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आरबीआई का हथौड़ा

यह बैंक सरकार की मौद्रिक नीति के साथ-साथ अन्य सभी बैंकिंग नीतियों को नियंत्रित करने का दा​यित्व निभाता है। आरबीआई लगातार बैंकों की गतिविधियों पर नजर रखता है।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को बैंकर्स बैंक कहा जाता है। यह बैंक सरकार की मौद्रिक नीति के साथ-साथ अन्य सभी बैंकिंग नीतियों को नियंत्रित करने का दा​यित्व निभाता है। आरबीआई लगातार बैंकों की गतिविधियों पर नजर रखता है। यह बैंकों द्वारा दिए गए ऋणों पर भी निगरानी रखता है। ताकि वह अमीर और गरीब में किसी तरह का भेदभाव न करें और सबको समान रूप से ऋण दें। बैंक यह भी देखता है कि क्या बैंक नियमों और शर्तों का पालन सही ढंग से कर रहे हैं। क्या बैंक ग्राहकों के हितों की रक्षा कर रहे हैं। वित्तीय बाजारों पर निगरानी के साथ-सा​थ रिजर्व बैंक वित्तीय समावेशन पर भी कड़ी निगरानी रखता है। इसके बावजूद कई बैंक घोटाले सामने आ चुके हैं। जब-जब भी निगरानी में कमजोरी आई उसका परिणाम बैंक घोटाले के तौर पर सामने आया। न केवल  सार्वजनिक उपक्रम के बैंकों में बल्कि सहकारी और निजी बैंकों में भी बड़े घोटाले हुए हैं। आरबीआई समय-समय पर उन बैंकों के खिलाफ कार्रवाई करता रहा है। जो नियमों और शर्तों का उल्लंघन करते रहे हैं। एक के बाद एक बैंक घोटालों के बाद भी आरबीआई ने अपनी निगरानी व्यवस्था को पुख्ता किया है। कुछ प्रमुख नीतिगत चुनौतियों का आरबीआई ने सफलतापूर्वक सामना भी किया है। जिसके लिए उसकी सराहना भी की जाती है। रिजर्व बैंक ने पिछले ढाई वर्षों में बैंकों पर 73 करोड़ का जुर्माना लगाया है। इन बैंकों में सार्वजनिक, निजी और विदेशी बैंकों से जुड़े 48 मामले शामिल हैं। आरबीआई के निर्देशों के अनुसार इन बैंकों ने बिना कोई जानकारी दिए प्रावधानों का उल्लंघन किया है। आरबीआई ने इन बैंकों पर जुर्माना तो लगाया लेकिन इस बात की विस्तार से जानकारी नहीं दी कि बैंकों ने किन किन नियमों और शर्तों का उल्लंघन किया है।
आरबीआई के बिना विवरण दिए जुर्माना लगाने के कदम की कई हलकों में आलोचना हुई है, कुछ पर्यवेक्षकों ने केंद्रीय बैंक के फैसलों को चुनौती देने के लिए सिक्योरिटीज़ एपेलेट ट्राइब्यूनल (सैट) जैसी अपीलीय अदालत के गठन की भी मांग की है। जस्टिस बीएन श्रीकृष्ण की अध्यक्षता वाले वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग (एफएसएलआरसी) ने पहले ही आरबीआई सहित सभी वित्तीय नियामकों के लिए एक सिक्योरिटीज़ एपेलेट ट्राइब्यूनल (सैट) जैसी अपीलीय अदालत के गठन की भी मांग की है। जस्टिस बीएन श्रीकृष्ण की अध्यक्षता वाले वित्तीय ​क्षेत्र विधायी सुधार आयोग (एफएसएलआरसी) ने पहले ही आरबीआई सहित सभी वित्तीय नियामकों के लिए एक सिक्योरिटीज एपेलेट ट्राइब्यूनल बनाने की सिफ़ारिश की थी। लगभग इन सभी आदेशों में, आरबीआई ने कहा कि बैंक के खिलाफ ‘आरबीआई की ओर से जारी निर्देशों के कुछ प्रावधानों का पालन न करने’ के लिए कार्रवाई की गई। इसकी तुलना में, दो अन्य नियामकों- सेबी, बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) ने जो पेनाल्टी आदेश जारी किए उसमें ना सिर्फ नियमों के उल्लंघन की विस्तृत जानकारी दी गई बल्कि उनकी कार्यप्रणाली के विवरण भी दिए गए।
वित्त विशेषज्ञों का कहना है कि आरबीआई ने पिछले कई वर्षों में कुछ तरीके स्थापित कर लिए है। वह ना केवल आदेश जारी करता है और विस्तृत स्पष्टीकरण नहीं देता। आरबीआई बैंकों को उन बिंदुओं की जानकारी जरूर देता है। बैंकिंग सैक्टर के विशेषज्ञ आरबीआई के आदेशों के विस्तृत ब्योरे की मांग कर रहे हैं ताकि ग्राहकों को इस बात की जानकारी हो कि किस बैंक ने नियमों, शर्तों और प्रावधानों का किस तरह से उल्लंघन किया है। दूसरी तरफ आरबीआई का कहना है कि वे पूरा ब्योरा बैंकों को देते हैं और उनका जवाब लेते हैं लेकिन वित्त विशेषज्ञों का कहना है​ कि बैंकों के कामकाज में पारदर्शिता होना बहुत जरूरी है। सेबी आरबीआई की स्थापना के कई वर्षों बाद ​अस्तित्व में आई है। वह कोई भी कार्रवाई करने से पहले बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को सुनती है। जब बैंकों की पोल खुली तो भ्रष्टाचार का सारा सच सामने आया। पीएनबी और महाराष्ट्र के कुछ सहकारी बैंकों का काला चिट्ठा सामने आने के बाद आरबीआई को कुछ बैंकों के लाइसेंस रद्द भी करने पड़े। आरबीआई बैंकों पर रेगुलेटरी कम्लायंस में कमियों के आधार पर कार्रवाई करता है। बैंकों पर अक्सर यह आरोप लगता है कि कुछ हजार रुपए या कुछ लाख रुपए के ऋणों की वसूली के लिए कार्रवाई करते हैं। ऐसे ऋण डिफाल्टरों के नाम भी सार्वजनिक कर दिए जाते हैं लेकिन करोड़ों का ऋण लेने वालों पर कार्रवाई देर से की जाती है। जब तक माल उड़ चुका होता है। आरबीआई ने नियमों का पालन नहीं करने वाले बैंकों पर हथौड़ा तो चलाया है, लेकिन इसमें पारदर्शिता का अभाव साफ नजर आ रहा है। रिजर्व बैंक का काम बैंकिंग व्यवस्था की साख को बनाए रखना भी है। बेहतर यही होगा कि रिजर्व बैंक उन कारणों को भी सार्वजनिक करे ताकि बैंकों की कारगुजारी व्यवस्था का पता ग्राहकों को भी लग सके। बैंकिंग व्यवस्था की साख अधिक पारदर्शिता से ही कायम होगी।

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