ज्ञानपीठ में हिन्दी व तमिल का महासंगम

Summary :

भारत का भाषा संसार भी इसकी विविधता का ठोस परिचायक रहा है। इसके साथ ही जितनी बोलियां भारत में बोली जाती हैं उनकी संख्या विश्व के किसी भी देश में बोली जाने वाली बोलियों में सर्वाधिक है। किन्तु भारत की दो भाषाओं संस्कृत व तमिल के बीच यह विवाद रहा है कि इनमें से पुरातन कौन सी है। संस्कृत को विभिन्न देशी-विदेशी भाषाओं की जननी भी कहा जाता है जिनमें से हिन्दी इसकी उदरस्थ भाषा है परन्तु तमिल का अस्तित्व संस्कृत से स्वतन्त्र माना जाता है और पुरातन भी। पिछले 5 हजार वर्षों का इसका इतिहास पूरी द्रविड़ सभ्यता औऱ…

भारत का भाषा संसार भी इसकी विविधता का ठोस परिचायक रहा है। इसके साथ ही जितनी बोलियां भारत में बोली जाती हैं उनकी संख्या विश्व के किसी भी देश में बोली जाने वाली बोलियों में सर्वाधिक है। किन्तु भारत की दो भाषाओं संस्कृत व तमिल के बीच यह विवाद रहा है कि इनमें से पुरातन कौन सी है। संस्कृत को विभिन्न देशी-विदेशी भाषाओं की जननी भी कहा जाता है जिनमें से हिन्दी इसकी उदरस्थ भाषा है परन्तु तमिल का अस्तित्व संस्कृत से स्वतन्त्र माना जाता है और पुरातन भी। पिछले 5 हजार वर्षों का इसका इतिहास पूरी द्रविड़ सभ्यता औऱ संस्कृति का पुख्ता इतिहास है।
यह भाषा स्वयं में सम्पूर्ण समझी जाती है और इसका साहित्य समग्र द्रविड़ सभ्यता का महासंगम माना जाता है। परन्तु भारतीय जन-जीवन के उत्तर और दक्षिण के स्पष्ट भेद के बीच भी एेसे कई सांझा बिन्दू हैं जिनका भारतीयता से सीधा सम्बन्ध है। इनमें तमिलनाडु में विकसित नाट्य कला ‘भरत नाटयम्’ एेसी नाट्य विद्या है जो उत्तर भारत में ‘कत्थक’ नाम से फली-फूली। परन्तु हिन्दी और तमिल भाषाओं के बीच समागम की संभावनाएं शुरू से ही बहुत क्षीण रहीं। किन्तु वर्तमान 21वीं सदी में हिन्दी और तमिल के बीच की दूरी घट रही है और तमिलवासी हिन्दी सीखने के लिए उद्यत भी हो रहे हैं। आजादी से पहले से ही इस दूरी को कम करने के प्रयास गैर सरकारी स्तर पर शुरू किये गये जिसके सूत्रधार महात्मा गांधी के शिष्य चक्रवर्ती राजगोपालाचारी थे। उनकी निगरानी में दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा ने इस दिशा में कई महत्वपूर्ण काम भी किये मगर कालान्तर में क्षेत्रीय राजनैतिक कारणों से इनमें अवरोध पैदा होता गया।
इस दिशा में देश की भारतीय भाषाओं में साहित्य की उत्कृष्ट रचनाओं को प्रतिवर्ष सम्मान देने वाली संस्था ‘भारतीय ज्ञानपीठ’ एेतिहासिक कार्य कर रही है और भारत की विभिन्न भाषाओं को साहित्य के माध्यम से निकट ला रही है। इस वर्ष का साठवां ज्ञानपीठ पुरुस्कार इसने तमिल कवि श्री आर. वैरमुत्तू को दिया जिसमें 11 लाख रु. की धनराशि के साथ वाग्देवी की कांस्य प्रतिमा व प्रशंसा पत्र दिया जाता है। साहित्य में इस पुरस्कार को भारत का नोबेल पुरस्कार माना जाता है। किसी भी साहित्यकार को मिला यह पुरस्कार उसके जीवन की लम्बी साहित्य संघर्ष यात्रा का पारितोषक देखा जाता है जिसके हकदार बिरले साहित्यकार ही हो पाते हैं। विगत सोमवार को राजधानी के लोधी रोड स्थित चिन्मय सभागार में श्री वैरमुत्तु को यह अलंकरण देश के मूर्धन्य विद्वान व राजनेता तथा जम्मू-कश्मीर के पूर्व महाराजा डा.कर्ण सिंह ने प्रदान किया।
