जब अटल जी गए फैज से मिलने

Summary :

जब आसपास के माहौल में ज़हर की बारिश हो रही हो, तेज़ाबी भाषा में भाषण पिलाए जा रहे हों और अपने ही देश में एक-दूसरे को जमकर लताड़ने का सिलसिला जारी हो तो बेहतर है कुछ अच्छे सियासतदानों की अच्छी बातें याद कर ली जाएं। वैसे भी इन दिनों देश के उत्तरी राज्यों में साहित्य धीरे-धीरे हाशिए पर सरकता जा रहा है। नए राजनेता इसे वोट-बैंक के लिए विशेष लाभप्रद नहीं मानते। पहली बात वर्ष 1977-78 की है। उन दिनों देश में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार थी। अटल बिहारी वाजपेयी तब विदेश मंत्री थे। वह पाकिस्तान के आधिकारिक दौरे पर गए।…

जब आसपास के माहौल में ज़हर की बारिश हो रही हो, तेज़ाबी भाषा में भाषण पिलाए जा रहे हों और अपने ही देश में एक-दूसरे को जमकर लताड़ने का सिलसिला जारी हो तो बेहतर है कुछ अच्छे सियासतदानों की अच्छी बातें याद कर ली जाएं। वैसे भी इन दिनों देश के उत्तरी राज्यों में साहित्य धीरे-धीरे हाशिए पर सरकता जा रहा है। नए राजनेता इसे वोट-बैंक के लिए विशेष लाभप्रद नहीं मानते।
पहली बात वर्ष 1977-78 की है। उन दिनों देश में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार थी। अटल बिहारी वाजपेयी तब विदेश मंत्री थे। वह पाकिस्तान के आधिकारिक दौरे पर गए। विदेश मंत्री का अलग प्रोटोकॉल होता है। आना-जाना, मिलना-जुलना सब पहले से तय होता है। अटल बिहारी वाजपेयी के लिए भी प्रोटोकॉल था। उन्हें उसी का पालन करना था, लेकिन वह नहीं माने। उन्हें उर्दू शायर फैज से मिलना था। वो प्रोटोकाल तोड़कर फैज से मिलने उनके घर गए। फैज अहमद फैज तब एशियाई-अफ्रीकी लेखक संघ के अध्यक्ष थे। बेरुत (लेबनान) में कार्यरत थे। वह उन दिनों संयोगवश पाकिस्तान आए हुए थे। सब चकित रह गए। जब दोनों (फैज और अटल) दो अलग-अलग तरह से सोचने वाले, फिर भी मिले। अटल बिहारी वाजपेयी ने मिलते ही कहा, ‘मैं सिर्फ एक शेर के लिए आपसे मिलना चाहता था। फैज ने शेर पढऩे को कहा। अटल बिहारी वाजपेयी ने फैज की एक मशहूर गज़ल का शेर पढ़ा-
मकाम ‘फैज’ कोई राह में जंचा ही नहीं,
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले
(कू-ए-यार : यार की गली सू-ए-यार : सूली की तरफ)
यह सुनकर फैज भावुक हो गए। उन्होंने अटल जी को पूरी गज़ल सुनाई। दोनों काफी देर साथ रहे और फिर अटल बिहारी वाजपेयी उन्हें भारत आने का न्यौता देकर लौट आए। फैज उसके बाद 1981 में भारत आए और दिल्ली में अटल जी से उनके आग्रह पर मिले भी। अटल बिहारी वाजपेयी ने जिस गज़ल के एक शेर के लिए प्रोटोकॉल तोड़ दिया था, वो गज़ल थी :-
गुलों में रंग भरे, बाद-ए-नौ-बहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले
कफस उदास है यारो, सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-खुदा आज जि़क्र-ए-यार चले
बड़ा है दर्द का रिश्ता, ये दिल गरीब सही
तुम्हारे नाम पे आएंगे गमगुसार चले
मकाम ‘फैज’ कोई राह में जंचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले
