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ये मानवता के दुश्मन

कोरोना के खिलाफ जंग में पूरी ईमानदारी और तन-मन-धन के साथ लड़ने वालों की हमारे यहां कोई कमी नहीं है। डाक्टर, हैल्थकर्मी, नर्सेंं, पुलिसकर्मचारी और मीडियाकर्मी के अलावा समाज के अनेक संगठन कोरोना के दौरान जान हथेली पर रखकर कोरोना पीडि़तों और कोरोना प्रभावितों केे लिए काम करते रहे

कोरोना के खिलाफ जंग में पूरी ईमानदारी और तन-मन-धन के साथ लड़ने वालों की हमारे यहां कोई कमी नहीं है। डाक्टर, हैल्थकर्मी, नर्सेंं, पुलिसकर्मचारी और मीडियाकर्मी के अलावा समाज के अनेक संगठन कोरोना के दौरान जान हथेली पर रखकर कोरोना पीडि़तों और कोरोना प्रभावितों केे लिए काम करते रहे। इसी का फल है कि कोरोना के खिलाफ पहली, दूसरी और अब तीसरी लहर में भी भारत डटा हुआ है। लेकिन हर अच्छी चीज के साथ-साथ दुर्भाग्य के चलते एक बुरा पहलू भी जुड़ा है। कोरोना के इलाज के नाम पर अगर कोई नकली वैक्सीन बना लेता है। नकली टेस्टिंग किट बना लेता है, नकली कोविशिल्ड जोइकोव-डी या फिर स्वेबस्टीक और कोरोना की जांच के लिए हजारों शीशियां मार्किट में उतारने को तैयार हो तो इसे क्या कहेंगे। गनीमत यह है कि एटीएफ ने यह सारा साजोसामान वाराणसी के एक इलाके में छापा मारकर पकड़ा। यह साजोसामान इतना था कि 60,000 से 1,00,000 लोगों तक को ट्रीटमेंट  दिया जा सकता था। अभी इस पर आगे खुलासा होगा। कितने शहरों में यह सारा मानव और मानवता के खिलाफ तबाही का सामान भेजा गया, इसका कोई  हिसाब-किताब नहीं है। इंसानियत के नाम पर यह कौन सा ऐसा गैंग है और मानवता का ऐसा कौन सा दुश्मन है कि जो कोरोना के खिलाफ चल रही जंग को कमजोर करके धन-दौलत कमाना चाहता है। ऐसे दानवों के लिए कड़ी से कड़ी सजा होनी चाहिए और सबकुछ फास्ट ट्रैक के आधार पर सामने आना चाहिए। जितनी जल्दी हो सके मानवता के इन गुनाहगारों को सजा दी जाये वही एक बड़ा न्याय होगा। 
अब आते हैं हम उस साल भर पहले के भयानक दौर पर कि जब ऑक्सीजन प्राप्त करने के लिए अपने रिश्तेदारों की उखड़ती सांसें बचाने के लिए देश और दिल्ली में जंग चल रही थी। उस समय भी कितने ऑक्सीजन के सिलेंडर ब्लैक हुए रेमडेशिवर की ब्लैक तथा अन्य कोरोना निरोधक दवाओं की कालाबाजारी और धन कमाने की होड़ में लगे लोगों को अगर तब हमने सजा दी होती तो आज यह दिन देखना नहीं पड़ता। एक-दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने से कुछ नहीं होगा। बात सिर्फ इतनी है कि कोरोना जैसी महामारी के खिलाफ पूरी दुनिया डटी हुई है। ऐसी अभूतपूर्व तबाही इस सदी में तो हमने नहीं देखी। लगभग पांच लाख लोग तो भारत जैसे देश में ही कोरोना से जान गंवा चुके हैं। दुनिया के किसी कोने से मानवता के खिलाफ ऐसा उदाहरण हमें कहीं देखने को नहीं मिला जो तीन दिन पहले सामने आया है कि कोरोना खत्म करने वाली नकली दवाएं सामने आ रही हैं। कितने लोगों को यह दवाएं लग गयी होंगी? कितने लोगों ने नकली दवाएं खा ली होंगी? कितने लोगों की नकली जांच होकर कोरोना नेगेटिव के सर्टिफिकेट दे दिये गये होंगे और ऐसे कितने ही लोग कोरोना के रोगी बनकर खुले में घूम रहे होंगे?, कितने ही लोग इनकी वजह से कोरोना का शिकार हो गए होंगे? हर तरफ सवाल ही सवाल है और इसका जवाब पूरा देश मांग रहा है। यह एक बहुत ही चिंतनीय बात है। 
जो एसटीएफ आतंकवाद जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करने के लिए अपराधियों की नकेल कसने के लिए बनी है उसे ऐसी दवाओं की जमाखोरी के गुनाहगारों की तलाश करनी पड़ रही है तो हमारी सरकार से यही प्रार्थना है कि असली गुनाहगार सलाखों के पीछे होने चाहिए और जूडीशियल कस्टडी या पुलिस रिमांड जैसी बातें नहीं चाहिए। ताबड़तोड़ इंसाफ चाहिए अर्थात दोषी को तुरंत सजा मिलनी चाहिए। सजा भी ऐसी कि जो पूरे देश में उदाहरण बन सके। प्रशासनिक तौर पर और अदालती तौर पर मानव और मानवता के दुश्मन के लिए अपनी जान बचाने के लिए अपील करने की कोई  गुंजाइश ही नहीं होनी चाहिए तभी बात बनेगी। कोरोना की पहली से तीसरी लहर तक हो सकता है ऐसे कांड पहले भी होते रहे हो जो पकड़ से बच गये हो लेकिन अब सबकुछ सामने आ गया है तो जितने पांच लोगों की गिरफ्तारी हुई  है उन लोगों को तुरंत कार्यवाही की जद में लाना चाहिए। इतना बड़ा नेटवर्क बिना किसी तकनीकी विशेषज्ञ के नहीं बन सकता। देश और देशवासियों को इस गुनाह और गुनाहगार की सजा का इंतजार है। उम्मीद है कि यह काम जल्दी होगा।

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