बेहद कम मेहनताने, कंपनी मालिकों के दबाव व ग्राहकों की उपेक्षा झेलते गिग वर्कर्स ने नये साल की पूर्व संध्या पर हड़ताल करके अपनी बदहाली को ही उजागर किया है। संवेदनशील कार्य परिस्थितियों और नौकरी की असुरक्षा के चलते गिग-वर्कर्स हड़ताल पर थे। हालांकि, नये साल पर काम के दबाव व पूरी तरह संगठित न होने के कारण इनकी हड़ताल का कुछ ही इलाकों में असर देखा गया। पूरे देश में सामान की आपूर्ति बाधित हुई हो,ऐसी कोई खबर नहीं मिली। गिग वर्करों की समस्या यह है कि वे जिन कंपनियों के लिए काम करते हैं, उनके वे कर्मचारी नहीं माने जाते। गिग-वर्कर्स की प्रमुख मांग है कि उनके काम का बेहतर भुगतान हो और उनके लिये बेहतर कामकाजी परिस्थितियां बनायी जाएं।
उनकी इस हड़ताल ने इन मुद्दों पर देश का ध्यान खींचा है। गिग वर्कर्स यूनियनों का दावा है कि 31 दिसंबर को देशभर में 2 लाख से ज़्यादा डिलीवरी राइडर्स ने इस हड़ताल में हिस्सा लिया। गिग वर्कर्स ऐसे व्यक्ति होते हैं जो नौ पांच की पक्की नौकरी के बजाय अस्थायी, लचीले समय अवधि वाले या फ्रीलांसर के रूप में काम करते हैं। जोमैटो, स्विगी, ब्लिंकिट आदि जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के डिलीवरी पार्टनर्स या ओला, उबर जैसे कैब प्लेटफॉर्म के लिए काम करने वाले लोग गिग वर्कर्स ही कहलाते हैं। इन्हें हर काम के लिए अलग-अलग पेमेंट मिलता है। ये लोग कंपनी के पक्के कर्मचारी नहीं होते। इसलिए इन्हें नियमित वेतन, भत्ते, या अन्य कर्मचारी लाभ (जैसे पेंशन, छुट्टी) नहीं देना पड़ता है। ऐसे वर्कर्स जितना काम करते हैं, उतना मेहनताना मिलता है।
भारत की गिग इकॉनमी में हाल के वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, वित्त वर्ष 2024-25 तक लगभग 12 मिलियन गिग श्रमिकों का अनुमान है, जो सत्र 2020-21 में लगभग 7.7 मिलियन था। भारत की गिग इकॉनमी श्रम बाज़ार का एक प्रमुख हिस्सा बनकर उभरी है। बीते दिनों नववर्ष की पूर्व संध्या पर ऐप-आधारित डिलीवरी और परिवहन क्षेत्र से जुड़े हज़ारों श्रमिकों द्वारा की गई राष्ट्रव्यापी हड़ताल ने ‘सुविधा आधारित अर्थव्यवस्था’ के पीछे छिपी कठोर वास्तविकताओं को स्पष्ट रूप से उजागर किया है। यह विरोध इस तथ्य की ओर इशारा करता है कि गिग श्रमिक भारत के शहरी दैनिक सेवाओं के लिए कितने महत्त्वपूर्ण बन चुके हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि गिग वर्कर्स कई गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं, जिनमें आय की अनिश्चितता, नौकरी की असुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा का अभाव, और एल्गोरिदम आधारित दबाव प्रमुख हैं, जिससे उन्हें कम वेतन और कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता है, और इन पर तत्काल सरकारी नियमन और बेहतर कार्य परिस्थितियों की ज़रूरत है, जैसा कि हालिया हड़तालों से पता चला है, ताकि उनका शोषण रुके और उन्हें न्याय मिले।
