‘जाने रिश्तों में कौन सा कोहरा छोड़ आए हैं, नंगी धूप में चले पांवों में छाले लेकर
इतनी दूर चले हम भी, चले तुम भी, पर जाने क्यों यूं राहों को अधूरा छोड़ आए हैं’
आखिरकार इतनी लंबी जद्दोजहद सियासी उठापटक के बाद डीके शिवकुमार कर्नाटक के मुख्यमंत्री की गद्दी पाने में कामयाब रहे। उन्हें बेंगलुरू की इस गद्दी पर काबिज करवाने में परोक्ष रूप से राहुल गांधी और पर्दे के पीछे से सोनिया व प्रियंका गांधी की एक महती भूमिका रही। जब इस दफे 2023 के विधानसभा चुनाव में धूमधड़ाके के साथ कर्नाटक में कांग्रेस की वापसी हुई तो कांग्रेस हाईकमान ने सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच सत्ता के समान बंटवारे का फार्मूला निकाला था, जिसके तहत सिद्धारमैया व डीके दोनों को ढाई-ढाई साल के टर्म के लिए प्रदेश का मुख्यमंत्री बनना था, बतौर सीनियर पहला मौका कांग्रेस के ओबीसी नेता सिद्धारमैया को मिला। जिनके ढाई साल का कार्यकाल 2025 के नवंबर में ही खत्म हो गया था, पर वे तब से ही डीके के पक्ष में गद्दी छोड़ने से आनाकानी कर रहे थे, जब उनके ऊपर दिल्ली ने दबाव बनाना शुरू किया तो उन्होंने अपने विकल्प के तौर पर तीन नाम सुझाए, इनमें पहला नाम डॉ. जी परमेश्वरा का था जो एक दलित समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, सिद्धारमैया की दूसरी पसंद एमबी पाटिल थे, जो येिदयूरप्पा के बाद प्रदेश के एक बड़े लिंगायत नेता में शुमार होते हैं। सिद्धारमैया की तीसरी और आखिरी पसंद थे सतीश जारकीहोली, ये वाल्मीकि नायका समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, पर सिद्धारमैया की सुझाई लिस्ट में कहीं भी डीके का नाम नहीं था।
सूत्रों की मानें तो डीके को गद्दी पर काबिज करवाने में गांधी परिवार की सबसे अहम भूमिका रही। समझा जाता है कि इससे पहले डीके की सोनिया गांधी से कई दौर की बातचीत पहले हो चुकी थी। इस बार कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन की आहटों के बीच मां सोनिया के कहने पर राहुल ने सिद्धारमैया व डीके को सीधे दिल्ली तलब किया, उनसे वन-टू-वन बात की, यहां तक कि जिस मीटिंग में राहुल ने सिद्धारमैया से दो टूक डीके के लिए गद्दी छोड़ने को कहा उस मीटिंग में राहुल-डीके व सिद्धारमैया बस यही तीन लोग मौजूद थे। केसी वेणुगोपाल व अजय माकन से पहले ही राहुल ने वहां से चले जाने को कहा था। लिहाजा अब तो तय हो ही गया है कि कर्नाटक के 25वें सीएम के तौर पर डीके अपने साथी 10 मंत्रियों के साथ 3 जून को शपथ ले सकते हैं, उनके मंत्रिमंडल का अगला विस्तार 18 जून को संपन्न होने वाले राज्यसभा चुनावों के बाद हो सकता है।
सिद्धारमैया ने अभी हथियार नहीं डाले हैं
कांग्रेस हाईकमान के दबाव में भले ही इस गुरुवार को कर्नाटक के कद्दावर ओबीसी नेता सिद्धारमैया ने अपने मुख्यमंत्री की कुर्सी को अलविदा कह दिया हो, पर अभी वे दिल्ली से अपने इस त्याग का प्रतिदान चाहते हैं।
सूत्रों की मानें तो अभी-अभी जब सिद्धारमैया दिल्ली पहुंचे तो उन्होंने राहुल गांधी से मुलाकात कर अपनी मांगों की एक विस्तृत सूची उनके हवाले की है। सूत्र बताते हैं कि सिद्धारमैया की सबसे बड़ी चिंता अपने पुत्र यतीन्द्र सिद्धारमैया को लेकर है, वे चाहते हैं कि डीके कैबिनेट में यतीन्द्र को कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिले, मुमकिन हो तो उन्हें डिप्टी सीएम बनाया जाए। इसके अलावा उन्होंने आने वाले राज्यसभा व विधान परिषद में होने वाली नियुक्तियों के लिए अपने पसंदीदा नेताओं के नाम सुझाए हैं, इसके अलावा डीके के मंत्रिपरिषद में विभागों के बंटवारे के लिए भी बतौर मंत्री उन्होंने अपने करीबी नेताओं के नाम सुझाए हैं। सीधे तौर पर सिद्धारमैया ने अपने करीबी नेताओं के लिए अहम मंत्रालयों के लिए पैरवी की है। सिद्धारमैया इस बार जब दिल्ली आए तो अपने एमएलसी पुत्र यतीन्द्र को वे साथ-साथ लेकर घूमे। उन्होंने अपने पुत्र को राहुल गांधी से मिलवाया। फिर वे कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे व कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल से मिलने पहुंचे।
जम्मू-कश्मीर के नाराज़ कांग्रेसी नेता दिल्ली आएंगे
अभी-अभी तो बकरीद की खुशियां ताजा-ताजा माहौल में लिपटी थीं कि जम्मू-कश्मीर के नाराज़ कांग्रेस नेताओं का एक बड़ा वर्ग ‘दिल्ली चलो’ के आह्वान के लिए कमर कसने लगा है। ये नेता प्रदेश कांग्रेस कमेटी पर भाजपा-पीडीपी के स्लीपर सेल के कब्जे का आरोप लगा रहे हैं और अपने शीर्ष नेताओं से जानना चाह रहे हैं कि ‘मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने राज्य में अपने सहयोगी दल कांग्रेस को पूरी तरह नज़रअंदाज क्यों किया हुआ है? और अब्दुल्ला की इस हरकत पर प्रदेश के शीर्ष कांग्रेसी नेता खामोश क्यों हैं?’
