14 सितंबर आते ही देशभर के स्कूलों और सरकारी दफ्तरों में वही तस्वीर दोहराई जाती है – दीवार पर “मातृभाषा का सम्मान करें” के पोस्टर, मंच से हिंदी को सिंहासन पर बिठाने वाले भाषण, और शाम होते ही सब कुछ फिर अंग्रेज़ी में लौट आना। यह तारीख भी उतनी रोमांटिक नहीं जितनी बताई जाती है। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में तीन साल की खींचतान के बाद जो फैसला हुआ, वह दरअसल के.एम. मुंशी और एन. गोपालस्वामी अयंगर के नाम पर बना एक समझौता था, जिसे मसौदा समिति के अध्यक्ष भीमराव आंबेडकर ने भी आगे बढ़ाया – हिंदी को संघ की राजभाषा माना गया, पर अंग्रेज़ी को पंद्रह वर्ष के लिए साथ बनाए रखने की शर्त पर। यानी जिस दिन को हम भावना का दिन समझते हैं, वह असल में एक व्यावहारिक सौदेबाज़ी का दिन है। तो आज भी इस पर भावुक होने की बजाय व्यावहारिक हिसाब लगाना ही ठीक रहेगा-और वह हिसाब जेन-ज़ी की असल ज़िंदगी से शुरू होना चाहिए, किसी दीवार के पोस्टर से नहीं।
किसी भी घर के पारिवारिक व्हाट्सएप ग्रुप का स्क्रीनशॉट उठा लीजिए। “kal ka plan finalize kar diya kya” जैसे वाक्य अब अपवाद नहीं, नियम हैं। यह अकेला एहसास नहीं, आंकड़ा भी है। हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है कि हिंदी-भाषी सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं में इंग्लिश लिखने वालों का हिस्सा 2014 के 44.9 प्रतिशत से बढ़कर 2020 के बाद 56.3 प्रतिशत हो चुका है, और बॉलीवुड को इसका सबसे बड़ा वाहक बताया गया है। भाषाविद् प्रांजलि बी इसे स्वाभाविक बदलाव मानती हैं, पर साथ ही चेताती भी हैं कि “जब हम बहुत ज़्यादा मिलाते हैं, तो नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा के मूल और शुद्ध रूप से नाता खो सकती है।” यह चेतावनी सही है, पर अधूरी है, क्योंकि असली सवाल शुद्धता का नहीं, अवसर का है।
यहां कोई यह नहीं कह रहा कि कोड अंग्रेज़ी में मत सीखो, या एआई से हिंदी में ही बात करो – वह ज़रूरत अपनी जगह है, और आज के औज़ार वैसे भी मिली-जुली भाषा को समझने लगे हैं। सवाल यह है कि अंग्रेज़ी सीखने की होड़ में हिंदी पर पकड़ को अनावश्यक मान लेना कहां-कहां नुकसान का सौदा बन जाता है। भुवन बाम का नाम लीजिए – जिसने किसी अंग्रेज़ी स्क्रिप्ट या विदेशी फॉर्मेट का सहारा नहीं लिया, अपने घर की भाषा में टिटू मामा और बंचो जैसे किरदार गढ़े, और वही ठेठ हिंदी उसे करोड़ों दर्शकों तक ले गई, एक पूरा मनोरंजन साम्राज्य खड़ा कर दिया। रील और स्टैंड-अप की दुनिया में जो आवाज़ें आज सबसे ज़्यादा गूंजती हैं, वे अंग्रेज़ी की नहीं, गली-मोहल्ले की हिंदी की आवाज़ें हैं, क्योंकि वहां भरोसा भाषा की सफाई से नहीं, अपनेपन से बनता है।
