महायुद्ध में महाविनाश

महायुद्ध

खून अपना हो या पराया हो,नस्ल-ए-आदम का खून है आखिर।
जंग मशरिक में हो कि मगरिब में,अम्न-ए-आलम का खून है आखिर।।
बम घरों पर गिरें कि सरहद पर, रूह-ए-तामीर जख्म खाती है।
खेत अपने जलें कि औरों के, जीस्त फाकों से तिलमिलाती है।।
टैंक आगे बढें कि पिछे हटें, कोख धरती की बांझ होती है।
फतह का जश्न हो कि हार का सोग, जिन्दगी मय्यतों पे रोती है।।

साहिर लुधियानवी की यह पंक्तियां युद्ध के विनाशकारी परिणामों को बयां करती हैं। युद्ध के परिणाम बेहद गम्भीर होते हैं जो राष्ट्रों का स्वरूप बदल देते हैं और करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं। युद्ध व्यापक मानवीय पीड़ा का कारण बनते हैं। जिसमें सैनिकों और नागरिकों की जानें जाती हैं। यह दुःखद क्षति लाखों परिजनों और समुदायों को अस्थिर कर देती है जो जीवनभर क्रंदन और आंसुओं का सबब बनती है। रूस- यूक्रेन युद्ध तो चल ही रहा था। अमेरिका और इजराइल ने युन्दोन्माद में अन्तर्राष्ट्रीय नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए ईरान पर हमले कर वहां की सत्ता में परिवर्तन का प्रयास किया।

डोनाल्ड ट्रंप और नेतन्याहू दोनों नेताओं के हाथ खून से रंगे हुए हैं। नोबेल शांति पुरस्कार के दावेदार डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को एक दुष्ट महाशक्ति में बदल दिया है जबकि नेतन्याहू युद्ध अपराधों के लिए पहले से ही अन्तर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय द्वारा वांछित हैं। इसी बीच अफगानिस्तान ने पाकिस्तान के रावलपिंडी स्थित नूरखान सैन्य बेस पर हमला कर सबको चौंका दिया है। ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई, उनके परिवार और 40 से अधिक कमांडरों के मारे जाने के बावजूद ईरान जिस तरह से तेल अवीव और खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी ठिकानों को अपनी मिसाइलों से निशाना बना रहा है, यहां तक कि उसने हूती, हिजबुल्ला शिया मिलिशिया का इस्तेमाल प्रोक्सी युद्ध के तौर पर शुरू किया है उससे युद्ध महाघातक हो गया है।

ईरानी हमलों की प्रतिक्रिया स्वरूप अब नाटो, फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन युद्ध में कूदने जा रहे हैं। उससे युद्ध का विस्तार होना तय है। अमेरिका और इजराइल दोनों ने ईरान पर अपने हमलों को उसके परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल शक्ति को नष्ट करना और सत्ता परिवर्तन के उद्देश्य के रूप में पेश किया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या खामेनेई की मौत के बाद ईरान में सत्ता परिवर्तन होगा। यह वास्तिवकता है कि खामेनेई के शासन के प्रति ईरान की जनता में व्यापक आक्रोश रहा। लाखों लोग उनके खिलाफ सड़कों पर उतर आए थे लेकिन इस समय सवाल ईरान के स्वाभिमान का भी है। राष्ट्रों का यह चरित्र होता है कि जब उन पर बाहरी हमला होता है तो जनता अपने राष्ट्रीय ध्वज के नीचे एकजुट हो जाती है।

ईरान वेनुजुएला नहीं है। ईरान में सत्ता की निरंतता सुनिश्चित करने के लिए संवैधानिक प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। फिलहाल अलीरेजा खामेनेई को अंतरिम सुप्रीम लीडर बना दिया गया है। नए रक्षा मंत्री और नए सैन्य कमांडर भी पद संभाल चुके हैं। यद्यपि हमलों में ईरान को नुक्सान हो रहा है लेकिन उसने सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, जार्डन समेत एक साथ 11 देशों को निशाना बनाकर वैश्विक शक्तियों को हैरान कर दिया है।
महायुद्ध के चलते कच्चे तेल की कीमतों में 13 प्रतिशत का उछाल आ चुका है। शेयर बाजार धराशायी हो चुका है। दुनिया में ऊर्जा सप्लाई बाधित होने की आशंकाएं सच साबित होने जा रही हैं। होर्मुज जल डमरू मध्य पर ईरान का नियंत्रण है जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण जल मार्ग है।

