नई दिल्ली में समाप्त हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की सबसे बड़ी सफलता यह है कि इसकी विस्तारित सदस्य देश संख्या 11 के मध्य आपसी राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए एेसा सांझा सर्वसम्मत बयान जारी हुआ जिसमें एक-दूसरे की भौगोलिक संप्रभुता का सम्मान करते हुए आपसी सद्भाव बढ़ाने का निश्चय किया गया। नई दिल्ली में जारी यह घोषणापत्र बताता है कि पश्चिम एशिया में ईरान व अमेरिका के सैनिक संघर्ष के चलते इस क्षेत्र के सदस्य देशों के बीच आपसी हितों का भारी टकराव हो रहा था जिसके चलते किसी सर्वसम्मत निर्णय पर पहुंचना एक दुष्कर कार्य था। परन्तु सम्मेलन के दौरान जिस प्रकार ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान व संयुक्त अरब अमीरात के अमीर शेख खालिद बिन मोहम्मद-बिन जायद अल नायन के बीच विशिष्ट वार्ता हुई उससे आपसी मतभेद दूर हुए क्योंकि पश्चिम एशिया संघर्ष के चलते अमीरात के कई शहरों व इसके आधारभूत नागरिक ढांचे को ईरानी हमलों का शिकार बनना पड़ा था। इसके अलावा भारत के प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी व चीन के राष्ट्रपति शी-जिनपिंग के बीच हुई द्विपक्षीय विशिष्ट वार्ता में इस बात पर सहमति बनी कि दोनों देशों के बीच सीमा सहित अन्य मसलों का निपटारा वाजिब तौर से तार्किक आधार पर दोनों पक्षों को मान्य हल के साथ होना चाहिए और मतभेदों को विवाद में तब्दील नहीं किया जाना चाहिए।
यहां यह महत्वपूर्ण है कि चीन के पास अब चालू वर्ष के लिए ब्रिक्स की अध्यक्षता आ गई है। दोनों देशों ने यह भी अहद किया है कि दोनों के सम्बन्ध सांझा सम्मान, सांझा संवेदनशीलता व सांझा हितों पर टिके होने चाहिए। इससे यह ध्वनि तो निकलती है कि भविष्य में चीन भारत के साथ सीमा विवाद को लेकर अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण से काम करेगा परन्तु भारत को यह ध्यान में रखना होगा कि 2020 में लद्दाख में गलवान घाटी में दोनों देशों के बीच हुई सैनिक झड़प के बाद चीन की नीयत नियन्त्रण रेखा में बदलाव की है क्योंकि इसके बाद वह हमारे अरुणाचल प्रदेश में अनाधिकार हस्तक्षेप की हरकतें भी कर रहा है। मगर चीन भी इस हकीकत से अच्छी तरह वाकिफ है कि आज का भारत 1962 का भारत नहीं है कि वह एकतरफा कार्रवाई करते हुए अपनी फौजें असम के तेजपुर तक भेज दे। आज का भारत उसे नियन्त्रण रेखा पर ही सैनिक के बदले सैनिक उतार कर कार्रवाई करने में सक्षम है। इसके अलावा संयुक्त घोषणा पत्र में अमेरिका व इसके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का नाम लिये बगैर जिस प्रकार विश्व व्यापार में एकतरफा शुल्क लगाने और कुछ देशों के खिलाफ मनमाने तरीके से दंडात्मक आर्थिक प्रतिबन्ध लगाने का विरोध किया गया है उससे ब्रिक्स समेत दुनिया के दक्षिणी विकासशील देशों का पक्ष प्रबल होता है। ब्रिक्स देशों ने विश्व व्यापार संगठन की हाशिये पर जा रही भूमिका के प्रति भी चिन्ता प्रकट करते हुए बहुद्देशीय व्यापार में निर्धारित नियमों के अनुपालन पर जोर दिया है। इसके सापेक्ष ब्रिक्स की यह चिन्ता वाजिब है कि वर्तमान विश्व व्यवस्था का संचालन पुरानी गठित संस्थाएं नहीं कर सकती हैं अतः इनके पुनर्गठन की सख्त जरूरत है।