राहुल गांधी की निजी पसंद में शुमार होने वाले यहां के प्रदेश कांग्रेस प्रमुख तारिक हामिद कर्रा अपने दो वर्षों का कार्यकाल एक गुमनामी में पूरा कर चुके हैं, जम्मू-कश्मीर के एआईसीसी प्रभारी सैय्यद नासिर हुसैन, जो खड़गे की निजी पसंद के तौर पर उभरे हैं, वे भी एक तरह से प्रदेश कांग्रेस के नेताओं व कार्यकर्ताओं के लिए अछूत बने हुए हैं। सो, यहां पार्टी के अंदर गुटबाजी ने पूरी तरह सिर उठा लिया है। अब जबकि दिल्ली अपने प्रदेश के इन नेताओं की आवाजों पर कान नहीं धर रही है तो पीसीसी के वरिष्ठ नेताओं का एक बड़ा वर्ग सार्वजनिक रैलियां निकाल खुलेआम कर्रा व हुसैन दोनों को निशाने पर ले रहा है। सीडब्ल्यूसी सदस्य और पूर्व पीसीसी प्रमुख विकार रसूल वानी इस असंतुष्ट मोर्चे का सामने से नेतृत्व कर रहे हैं। सनद रहे कि रसूल वानी को पिछले विधानसभा चुनावों के बीच बिना किसी जरूरी औपचारिकता के हटा दिया गया था ताकि उनकी जगह राहुल गांधी कर्रा को ला सकें।
एक अनार और सौ बीमार
राज्यसभा की रिक्त 26 सीटों के लिए 18 जून को चुनाव आहूत है। 3 सीटें मध्य प्रदेश से भी खाली हो रही हैं जिसमें से 2 भाजपा की और एक सीट कांग्रेस के पाले में जा सकती है। कांग्रेस की यह सीट वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह की रिक्त हो रही है। वे दो बार से राज्यसभा में हैं, इस बार उन्होंने अपनी दावेदारी छोड़ दी है। सूत्रों की मानें तो दिग्विजय चाहते हैं कि ‘आलाकमान उनकी जगह इस बार उनकी पत्रकार पत्नी को इस सीट से उपकृत कर दे।’
वहीं प्रदेश के एक और कद्दावर कांग्रेसी नेता कमलनाथ भी इस सीट पर अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं, कमलनाथ का कहना है कि ‘अगर मुझे नहीं भेजना चाहते तो मेरे पुत्र नकुलनाथ को इस सीट से ऊपरी सदन में भेज दिया जाए।’ पर पार्टी में कमलनाथ व नकुलनाथ दोनों का पुरकश विरोध है। नकुलनाथ के बारे में पार्टी के कुछ नेता खुल कर कह रहे हैं कि ‘वे 2024 में भाजपा के सीधे संपर्क में थे और उनकी भाजपा में शामिल होने की चर्चाएं भी तब बेहद आम थी।’ पार्टी के कुछ नेताओं का मत है कि ‘इस सीट से किसी दलित नेता को ऊपरी सदन में भेजा जाना चाहिए।’ वहीं इस सीट के लिए जीतू पटवारी, अरुण यादव और मीनाक्षी नटराजन के नामों की भी चर्चा है। मीनाक्षी मंदसौर से 2009-14 के काल में लोकसभा सांसद भी रह चुकी हैं, फिलहाल वह तेलांगना की प्रदेश प्रभारी भी हैं। इन्हें राहुल गांधी की निजी पसंद के तौर पर देखा जाता है।
पंजाब में भगवा आगाज़
बंगाल फतह के बाद अब भाजपा का सारा फोकस पंजाब पर सिमट आया है, यहां भी अगले ही साल विधानसभा चुनाव होने हैं। पंजाब भाजपा के पहले सिख प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर केवल सिंह ढिल्लों की निुयक्ति के मात्र एक दिन बाद आए यहां के स्थानीय निकाय चुनाव नतीजों ने भाजपा कैडर को एक नई संजीवनी देने के काम किया है। इन चुनाव परिणामों ने संकेत दिया है कि ‘राज्य के शहरी और अर्द्ध शहरी क्षेत्रों में निरंतर भाजपा का प्रभाव बढ़ रहा है। वर्ष 2021 में जहां भाजपा केवल 49 वार्ड जीत पाई थी, इस बार पार्टी की जीत का आंकड़ा 170 से ज्यादा वार्डों को भी पार कर गया। हालांकि इसके बावजूद कुल वार्डों के लिहाज से भाजपा आप, कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल व निर्दलीय के बाद पांचवें स्थान पर रही, पर यह प्रदर्शन भी कहीं न कहीं पार्टी के बढ़ते हुए जनाधार की ओर ही इशारा कर रहा है।
दरअसल, इस बार यहां भाजपा की सफलता केवल पारंपरिक हिंदू बहुल शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि मोहाली, होशियारपुर, फतेहगढ़ साहिब, मानसा, पटियाला और फाजिल्का जैसे जिलों की नगर परिषदों और नगर पंचायतों में भी पार्टी ने अपनी मजबूत उपस्थिति का अहसास दर्ज कराया है।


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