पिछले दिनों आप के राघव चड्ढा और राजद के मनोज कुमार झा जैसे सांसदों ने गिग वर्कर्स के शोषण का मुद्दा संसद में उठाया था। निस्संदेह, देश की गिग अर्थव्यवस्था ने रोजगार सृजन में अपनी क्षमता साबित की है। गिग वर्करों की समस्याएं इसलिए और बढ़ गई हैं, क्योंकि दस मिनट में भी सामान की डिलीवरी करने का चलन जोर पकड़ गया है। इस चलन पर फिर से विचार होना चाहिए, क्योंकि इससे गिग वर्करों के साथ दुर्घटनाएं होने का जोखिम बढ़ गया है। इस पर भी ध्यान दिया जाए कि सामान की डिलीवरी के लिए बैटरी चालित दोपहिया वाहनों का ही उपयोग हो। यह भी समय की मांग है कि गिग वर्करों के साथ असंगठित क्षेत्र के अन्य सभी कामगारों के हित की भी चिंता की जाए। यह ठीक नहीं कि लाखों अस्थायी कामगार सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि गिग इकॉनमी आज तीव्र विस्तार और श्रम न्याय की तात्कालिक आवश्यकता के बीच एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है।
गिग वर्कर्स की कमाई अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर निर्भर है। ग्राहक के घर से रेस्टोरेंट की दूरी के आधार पर इनकी कमाई तय होती है। इस संबंध में पीएआईजीएएम और पेनसिल्वेनिया विश्वविद्यालय द्वारा किए गए शोध के आंकड़ों कहते हैं, लगभग 50 फीसदी डिलीवरी कर्मचारी प्रतिदिन 201-600 रुपये कमाते हैं, जबकि लगभग 43 फीसदी कैब-आधारित गिग वर्कर रोजाना 500 रुपये से कम कमाते हैं।
निश्चित रूप से आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र की अनदेखी नहीं की जा सकती। लेकिन फिलहाल स्थिति यह है कि मेहनताने में कटौती, जरा सी चूक पर आर्थिक दंड तथा समय से पहले पहुंचाने के दबाव से गिग-वर्कर्स त्रस्त हैं। मुश्किल परिस्थितियों में काम करते रहने के बावजूद ये कामगार हड़ताल में बड़ी संख्या में भाग नहीं ले पाये। दरअसल, प्लेटफॉर्म अकसर प्रोत्साहन और अतिरिक्त वेतन के जरिये श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन को दबा देते हैं। नीति आयोग के वर्ष 2024 के एक सर्वेक्षण ने खुलासा किया कि 90 फीसदी गिग श्रमिकों के पास बचत नहीं है। प्लेटफॉर्म के कुछ व्यवहार जैसे छुट्टी लेने वाले कर्मियों को डिस्कनेक्ट करना, उनकी आय की अस्थिरता को और बढ़ा देते हैं।
हड़ताल की धमकी के जवाब में, कुछ एग्रीगेटर्स ने क्रिसमस और वर्षांत के दौरान प्रोत्साहन भुगतान बढ़ा दिए। निश्चित रूप से गिग-वर्कर्स का लगातार 14 घंटे काम करने के बावजूद सात-आठ सौ रुपये कमाना और दुर्घटना बीमा से वंचित रखना, इस व्यवस्था की उन खामियों की ओर भी इशारा करता है, जिन्हें केवल फौरी लालच या प्रोत्साहन से ठीक नहीं किया जा सकता। ऐसे में हालिया श्रम सुधारों का महत्व बढ़ जाता है। जिसमें पहली बार, गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को कानून के तरह औपचारिक रूप से परिभाषित किया गया है। एग्रीगेटर के टर्नओवर का एक से दो फीसदी सामाजिक सुरक्षा कोष में अनिवार्य योगदान और आधार से जुड़े सार्वभौमिक खाता नंबर को कानूनी मान्यता की दिशा में एक लंबे समय से प्रतीक्षित बदलाव का संकेत देते हैं। लेकिन बात तब बनेगी, जब इस प्रस्ताव के प्रावधानों को सही तरह लागू करने में सफलता मिलेगी।


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