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विपक्षी नेताओ का जमघट

कर्नाटक में कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार ने शपथ लेते ही चुनाव में पार्टी द्वारा आम जनता को दी गई पांच वादों की गारंटी को पहली ही मन्त्रिमंडल की बैठक में न केवल मंजूरी दे दी है बल्कि यह घोषणा भी कर दी है

कर्नाटक में कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार ने शपथ लेते ही चुनाव में पार्टी द्वारा आम जनता को दी गई पांच वादों की गारंटी को पहली ही मन्त्रिमंडल की बैठक में न केवल मंजूरी दे दी है बल्कि यह घोषणा भी कर दी है कि वह अवश्यक सरकारी खर्चों की कटौती करके इस गारंटी के लागू हाेने पर होने वाले व्यय 50 हजार करोड़ रुपए को राज्य स्रोतों से ही पूरा करने का प्रयास करेगी। श्री सिद्धारमैया जैसे जन नेता के शीर्ष पर रहते हुए यह लक्ष्य असंभव नहीं कहा जा सकता परन्तु बैंगलुरू में शनिवार को इस नई सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में जिस प्रकार देश के चुनीन्दा विपक्षी दलों के नेता जुटे उसे देख कर भी यह अन्दाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि देश की राजनीति अब किस तरफ मुड़ेगी। जिस विपक्षी एकता का शोर पिछले लम्बे अर्से से सुनाई पड़ रहा है, उसके परवान चढ़ने का समय भी अब नजदीक आता दिखाई पड़ रहा है। सवाल सिर्फ एक एेसे फार्मूले का है जिस पर सभी दलों की स्वीकृति की मुहर लग सके। कुछ राजनैतिक पंडित बैंगलुरू में जमा विपक्षी दलों के नेताओं के जमघट को धर्मनिरपेक्ष ताकतों का महाकुम्भ तक बता रहे हैं और व्याख्या दे रहे हैं कि इस समारोह में आने वाले ऐसे ही दल हैं जो लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की अगुवाई में एकजुट होकर राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का मुकाबला करेंगे। 
इन दलों में प. बंगाल की तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी नहीं थी और भारत तेलंगाना समिति के नेता के. चन्द्रशेखर राव नहीं थे, उत्तर प्रदेश समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव नहीं थे और दिल्ली के मुख्यमन्त्री व आम आदमी पार्टी के नेता श्री अरविन्द केजरीवाल नहीं थे। इनमें से चन्द्रशेखर राव व केजरीवाल को निमन्त्रण ही नहीं भेजा गया था। साथ ही बीजू जनता दल के ओडिशा के मुख्यमन्त्री नवीन पटनायक व आन्ध्र प्रदेश वाई.एस.आर. कांग्रेस के नेता जगन मोहन रेड्डी व उत्तर प्रदेश बहुजन समाज पार्टी की सर्वेसर्वा सुश्री मायावती भी समारोह भी नहीं थे। मोटे तौर पर देखा जाये तो ये ऐसे दल हैं जो पिछले नौ सालों से केन्द्र में सत्तारूढ़ मोदी सरकार की मुसीबत के समय संसद में मदद करते रहे हैं। हालांकि आम आदमी पार्टी के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता है और पिछले कई साल से उसने संसद में भाजपा के विरुद्ध सख्त रुख अपनाया हुआ है। अतः सामान्य रूप से यह कहा जाता है कि बैंगलुरू में जिस-जिस विपक्षी दल के नेता सिद्धारमैया सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में शरीक हुए वे 2024 के यूपीए की संभावित पार्टियां हैं। ये सब दल मिलकर भाजपा के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़ सकते हैं। इन सभी दलों का मूल आधार किसी न किसी रूप में धर्मनिरपेक्षता के सिद्धान्त के चारों तरफ घूमता रहा है। 
यहां तक लगभग 21 वर्षों से भाजपा के सहयोगी रहे नीतीश बाबू के जनता दल (यू) का भी इस सिद्धांत में अटूट विश्वास रहा है और लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल तो ऐलानिया तौर पर धर्मनिरपेक्षता को अपने बुरे वक्तों में भी इस सिद्धान्त को अपनी पार्टी का पहला वाक्य कहती रही है। अतः ममता बनर्जी जैसी नेता का इस समारोह में शामिल न होना यह बताता है कि उनकी वरीयता में कुछ और भी शामिल है। जहां तक मायावती का सवाल है तो उनकी ताकत अब लगभग समाप्ति की तरफ है और उनका लक्ष्य स्वयं को पुराने राजनीतिक कर्मकांडों से अपने को सुरक्षित बचाये रखने का है। समारोह में उत्तर प्रदेश लोकदल के नेता जयन्त चौधरी का शामिल होना बताता है कि लोकसभा चुनावों में उनकी रुची कांग्रेस के सहयोग से अपने मूल जनाधार को मजबूती देने की है। यह जनाधार पश्चिमी व मध्य उत्तर प्रदेश में ही अब बचा है। अपने दादा स्व. चौधरी चरण सिंह की विरासत को बचाने के लिए उनका धर्मनिरपेक्ष ताकतों के साथ दिखना जरूरी है। मगर अखिलेश यादव, ममता दीदी व के. चन्द्रशेखर राव की कहानी दूसरी है, ये शुरू में गैर भाजपा व गैर कांग्रेस के समकक्ष तीसरा मोर्चा बनाने की बातें किया करते थे मगर कर्नाटक में कांग्रेस की प्रचंड जीत से इनके फिलहाल होश उड़े हुए हैं। अतः यह सोचना फिजूल है कि विपक्षी एकता के नाम पर सभी विरोधी दल एक साथ एक मंच पर खड़े हो जायेंगे। कुछ की राजनैतिक मजबूरियां भी उन्हें ऐसा नहीं करने देंगी। 
वैसे एक मजबूत मंच बनने में अभी और समय बाकी माना जा रहा है क्योंकि दिसम्बर महीने तक चार प्रमुख राज्यों में चुनाव होने हैं जिनमें  केवल कांग्रेस पार्टी की ही प्रमुख भूमिका रहेगी और यहां तक रहेगी कि तेलंगाना में उसे भारत तेलंगाना समिति से ही दो-दो हाथ करने होंगे। मगर लोकतन्त्र की मजबूती के लिए ऐसा होना जरूरी भी होता है क्योंकि दिसम्बर महीने तक विधानसभा चुनाव होंगे और अगले साल अप्रैल महीने में लोकसभा के राष्ट्रीय चुनाव होंगे। इन चुनावों में अगर समान विचारधारा वाले दल सैद्धान्तिक आधार पर अपना मोर्चा गठित करते हैं तो राष्ट्रीय स्तर पर चुनावी विमर्श स्पष्ट तौर पर चमकदार होकर मतदाताओं के सामने आयेंगे और इन पर होने वाली लड़ाई से भारत का लोकतन्त्र मजबूत ही होगा। मगर ऐसा नहीं होना चाहिए जैसा 2018 में विपक्षी दलों के ही बैंगलुरू में कांग्रेस-जनता दल (स) की कुमारस्वामी सरकार के शपथ समारोह में जमा होने के बाद हुआ था और 2019 के लोकसभा चुनाव आते-आते ये दल बिखर गये थे।   
आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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