप्रमाण तत्कालीन विपक्षी पार्टी भाजपा ने सिद्ध किया था कि मशीनों से छेड़छाड़ हो सकती है। मगर तब कांग्रेस पार्टी को चुनावों में अच्छी सफलता मिली थी और उसने इस मांग को अनसुना कर दिया। मशीनों के बारे में एक तथ्य साफ है कि ये मतदाता और चुनावी प्रत्याशी के बीच में एक अवरोध या तीसरी शक्ति होती है जबकि भारत के चुनावी कानून जनप्रतिनिधित्व अधिनियम–1951 के अनुसार मतदाता व चुनावी प्रत्याशी के बीच कोई भी दृश्य या अदृश्य तीसरी शक्ति नहीं होनी चाहिए। इस बारे में देश के सर्वोच्च न्यायालय में भी लम्बी–लम्बी बहसें हो चुकी हैं परन्तु नतीजा नहीं बदला जा सका। अतः अब यह सही समय है कि इस बारे में गंभीरता के साथ विचार किया जाये और संसद में इस बारे कानून में संशोधन किया जाये। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि ईवीएम मशीन के माध्यम से चुनाव परिणाम ज्ञात होता है जबकि परिणाम सीधे मतदाता द्वारा दिये गये वोट के आधार पर आना चाहिए। मतदाता जब मशीन में वोट देकर आता है तो वीवीपैट लगे होने के बावजूद वह आश्वस्त नहीं हो पाता कि उसने जिस प्रत्याशी को वोट दिया है उसका वोट उसी को गया है जबकि बैलेट पेपर पर मुहर लगाने के बाद वह पूरी तरह सन्तुष्ट रहता है। मतदाता के मन से इस भ्रम को दूर करना मशीन के बस की बात नहीं है क्योंकि वह बीच में माध्यम या बिचौलिया बनी हुई है। उसका बिचौलिया होना ही सभी शंकाओं को जन्म देता है। अतः अपने लोकतन्त्र को पूरी तरह पाक-साफ रखने के लिए हमें आवश्यक सुधार करने चाहिए। ये सुधार तो केवल प्रक्रियागत हैं जबकि प्रणालीगत सुधारों की तरफ हमें आधारभूत स्तर पर व्यापक संशोधन करने होंगे।

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