इस सन्दर्भ में राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता भारत जैसे तेज गति से प्रगति करते देश को मिलनी चाहिए। दरअसल यह मांग तभी 2006 से हो रही है जब ब्रिक्स के गठन की परिकल्पना को भारत रत्न स्व. प्रणव मुखर्जी ने देश के विदेशमन्त्री की हैसियत से मूर्त रूप दिया था और आह्वान किया था कि मौजूदा वैश्विक विकास क्रम को देखते हुए इसके संचालक देशों की हिस्सेदारी अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं में तय की जानी चाहिए। इसके बाद 2008 में भारत व अमेरिका के बीच परमाणु समझौता हो जाने के बाद भारत वैध व अधिकृत रूप से विश्व का छठा परमाणु शक्ति सम्पन्न देश घोषित हो गया था। अतः राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद में इसकी स्थायी सदस्यता स्वाभाविक तौर पर भी बनती थी। ब्रिक्स सम्मेलन में भारत की स्थायी सदस्यता के समर्थन से यह भी सिद्ध होता है कि दुनिया के दक्षिणी देश विश्व पंचायतों में अपना वाजिब हक पाने को आतुर हैं।
ब्रिक्स सम्मेलन के बाद भारत व ईरान करीब आये हैं और ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियान की भी प्रधानमन्त्री मोदी से द्विपक्षीय विशिष्ट वार्ता हुई है। पश्चिम एशिया संघर्ष के चलते विभिन्न कारणों से इसमें कुछ ढिलाई आयी थी। भारत व ईरान के बीच हजारों साल पुरानी सभ्यतागत मित्रता है। इस तथ्य से हम मुंह नहीं मोड़ सकते हैं क्योंकि ईरान कमोबेश तरीके से अन्तर्राष्ट्रीय मसलों पर भारत के यदि बहुत निकट नहीं रहा तो बहुत दूर भी नहीं रहा (कश्मीर पर उसका रवैया जरूर ढुल-मुल रहा है)। इसकी प्रमुख वजह यह रही कि 1953 में इस देश में प्रधानमन्त्री मुसद्दिक की लोकतान्त्रिक सरकार के तख्तापलट होने के बाद 1979 तक यहां स्थापित शाही शासन अमेरिका का पिछलग्गू रहा और उस दौरान अमेरिका पाकिस्तान का जबर्दस्त हिमायती था। इसके बावजूद ईरान के साथ भारत के व्यापारिक सम्बन्ध बहुत मजबूत रहे और दोनों देशों का कारोबार स्थानीय मुद्रा में ही होता था। घोषणापत्र में भी जिस तरह सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में ही कारोबार को बढ़ावा देने पर बल दिया गया है उससे यही सिद्ध होता है कि इस मोर्चे पर ब्रिक्स डाॅलर में ही कारोबार करने की अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की धमकी को ज्यादा तवज्जों नहीं देता है और यहीं से डॉलर के स्थान पर व्यापार के लिए ब्रिक्स की साझा मुद्रा का रास्ता निकलेगा।
ब्रिक्स देशों का यह रुख बेशक अमेरिका के खिलाफ नहीं कहा जा सकता क्योंकि इसमें विश्व की जड़तम स्थिति में पहुंची व्यवस्था को वर्तमान यथार्थ की रोशनी में गति देने की जिज्ञासा छिपी हुई है। किन्तु यह भी दीगर सवाल भारत के सामने हैं कि चीन के हाथ में अध्यक्षता आने के बाद और ईरान-अमेरिका युद्ध में ईरान के शक्तिशाली होकर निकलने के उपरान्त कहीं यह देश रूस, चीन व ईरान की तिकड़ी बनाने की तरफ न बढ़ चले। अमेरिका से ईरान के चल रहे संघर्ष के दौरान रूस व चीन दोनों ही ईरान की तरफ खड़े रहे हैं, हालांकि रूस भारत का परखा हुआ सच्चा मित्र देश है फिर भी हमें इस मोर्चे पर सावधानी बरतनी होगी।
‘ब्रिक्स’ का फलितार्थ
Summary :
नई दिल्ली में समाप्त हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की सबसे बड़ी सफलता यह है कि इसकी विस्तारित सदस्य देश संख्या 11 के मध्य आपसी राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए एेसा सांझा सर्वसम्मत बयान जारी हुआ जिसमें एक-दूसरे की भौगोलिक संप्रभुता का सम्मान करते हुए आपसी सद्भाव बढ़ाने का निश्चय किया गया। नई दिल्ली में जारी यह घोषणापत्र बताता है कि पश्चिम एशिया में ईरान व अमेरिका के सैनिक संघर्ष के चलते इस क्षेत्र के सदस्य देशों के बीच आपसी हितों का भारी टकराव हो रहा था जिसके चलते किसी सर्वसम्मत निर्णय पर पहुंचना एक दुष्कर कार्य था। परन्तु सम्मेलन…


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