यह गज़ल फैज ने जनवरी 1954 में लिखी थी। तब वह पाकिस्तान के मांटुगुमरी (अब साहीवाल) जेल में थे। वह 1951 से 1955 तक पाकिस्तान की जेल में कैद में रहे। जब वह जेल में थे तो आरोपों के आधार पर यह माना जा रहा था कि उन्हें फांसी की सजा होगी, पर जुर्म साबित न हो सका। खैर, फैज भारत और पाकिस्तान, दोनों मुल्कों के लोगों के पसंदीदा शायर थे, सो यहां भी कई शहरों और विश्वविद्यालयों में उनका काव्य पाठ आयोजित था। एक कार्यक्रम जेएनयू में भी था। प्रोग्राम के दौरान वहां उनसे प्रसिद्ध नज़्म ‘रकीब’ पढ़ने को कहा गया, वो आधी नज़्म पढ़कर बैठ गए। छात्रों ने पूछा कि आधी नज़्म ही क्यूं सुनाई तो फैज ने जवाब दिया-
‘जहां तक सुनाया वहीं तक असली नज़्म है बाकी का हिस्सा तो अति प्रगतिशीलता की नारेबाज़ी है। फैज बेहद बेबाक थे और अटल जी के बेहद करीबी थी। उनकी एक और नज़्म ‘हम देखेंगे’, भी अटल जी को बेहद पसंद थी। उम्रभर पाकिस्तान की सैनिक हुकूमत का विरोध करते रहे। उनकी जि़ंदगी के लगभग 5-6 बरस पाकिस्तानी सेना की जेल में कटे थे। अटल जी कुछ अलग किस्म से इंसान थे। उनसे कुछ सीखने के लिए भी व्यापक सोच चाहिए।
अब ज़रा 9 फरवरी, 1999 की तारीख पर भी नज़र डाल लें। अटल जी पड़ौसी देश से संबंधों की बेहतरी के लिए दोस्ती की एक बस लेकर पाकिस्तान गए थे। उस बस में अपने साथ वह देवानंद, क्रिकेटर कपिल देव, नृत्यांगना मल्लिका साराभाई, शायर जावेद अख्तर, अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा, पत्रकार कुलदीप नैयर आदि प्रबुद्ध लोग भी साथ ले गए थे। तब वाजपेयी ने सीमा पार करते ही एक नज़्म पढ़ी थी-
हम जंग नहीं होने देंगे
तीन बार लड़ चुके लड़ाई
कितना महंगा सौदा भाई
सीमा पार करते ही स्वागत करने वालों में तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ व अनेक अदीब व पत्रकार मौजूद थे। तय यही था कि अटल जी वहीं से लौट आएंगे। मगर नवाज़ शरीफ का आग्रह था, ‘दर तक आए हो/घर नहीं आओगे?’ अटल जी टाल नहीं सके। लाहौर तक गए। वहां पर लाहौर के किले में स्वागत समारोह था। इस समारोह की संयोजक व मंच संचालक ‘फैज की बेटी ही सलीमा हाशमी थी।’
पाकिस्तान से दोस्ती की यह पहलकदमी अच्छी नहीं रही थी। बाद में कारगिल युद्ध भी लड़ना पड़ा। मगर जब भूगोल बदले नहीं जा सकते तो सुखद प्रयास छोड़ भी दिए जाते हैं। नफरत, हिकारत और विष-वर्षा का आज का मौसम स्थायी भी तो नहीं रखा जा सकता। अब जिस तरह की भाषा अपने ही देश के लोग अपने ही लोगों के ‘िखलाफ प्रयोग करते हैं, वह कब तक जारी रखी जा सकेगी, सवाल यही है।
अच्छी पहलकदमी में हर बार सफलता नहीं मिलती, मगर सोच अच्छी हो तो ‘पोखरन’ की तैयारी भी चलती है और ‘सदा-ए-सरहद’ सरीखी बसें भी। यह अलग बात है कि पाकिस्तान के सत्ताधीश आज भी विश्वास के काबिल नहीं हैं। इसी मामले में थोड़ा जि़क्र एनडीटीवी उद्घोषक कमाल खान का। बनारस में गंगा आरती मकर संक्रांति के अवसर पर उसी के नाम पर समर्पित की गई। यही है हमारा असली भारत।

Dr. Chander Trikha