फिल्म समीक्षा की दुनिया भी यही कहानी दोहराती है। “फिल्मी इंडियन” चलाने वाली दीक्षा शर्मा के चौंतीस लाख से ऊपर सब्सक्राइबर हैं, जो देश के किसी भी अंग्रेज़ी समीक्षक से कहीं आगे हैं, और समीक्षक आमिर अंसारी इसकी वजह साफ बताते हैं -हिंदी में बात करने वाला समीक्षक “शहर के दफ्तर जाने वाले से लेकर छोटे कस्बे के दर्शक तक” को अपना दोस्त लगता है, कोई ब्लेज़र पहने आलोचक नहीं। जनगणना के आंकड़े भी यही इशारा करते हैं कि हिंदी बोलने वालों की तादाद अंग्रेज़ी बोलने वालों से चार गुणा से भी ज़्यादा है। ओटीटी की दुनिया में भी, तमाम क्षेत्रीय भाषाओं के बढ़ते दबदबे के बावजूद, दो हज़ार पच्चीस में बने कुल मौलिक शो और फिल्मों में 60 प्रतिशत हिस्सा अब भी हिंदी का ही है। यानी जो जेन-ज़ी लिखना, निर्देशन करना या संवाद गढ़ना चाहता है, उसके लिए हिंदी पर मज़बूत पकड़ कोई विरासत का बोझ नहीं, कमाई का सीधा रास्ता है।
और सबसे नाज़ुक मोर्चा घर के भीतर का है। शहरी हिंदीभाषी घरों की भाषा-नीति पर हुए एक ताज़ा शोध में यही उभरकर आया है कि मां और नानी-दादी के बीच अंग्रेज़ी और हिंदी को लेकर एक अनकहा टकराव हमेशा चलता रहता है, और इसी टकराव में बच्चे की भाषा तय होती जाती है। मनोचिकित्सा पर हुए शोध भी बताते हैं कि गहरी भावनाएं इंसान अक्सर अपनी मातृभाषा में ही ठीक से व्यक्त कर पाता है, किसी सीखी हुई भाषा में नहीं। इसका सीधा मतलब यह है कि जो जेन-ज़ी अपनी दादी की झिड़क, नानी की लोरी और घर के मुहावरों की भाषा में उलझना छोड़ देता है, वह अपने ही घर में परदेसी बनने लगता है -किसी रिश्ते को थामे रखने, किसी बुज़ुर्ग को सचमुच सुनने, किसी पारिवारिक खटपट में बीच का रास्ता निकालने का हुनर उसी भाषा में बचा रहता है जिसे वह “पुरानी” मानकर परे रख रहा है। दिलचस्प यह भी है कि डुओलिंगो लैंग्वेज रिपोर्ट 2025 की ताज़ा रिपोर्ट में हिंदी दुनिया की दस सबसे ज़्यादा सीखी जाने वाली भाषाओं में शुमार है-यानी जिस भाषा को यहां के कुछ युवा बोझ मान बैठे हैं, उसे सीखने के लिए दुनिया के दूसरे कोने में लोग कतार लगाए बैठे हैं।
तो हिंदी दिवस पर उपदेश देने या राष्ट्रभाषा का झंडा गाड़ने से कुछ हासिल नहीं होगा। असली बात इतनी है कि अंग्रेज़ी और कोड और एआई अपनी जगह कमाने के औज़ार हैं, पर जिस मंच पर भीड़ रुककर सुनती है, जिस समीक्षा पर दर्शक भरोसा करता है, जिस पटकथा पर ओटीटी दांव लगाता है, और जिस भाषा में कोई बुज़ुर्ग आखिरी बार पूरी तरह समझा हुआ महसूस करता है – वहां हिंदी पर पकड़ ही असली मुकाम तय करती है। सवाल अंग्रेज़ी छोड़ने का कभी नहीं था, सवाल यह है कि क्या हिंदी को समय रहते दोबारा अपनी ताकत मान लिया जाए, इससे पहले कि यह मौका भी बाकी सब की तरह स्क्रॉल होकर आगे निकल जाए।
- रविकान्त राऊत


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