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उच्च न्यायालयों की महानता

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों ने स्पष्ट कर दिया है कि लोकतन्त्र संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर टिका हुआ वह तन्त्र है जिसमें आम नागरिकों की निष्ठा निवास करती है।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों ने स्पष्ट कर दिया है कि लोकतन्त्र संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर टिका हुआ वह तन्त्र है जिसमें आम नागरिकों की निष्ठा निवास करती है। यह निष्ठा निःसन्देह इन संस्थाओं की कार्यप्रणाली से सम्बद्ध होती है जिससे जन विश्वास और मजबूत होता है। अतः न्यायालयों में जो भी कार्यवाही होती है और इस क्रम में न्यायाधीश जो भी टिप्पणियां या आंकलन करते हैं उनका जनहित में महत्व इस प्रकार होता है कि लोगों को यह पता चलता रहे कि न्याय की प्रक्रिया में वस्तुगत परिस्थितियां किस मोड़ पर हैं या किस तरफ जा रही हैं। अतः उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा किसी भी मामले में की जा रही सुनवाई के दौरान की गई मौखिक टिप्पणियों को मीडिया द्वारा प्रकाशित करना सर्वथा उचित है और इसे केवल आलोचना के नजरिये से देखना अनुचित है। देश की सबसे बड़ी अदालत में चुनाव आयोग द्वारा उस याचिका पर सुनवाई चल रही थी जो उसने मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा चुनाव आयोग पर हत्या का मुकदमा चलाये जाने की टिप्पणियों के खिलाफ दायर की थी। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों सर्वश्री डी.वाई. चन्द्रचूड व एम.आर. शाह की पीठ ने साफ किया कि देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों की लोकतान्त्रिक पद्धति में अपनी विशिष्ट भूमिका है और उनके स्वतन्त्र निर्णयों को किसी विशेष नजरिये से बांध कर देखना उचित नहीं है। उनके खिलाफ कोई निर्देश देकर सर्वोच्च न्यायालय उनका मनोबल तोड़ना नहीं चाहता है। इसके साथ ही विद्वान न्यायाधीशों ने यह भी स्पष्ट किया कि टिप्पणियों या आंकलन को निर्णय समझना भी भूल है क्योंकि न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा मौखिक रूप से व्यक्त किये गये विचारों का अर्थ केवल वह मनःस्थिति ही निकाला जा सकता है जिससे न्यायाधीश गुजर रहे होते हैं। न्यायालय में यह एेसा संवाद होता है जिससे लोगों का विश्वास किसी भी संस्था में जमने में मदद मिलती है। इस मामले को अगर हम व्यापक संदर्भों  में भारत की न्यायप्रणाली के परिप्रेक्ष्य में देखें तो हमें इस निष्कर्ष पर पहुंचने में जरा भी देर नहीं लगेगी कि न्यायपालिका लोकतन्त्र की शुचिता और पवित्रता के साथ ही संविधान के शासन की सबसे बड़ी सिपहसालार रही है।
 जहां तक चुनाव आयोग का सवाल है तो सबसे पहले यह समझा जाना जरूरी है कि भारतीय संविधान के तहत न्यायपालिका की तरह ही इसे सरकार का अंग नहीं बनाया गया है और इसे इस प्रकार शक्ति सम्पन्न किया गया है कि सरकारों से बेपरवाह होते हुए यह केवल संविधान से ही ताकत लेकर अपने कर्त्तव्यों का पालन करे और यह ध्यान रखे कि उसके हर कदम से देश में लोकतन्त्र इस प्रकार मजबूत हो कि किसी भी राजनीतिक दल को उस पर अंगुली उठाने की जरूरत न पड़े। उसकी विश्वसनीयता और निष्पक्षता हर प्रकार के सन्देहों से ऊपर हो। अतः जब इस कर्त्तव्य निष्ठा में कमी उजागर होती है तो स्वतन्त्र न्यायपालिका उसे दुरुस्त करने के लिए सर्वथा अधिकार सम्पन्न है।  देश के उच्च न्यायालयों ने हर उस अवसर पर अपनी अग्रणी स्वतन्त्र भूमिका का निर्वाह किया है जो संविधान के तहत उनकी जिम्मेदारी बनती है। 
 इस सन्दर्भ में हमें इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश स्व. जगमोहन लाल सिन्हा द्वारा 12 जून, 1975 को दिये गये उस एेतिहासिक फैसले को नहीं भूलना चाहिए जिसमें उन्होंने तत्कालीन प्रधानमन्त्री स्व. इंदिरा गांधी के रायबरेली से लड़े गये लोकसभा चुनाव को अवैध करार दे दिया था। यह देश के लोकतन्त्र के इतिहास में अभी तक का सबसे बड़ा फैसला है जो उच्च न्यायालय द्वारा ही दिया गया था। प्रश्न पैदा होता है कि कोई भी संवैधानिक संस्था अपने फैसलों या रवैये पर उच्च न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणियों से क्यों घबराये? घबराहट तब होती है जब सत्य के सात पर्दों के पीछे दबे होने के बावजूद सामने आने का अन्देशा होता है और हमारी लोकतान्त्रिक पद्धति में इसका निषेध पारदर्शिता को प्रशासन का पैमाना मान कर किया गया है। क्या इस हकीकत को हम इतनी जल्दी भूल गये कि मनमोहन सरकार के दौरान देश के ‘मुख्य सतर्कता आयुक्त’ की नियुक्ति को सर्वोच्च न्यायालय ने ‘असंवैधानिक’ करार दे दिया था।  चुनाव आयोग को संविधान में अर्ध न्यायिक अधिकार इसलिए दिये गये हैं जिससे यह अपने स्वतन्त्र व निष्पक्ष दायित्व का निर्वाह करते समय पूरा इंसाफ कर सके। मगर यह कार्य उसे आम जनता की निगाहों के सामने इस प्रकार करना होगा कि लोकतन्त्र की आधारशिला का कोई भी स्तम्भ आवाज न कर सके क्योंकि चुनाव आयोग ही पूरी लोकतान्त्रिक प्रणाली की जमीन तैयार करता है। यह जमीन वह होती है जिसमें विभिन्न विचारधाराओं वाले राजनीतिक दल मतदाताओं के सहयोग से अपनी- अपनी फसल उगाते हैं और भारत के राजनीतिक माहौल को हरा-भरा रखते हैं। निश्चित रूप से इस स्थिति को बरकरार रखने की जिम्मेदारी अन्ततः न्यायपालिका पर ही आती है क्योंकि वह संविधान के शासन की संरक्षक होती है। हमारी महान न्यायपालिका की पूरी दुनिया में प्रतिष्ठा बेजोड़ रही है क्योंकि इसका अहद सिर्फ संविधान के प्रति ही होता है। 

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