मनमोहन सिंह की याद में !

Summary :

पूरे देश की राजनीति में संसद से लेकर सड़क तक विभिन्न आर्थिक व सामाजिक मुद्दों को लेकर जब एक ओर कोहराम मचा हुआ है तो दूसरी तरफ से ऐसी खबर आयी है जिससे अशान्त चित्त को थोड़ी राहत की सांस मिलती है। यह खबर है कि आगामी 26 फरवरी को स्वर्गीय प्रधानमन्त्री डाॅ. मनमोहन सिंह की याद में आयोजित प्रथम व्याख्यानमाला में जर्मनी की पूर्व चांसलर श्रीमती एंजेला मर्केल भाषण देंगी और मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान भारत-जर्मनी सम्बन्धों पर प्रकाश डालेंगी। डाॅ. मनमोहन सिंह को देश की जनता बहुत कम बोलने वाले प्रधानमन्त्रियों में से एक के रूप…

पूरे देश की राजनीति में संसद से लेकर सड़क तक विभिन्न आर्थिक व सामाजिक मुद्दों को लेकर जब एक ओर कोहराम मचा हुआ है तो दूसरी तरफ से ऐसी खबर आयी है जिससे अशान्त चित्त को थोड़ी राहत की सांस मिलती है। यह खबर है कि आगामी 26 फरवरी को स्वर्गीय प्रधानमन्त्री डाॅ. मनमोहन सिंह की याद में आयोजित प्रथम व्याख्यानमाला में जर्मनी की पूर्व चांसलर श्रीमती एंजेला मर्केल भाषण देंगी और मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान भारत-जर्मनी सम्बन्धों पर प्रकाश डालेंगी।

डाॅ. मनमोहन सिंह को देश की जनता बहुत कम बोलने वाले प्रधानमन्त्रियों में से एक के रूप में देखती है मगर उन्हें भारत की अर्थव्यवस्था को आमूलचूल रूप से बदलने वाला प्रधानमन्त्री भी मानती है। दरअसल मनमोहन सिंह ने 1991 से जो आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू किया था और भारत के बाजारों को विदेशी कम्पनियों के लिए खोला था उसी का परिणाम है कि आज हम बाजारमूलक अर्थव्यवस्था में जी रहे हैं और इससे भारत की राजनीति भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी है।

वास्तव में मनमोहन सिंह ने जब 1991 में देश का वित्त मन्त्री रहते भारत के बाजारों को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए खोला था तो इसके लाभ व खतरे भी एक समानरूप से थे क्योंकि उस समय भारत ने नेहरू-इन्दिरा गांधी की समाजवादी अर्थव्यवस्था के सिद्धान्तों को अलविदा कह दिया था और 1951 में स्थापित भारतीय जनसंघ के आर्थिक सिद्धान्त पर अमल करना शुरू किया था। आजादी के बाद पं. नेहरू के नेतृत्व में भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया था जिसमें निजी क्षेत्र व राज्य की भागीदारी इस प्रकार स्थापित की गई थी कि समाज व देश का विकास राष्ट्रीय विकास स्रोतों पर राज्य के मालिकाना हकूकों को ऊंचे रखकर हो सके।

जबकि जनसंघ के संस्थापक डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी मानते थे कि व्यापार व कारोबार से सरकार को अलग रहते हुए यह कार्य निजी क्षेत्र पर छोड़ना चाहिए और भारत को अपना समग्र विकास बाजार की शक्तियों को साधते हुए करना चाहिए। मनमोहन सिंह ने वास्तव में यही रास्ता अपनाया था जिसके कारण भारत में प्रत्यक्ष व परोक्ष विदेशी निवेश की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो गई थी। मनमोहन सिंह ने इस काम को बहुत सिलसिलेवार ढंग से किया और सुनिश्चित किया कि भारत अपने आधारभूत विकास के ढांचे में निजी क्षेत्र को अधिकाधिक स्थान दे। उनके शासनकाल में पूंजी की महत्ता बढ़ी और विकास का वह माॅडल तैयार हुआ जिसने वित्तीय क्षेत्र से लेकर बुनियादी क्षेत्र तक में निजीकरण को बढ़ावा दिया।