भारतीय ज्ञानपीठ के प्रबन्ध न्यासी साहू अखिलेश जैन के अनुसार ज्ञानपीठ का मुख्य प्रयास यह रहा है कि सभी भारतीय भाषाओं के विद्वतम साहित्यकारों का एक समान रूप से यथोचित सम्मान हो जिससे भारतीयता फले-फूले। ज्ञानपीठ पूर्व में भी तमिलनाडु के दो साहित्यकारों सर्वश्री अकलिन व जयकान्तन् को क्रमशः 1975 व 2002 में पुरस्कृत कर चुका है। परन्तु कविता में सम्मान पाने वाले श्री वैरमुत्तु पहले साहित्यकार हैं। 60वें ज्ञानपीठ समारोह में देश के तमिलनाडु के विख्यात राजनीतिज्ञ व पूर्व वित्त व गृहमन्त्री श्री पी. चिदम्बरम को देख कर मुझे अपार हर्ष का अनुभव हुआ और मैंने उनसे अपने मन की बात कह ही डाली कि हिन्दी संसार के लिए यह एक महान क्षण है कि आप यहां मौजूद हैं। श्री चिदम्बरम हिन्दी समझ तो लेते हैं मगर बोल नहीं पाते। इस सन्दर्भ में मुझे भारतीय राजनीति के इतिहास का वह पल याद आया जब तमिलनाडु के ही कांग्रेस अध्यक्ष स्व. कामराज नाडार ने 1966 में लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद खुद प्रधानमन्त्री बनने से इस लिए इनकार कर दिया था कि उन्हें हिन्दी नहीं आती है। वास्तविकता भी यही थी कि श्री कामराज केवल तमिल भाषा ही जानते थे उन्हें अंग्रेजी भी नहीं आती थी। उन्होंने तब कहा था कि भारत का प्रधानमन्त्री वही व्यक्ति बन सकता है जिसे हिन्दी आती हो। कामराज हिन्दी के राजनैतिक महत्व को समझते थे।
मैं समझता हूं कि श्री चिदम्बरम को स्व. कामराज की कही यह बात याद होगी। इस प्रकार ज्ञानपीठ समारोह मेें मुझे हिन्दी और तमिल भाषा का महासंगम होते दिखा , जिस तरफ साहू अखिलेश जैन ने इशारा किया था। किन्तु ज्ञानपीठ का जिक्र तब तक अधूरा है जब तक इस पुरस्कार के संस्थापक साहू शान्ति प्रसाद जैन और साहू रमेशचन्द्र जैन का जिक्र न किया जाये। साहू शान्ति प्रसाद जैन की सत्तर के दशक में मृत्यु के बाद इस पुरस्कार को लगातार आगे प्रतिष्ठानुरूप जारी रखने का गुरूतर भार साहू रमेशचन्द्र पर आ पड़ा था।
अब यह कार्य उन्हीं के सुपुत्र साहू अखिलेश जैन कर रहे हैं जिससे पुरस्कार की प्रतिष्ठा और आभा सतत बनी हुई है। दरअसल मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के उसी कस्बे नजीबाबाद में हुआ जो साहू शान्ति प्रसाद जैन व साहू रमेश चन्द्र जैन का पैतृक निवास था। मैंने बचपन से ही इन दोनों महानुभावों के बारे में कहानियां सुन रखी थीं कि किस प्रकार साहू साहब ने अपने कस्बे में विद्यालय व कालेज खुलवा रखे हैं जिससे बच्चों की शिक्षा का उत्तम प्रबन्ध हो सके। इस सिलसिले में मुझे अपनी कक्षा छह का 1962 का वह किस्सा अभी तक याद है जब साहू शान्ति प्रसाद मय पूरे परिवार के साथ नजीबाबाद के मूर्तिदेवी सरस्वती इंटर कालेज में आये थे। यह विद्यालय उनकी माता की स्मृति में बनाया गया था। तब उनके साथ ‘राष्ट्र कवि’ रामधारी सिंह दिनकर भी आये थे। अतः साहू साहब के साहित्य प्रेम की झलक इसी से मिल जाती है।
ज्ञानपीठ की स्थापना में राष्ट्र कवि की भी प्रमुख भूमिका रही थी वह इसकी प्रवर परिषद (पुरस्कृत किये जाने वाले साहित्यकारों का चयन करने वाली समिति) के सदस्य भी रहे। ज्ञानपीठ की प्रवर परिषद का चरित्र आज तक वही बना हुआ है इसमें देश के सभी क्षेत्रों में कार्यरत महाविद्वान शामिल रहते हैं। इसलिए श्री वैरमुत्तु का इस पुरस्कार के लिए चुना जाना बताता है कि वह असाधारण प्रतिभा के धनी हैं। श्री वैरमुत्तु की रचनाओं का संसार उन लोगों से आबाद है जो समाज और व्यवस्था के हाशिये पर खड़े हैं। किसान, मजदूर, विस्थापित समुदाय, निर्धन परिवार और वे स्त्रियां जिनकी आवाज अक्सर इतिहास के शोर में दब जाती है। इसी कारण उनकी साहित्यिक उपलब्धि को उनके सामाजिक सरोकारों से अलग रख कर नहीं देखा जा सकता। उनकी एक तमिल कविता के हिन्दी रूपान्तरण की पंक्तियां इस प्रकार हैं :-
जब तक छैनी की चोट सहता है
पत्थर मूर्ति बनता है
जब तक अग्नि की तपिश सहता है
सोना आभूषण बनता है।
उनकी तुलना हिन्दी साहित्य में यदि किसी निकटतम कवि से हो सकती है तो निःसन्देह वह ‘महाप्राण निराला’ ही होंगे। निराला की भी एक प्रसिद्ध कविता है,
इलाहाबाद के पथ पर, वह तोड़ती पत्थर

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