इसे दुनिया में तेल और गैस की सप्लाई की लाइफ लाइन माना जाता है। ईरान ने होर्मुज में तेल टैंकरों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। कच्चे तेल की कीमतें अगर बहुत ज्यादा बढ़ती हैं तो उसका खामियाजा दुनिया को भुगतना पड़ेगा। जब भी ऐसी स्थिति पैदा होती है, चाहे वह 1973 का अरब-इजराइल युद्ध हो या 1979 की इस्लामिक क्रांति। जब-जब तेल की सप्लाई बाधित हुई तब-तब दुनिया को मंदी और महंगाई की मार झेलनी पड़ी। यूक्रेन-रूस युद्ध के चलते भी दुनिया को संकटों का सामना करना पड़ा। यद्यपि भारत ने रूस से सस्ता तेल खरीद कर अपने भंडार भरे हुए हैं। फिलहाल संकट की कोई संभावना नहीं है लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचा तो भारत प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। ईरान भारत का मध्य एशिया में महत्वपूर्ण सहयोगी रहा है।

चाबहार बंदरगाह के जरिए भारत न सिर्फ इस क्षेत्र में बल्कि यूरोप तक पहुंच का रास्ता बना रहा है लेकिन साम्राज्यवादी अमेरिका और विस्तारवादी इजराइल दोनों ने मिलकर भारत की योजनाओं पर पानी फेर दिया है। पिछले वर्ष इजराइल-ईरान के 12 दिन तक चले युद्ध से कहीं खतरनाक वर्तमान युद्ध हो गया है। सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में अमेरिका और इजराइल की गुंडागर्दी कब तक सहन की जा सकती है। ईरान जटिल देश साबित हो रहा है। युद्ध की असली कीमत मानवता को चुकानी पड़ेगी। खाड़ी देशों में एक करोड़ के लगभग भारतीय हैं। जिनकी सुरक्षा को लेकर भारत काफी चिंतित है।

पूरी व्यवस्था के ठप्प होने से भारतीयों द्वारा भेजी जाने वाली धनराशि भी प्रभावित होगी। खाड़ी देशों में रहने वाले प्रवासी भारतीय युद्ध की चपेट में आ सकते हैं और उन्हें देश छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। खाड़ी देशों से एक साथ भारतीयों की वापसी संभव नहीं है। विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ने से रुपया कमजोर होगा तो भारत का आयात बिल भी 15 अरब डालर तक बढ़ सकता है। दुनिया जंगलराज की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। बारूद की गंध हर तरफ महसूस की जा सकती है। सयुक्त राष्ट्र समेत दुनिया की तमाम संस्थाएं बेबस दिखाई दे रही हैं। कूटनीतिक स्तर पर कई देश असहज हैं।

अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमला अपने विरोधी का खत्म करने और वहां अपने हितों के अनुरूप सत्ता कायम करने के लिए ही किया है। इस युद्ध के कुचक्र से कोई बच नहीं सकेगा। अगर मध्यपूर्व में युद्ध लंबा चला और विश्वयुद्ध जैसी स्थितियां उत्पन्न हुईं तो दूरगामी परिणाम होंगे। इस समय ईरान घायल शेर की तरह है। वह अपने स्वाभिमान और अस्तित्व को बचाने के लिए शहादत देने के लिए तैयार है। वह ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका के पालतू देशों के एयर और नेवी बेस को लगातार नुक्सान पहुंचा रहा है। अमेरिका और इजराइल के लिए दांव काफी नुक्सानदेह साबित हो सकता है। मानवता की रक्षा के लिए युद्ध रोकने के प्रयास किए जाने चाहिए। अमेरिका और इजराइल पर लगाम जरूरी है वर्ना नियम आधारित व्यवस्था के निशान भी पूरी तरह से खत्म हो जाएंगे।

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