इसका परिणाम यह हुआ कि भारत पारंपरिक रूप से बचत की अर्थव्यवस्था के बजाय खर्च की अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर होने लगा जिसमें नये उपभोक्तावाद का उदय होना निश्चित था। उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था को नवोदित आर्थिक भूमंडलीकरण से जोड़ा जिससे भारत अन्तर्राष्ट्रीय जगत में एक बहुत बड़ा बाजार बनकर उभरा। व्यापार व कारोबार के क्षेत्र में अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिबन्ध विश्व व्यापार संगठन के छाते तले टूटने लगे और अधिकाधिक देश एक -दूसरे के यहां उपलब्ध आवश्यक आय स्रोतों का लाभ उठाने लगे। मगर इसका असर राजनीति पर पड़े बगैर नहीं रह सकता था। खासकर लोकतान्त्रिक देशों में चुनावों के माध्यम से बनने वाली सरकारों के गठन में पूंजी का महत्व बढ़ने लगा।

इस पूंजी को प्रभावित करने के लिए विदेशी कम्पनियों की भूमिका भी धीरे-धीरे बढ़ती रही और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न देशों के बीच व्यापार भी बढ़ता रहा। बाजार की शक्तियां श्रम का मूल्य निर्धारण करने लगीं मगर इसके असर से भारत जैसे देशों में औद्योगीकरण तेज हुआ, बदलती बाजार जरूरतों के अनुसार इसमें नवाचार भी हुआ। बाजार की शक्तियों ने प्रति व्यक्ति उत्पादकता बढ़ाने का कार्य भी प्रत्यक्ष रूप से निजी क्षेत्र में बढ़ती प्रतियोगिता की वजह से किया। मगर इस आर्थिक उदारीकरण से भारत की विदेश नीति भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती थी।

अतः मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान ही भारत पर अमेरिका की तरफ से यह दबाव बनने लगा था कि वह ईरान से पेट्रोलियम तेल न खरीदे। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर राष्ट्रसंघ में भारत को कई बार ऐसा रुख अख्तियार करना पड़ा जिनसे दोनों देशों के बीच के ऐतिहासिक-सांस्कृतिक सम्बन्धों पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता था लेकिन मनमोहन सिंह ने 1990 में ही सोवियत संघ के बिखर जाने के बाद रक्षा से लेकर उच्च टैक्नोलॉजी के क्षेत्र तक में भारत की वरीयता तय करने की गरज से अमेरिका से 2008 में परमाणु समझौता किया और बिना परमाणु अप्रसार सन्धि पर हस्ताक्षर किये ही भारत को विश्व को छठी वैध परमाणु शक्ति बनाया तथा अद्यतन टैक्नोलॉजी के क्षेत्र में भारत के आगे बढ़ने का रास्ता खोला।

यदि हम गौर से 2008 के वर्ष की राजनीति पर ध्यान दें तो उस समय भी संसद से लेकर सड़क तक परमाणु करार को लेकर कोहराम मचा हुआ था और इस मुद्दे पर मनमोहन सरकार तक खतरे में आ गई थी। उनकी सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे वामपंथी दलों ने अपना हाथ खींच लिया था। यह परमाणु करार कोई सामान्य आपसी समझौता नहीं था क्योंकि इसे करने के लिए अमेरिका को भी अपने संविधान में संशोधन करना था। डाॅ. मनमोहन सिंह ने इस समझौते की बागडोर तब अपने विदेशमन्त्री भारत रत्न स्व. प्रणव मुखर्जी को पकड़ा दी थी।

तब प्रणव दा अमेरिका जाकर ही तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश से मिलकर साफ कर आये थे कि भारत समझौते पर तब तक हस्ताक्षर नहीं कर सकता जब तक कि इसकी संसद उसे इजाजत न दे दे। संसद में लोकसभा में मनमोहन सरकार वामपंथियों के समर्थन वापस लेने से अपना बहुमत लगभग खो चुकी थी मगर मनमोहन सिंह को विश्वास था कि ऐतिहासिक परमाणु करार के राष्ट्रहित में होने की वजह लोकसभा में उनकी सरकार को विश्वास मत मिल जायेगा जिसकी वजह से जुलाई 2008 में उन्होंने लोकसभा का दो दिवसीय विशेष सत्र बुलाया और अपनी सरकार के प्रति विश्वास मत रखा।

अतः डाॅ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल का यह दौर बहुत राजनीतिक उथल-पुथल वाला रहा। आज देश में भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर ऐसा ही माहौल नजर आ रहा है क्योंकि विपक्ष इस समझौते की भारी आलोचना कर रहा है। जबकि अभी इस समझौते का विस्तृत ब्यौरा बन ही रहा है। सौभाग्य से संसद बजट सत्र चालू है केवल इसका प्रथम चरण ही आज समाप्त हुआ है। मार्च महीने में दूसरा चरण फिर से शुरू होगा। अतः हमें अपने ऊपर पूरा भरोसा होना चाहिए कि हम जो कुछ भी करेंगे वह भारत की आने वाली पीढि़यों के भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए ही करेंगे।

Aditya Chopra

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