राज्यपाल और लम्बित विधेयक !

अब यह पूरी तरह स्पष्ट है कि राज्यपाल विधानसभा द्वारा पारित किसी भी विधेयक को अपने तकिये के नीचे बिछाकर अनिश्चितकाल तक के लिए उसे लम्बित नहीं कर सकते और उन्हें विधेयक का निस्तारण जल्दी से जल्दी करना होगा। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी.वाई. चन्द्रचूड के नेतृत्व में बनी तीन सदस्यीय पीठ ने तमिलनाडु सरकार की इस बारे में राज्यपाल आर.एन. रवि के रवैये के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। पीठ में श्री चन्द्रचूड के अलावा न्यायमूर्ति जे.बी. पर्दीवाल और मनोज मिश्रा भी शामिल हैं। न्यायामूर्ति चन्द्रचूड ने साफ किया कि राज्यपाल किसी विधेयक से सहमत न होने की स्थिति में उसे राष्ट्रपति के विचारार्थ अपने कारण देते हुए प्रेषित कर सकते हैं मगर असन्तुष्ट होने पर विधानसभा को पुनः संशोधन करने के लिए भेजने के बाद उसे विधानसभा यदि यथारूप में ही पुनः पारित करके वापस राष्यपाल के पास भेज देती है तो उन्हें उसे स्वीकृति देनी होगी। इस प्रक्रिया के बाद वह विधेयक को राष्ट्रपति के पास नहीं भेज सकते। न्यायमूर्ति चन्द्रचूड ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 200 में राज्यपाल के जो अधिकार विधेयकों के बारे में हैं, उनमें केवल तीन प्रावधान ही हैं। एक तो राज्यपाल विधेयक को स्वीकृत करें। दूसरे उसे पुनर्विचार के लिए विधानसभा के पास भेज दें और तीसरे उसे राष्ट्रपति के विचारार्थ सौंप दें। चौथा कोई प्रावधान संविधान में नहीं हैं अतः एक बार विधानसभा के पास पुनर्विचार के लिए भेजने पर उसे वापस मिलने पर वह उसी विधेयक को राष्ट्रपति के पास नहीं भेज सकते।
न्यायमूर्तियों की राय थी कि जब राज्यपाल कोई विधेयक सरकार के पास पुनर्विचार के लिए भेजते हैं तो इसे एेसा ही समझा जायेगा जैसे राज्यपाल रवि ने मुख्यमन्त्री एम.के. स्टालिन से विधेयक पर गतिरोध समाप्त करने के लिए विचार-विमर्श किया जिससे उसके स्वीकृत होने में देरी न हो सके। न्यायमूर्तियों की पीठ की राय थी कि जब कोई विधेयक पुनर्विचार के लिए राज्य की सरकार के पास भेजा जाता है और वह उसे यतार्थ रूप में ही लौटा देती है तो उसे राष्ट्रपति के पास इसलिए नहीं भेजा जा सकता क्योंकि राष्ट्रपति भी जनता द्वारा परोक्ष रूप से चुना हुआ पद होता है जबकि विधानसभा भी चुना हुआ सदन होता है। राष्ट्रपति को संविधान बहुत व्यापक शक्तियां ‘सलाह’ रूप में देता है। जबकि राज्यपाल केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त व्यक्ति होता है अतः उसे संविधान में उल्लिखित तीन प्रावधानों के भीतर ही अपने कार्य का निष्पादन करना होगा।
एक बार विधेयक को राज्य सरकार के पास पुनर्विचार के लिए भेजे जाने के बाद यदि वह विधानसभा द्वारा पुनः पारित होकर राज्यपाल के पास आता है तो वह उसे यह कहकर लम्बित नहीं रख सकते कि मैं इसे अब राष्ट्रपति के पास भेजूंगा। सर्वोच्च न्यायालय में तमिलनाडु सरकार के वकील श्री अभिषेक मनु​सिंघवी व केन्द्र सरकार के वकील ए.जी. वेकंटरमणी द्वारा अपने-अपने पक्ष में रखे गये तर्कों से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि देश के कुछ राज्यपालों की विधेयकों को लम्बित रखने की आदत संविधान सम्मत नहीं हो सकती क्योंकि राज्यपाल का पद स्वयं में संविधान के संरक्षक राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में पद स्थापित होता है। हमारे संविधान में यह भी बड़ा स्पष्ट है कि राज्यपाल तभी तक अपने पद पर रह सकता है जब तक कि राष्ट्रपति उससे ‘प्रसन्न’ रहते हैं। बेशक इस प्रसन्नता की व्याख्या अलग-अलग तरीकों से भी की जा सकती है परन्तु मोटे तौर पर संविधान के संरक्षक होने के नाते राष्ट्रपति की प्रसन्नता भी संविधान परक होती है। यही वजह है कि राज्यपाल की भूमिका के बारे में संसद के दोनों सदनों में से किसी में भी बहस नहीं हो सकती। इसकी भी वजह यही है कि किसी भी राज्य में राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में संविधान के संरक्षक की भूमिका में आ जाते हैं। इसी वजह से पद पर रहते समय उन्हें अदालतों में भी नहीं घसीटा जा सकता लेकिन चुनी हुई विधानसभा द्वारा निभाये जा रहे दायित्व के बीच में भी वह व्यवधान खड़ा नहीं कर सकते क्योंकि राज्य सरकार संविधानतः चुनी हुई होती है जिसे शपथ भी राज्यपाल ही दिलाते हैं और विधानसभा में कार्यवाही इसके अध्यक्ष की निगरानी में संविधानतः ही चलती है।
अतः विधानसभा द्वारा पुनः पारित किसी विधेयक को स्वीकृति देने के बजाय राज्यपाल किस तरह उसे राष्ट्रपति के विचारार्थ भेज सकते हैं। यह मूल सवाल तो एेसा है जो सामान्य संवैधानिक जानकारी रखने वाले नागरिक के मन में भी उठ सकता है। इसके साथ यह भी हकीकत है कि भारत की बहु राजनैतिक दलीय प्रशासनिक प्रणाली में प्रदेश सरकारों और केन्द्र सरकार में अलग-अलग राजनैतिक दलों की सरकारें हो सकती हैं। इस व्यवस्था के चलते केवल संविधान ही है जो राजनैतिक दलों को अपने दल गत हित एक तरफ रख कर सरकारें चलाने से बांधता है। इसी वजह से यह कहा जाता है कि भारत में सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो मगर शासन या राज संविधान का चलता है। राज्यपाल के मामले में यह तथ्य और भी संजीदा हो जाता है क्योंकि वह संविधान के संरक्षक का नियुक्त किया हुआ प्रतिनिधि होता है। उसका चुनाव जनता नहीं करती है जबकि जनता अपने राज्य की सरकार को चुनती है और लोकतन्त्र में सरकार राज करती है मगर संविधान के अनुसार । अतः संविधान हर मामले में सर्वोपरि रहता है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों ने राज्यपाल के सन्दर्भ में संविधान के शासन का ही खुलासा किया है।

आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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