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भारत की आवाज सुने दुनिया

तजाकिस्तान की राजधानी दुशांबे में अफगानिस्तान पर शंघाई सहयोग संगठन के विदेश मंत्रियों की बैठक में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अफगानिस्तान को लेकर भारत के दृष्टिकोण को दुनिया के सामने रख दिया है।

तजाकिस्तान की राजधानी दुशांबे में अफगानिस्तान पर शंघाई सहयोग संगठन के विदेश मंत्रियों की बैठक में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अफगानिस्तान को लेकर भारत के दृष्टिकोण को दुनिया के सामने रख दिया है। साथ ही उन्होंने तालिबान को हिंसा के जरिये सत्ता पर काबिज होने को लेकर चेतावनी भी दी। संगठन का मुख्य उद्देश्य आतंकवाद और कट्टरपंथ से मुकाबला करना है। ऐसे में वित्त पोषण रोकने की जरूरत है। विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि अफगानिस्तान का भविष्य उसका अतीत नहीं हो सकता। भारत ने संघर्ष ग्रस्त देश के लिए तीन सूत्री रोडमैप पेश किया, जिसमें हिंसा और आतंकवादी हमलों की समाप्ति, सभी धार्मिक और जातीय समूहों से बातचीत के माध्यम से संघर्ष का समाधान और पड़ोसी देशों को सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम शामिल हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि अफगानिस्तान के लोग भी खून-खराबे से तंग आ चुके हैं और वे स्वतंत्र, तटस्थ, एकीकृत, शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक और समृद्ध राष्ट्र चाहते हैं। देश की नई पीढ़ी की अलग-अलग उम्मीदें हैं। वे खुली हवा में सांस लेना चाहते हैं। भारत ने तो चीन और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों की मौजूदगी में अपना स्टैंड स्पष्ट कर दिया है। अब देखना है ​कि संगठन के दूसरे देशों की प्रतिक्रिया क्या होती है। शंघाई सहयोग संगठन को स्थापित हुए 20 वर्ष हो चुके हैं। तब से लेकर अब तक लम्बी यात्रा तय कर चुका है। इसमें भारत, चीन, पाकिस्तान के अलावा 8 यूरोपीय देश शामिल हैं। आज इसकी प्राथमिकता इस क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता कायम करना है लेकिन समस्या यह है कि  अफगानिस्तान में तालिबान और पाकिस्तान की नजदीकियां किसी से छुुपी हुई नहीं हैं। पाकिस्तान उसे हथियार भी देता रहा है और वित्त पोषण भी करता रहा है। दुनिया जानती है कि अफगानिस्तान में पाकिस्तान हक्कानी नेटवर्क के जरिये भारतीय ​ठिकानों पर हमले कराता रहा है। दूसरी तरफ चीन का लद्दाख में एलसीपी को लेकर भारत के साथ टकराव चल रहा है। इसी बीच अफगानिस्तान और पाकिस्तान से आई दो बड़ी खबरें बताती हैं कि आतंकवाद की चुनौ​ती कितनी विकराल रूप ले रही है। तालिबान ने 22 निहत्थे अफगान कमांडरों का कत्ल कर​ दिया, फिर तालिबान ने पाकिस्तान के खैबर पख्तूनवां प्रांत में हमला बोल कर पाकिस्तान सेना के कैप्टन समेत 15 जवानों को मार डाला और कुछ जवानों को अगवा कर लिया। पाकिस्तान ने आतंकवाद के जो बीज बोये आज वह रौद्र रूप धारण कर उसी को शिकार बनाने लगा है। यह खबर भी चीन के लिए बहुत दर्दनाक होगी कि दसू बांध पर काम कर रहे चीनी इंजीनियरों और पाकिस्तान सैनिकों को ले जा रही बस में बम धमाका हुआ, जिसमें 9 चीनी इंजीनियरों समेत 12 लोग मारे गए। चीन इस हमले से तिलमिला उठा है।
पाकिस्तान में पीओके से लेकर अन्य राज्यों के लोग चीन की मौजूदगी का ​विरोध कर रहे हैं। अफगानिस्तान के ग्रामीण इलाकों में भी तालिबान का दबदबा बढ़ता जा रहा है। तालिबान की बर्बर वापसी को लेकर विशेषज्ञ पहले ही कह चुके हैं कि काबुल के लिए हालात सम्भालना कठिन होगा। तालिबान और अलकायदा की दुर्भिसंधि तोरा-बोरा की पहाड़ियों के भीतर अब दबी छिपी नहीं। पाकिस्तान की फौज और उसकी आईएसआई के उनके साथ रिश्ते जगजाहिर हैं। दुर्भाग्य यह है कि पाकिस्तान खुद जख्म खाकर भी आतंकवाद के खिलाफ जंग में ईमानदार नहीं और चीन आतंकवादी देश पाकिस्तान की मदद कर रहा है। बर्बर तालिबान केवल भारत के लिए चिंता का सबब नहीं है। काबुल में तालिबान की मजबूती चीन के लिए भी सिरदर्दी है। चीन के शिंजियांग सूबे से सौ किलोमीटर की दूरी पर ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट के लड़ाके तालिबान की सरपरस्ती में जमा हैं। भविष्य में चीन को पाकिस्तान से दोस्ती महंगी पड़ सकती है। वर्तमान में अफगानिस्तान में सत्ता और शक्ति के दो ध्रुव हैं, पहला चुुनी हुई सरकार और दूसरा तालिबान। 
अफगानिस्तान में संघर्ष गहरा रहा है। क्या अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय को मूकदर्शक बने रहना चाहिए। 2021 के तालिबान को 1996 का तालिबान समझना भी सही नहीं होगा। इस बार यह महज सुन्नी पश्तून फौज नहीं है। इसमें अफगानिस्तान, ताजिक और उज्बेकों की संख्या भी अच्छी खासी है। यहां तक कि शिया कमांडर की बात कही जा रही है। इसका मकसद चाहे कुछ भी हो लेकिन तालिबानी कट्टरता के साथ इस उदार छवि के तकाजों का सहज मेल नहीं बैठता। एस. जयशंकर ने चीन के विदेश मंत्री से मुलाकात के दौरान दो टूक कहा है कि गतिराेध लम्बा हो जाए तो तनाव बढ़ता ही है।  विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने जिस सख्ती के साथ तालिबान को चेतावनी दी है, वह एक संकेत है कि तालिबान पूरी दुनिया के लिए खतरा है। यह समय सुरक्षा चुनौतियों को समझने का है। अगर अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय मौन धारण कर बैठा रहा तो फिर दुनिया में खून-खराबा ही होगा। दुनिया को भारत की आवाज  सुनकर ठोस कदम उठाने होंगे। अफगानिस्तान शंघाई सहयोग संगठन की भी अग्नि परीक्षा है।
आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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