चीन के वाटर बम से कैसे निपटेगा भारत ?

Summary :

नेपाल में आई आपदा में जान गंवाने वालों और तबाह हुए परिवारों के प्रति मैं गहरी संवेदना व्यक्त करता हूं। मन व्यथित है, दिल रो रहा है, इस आपदा के दुष्परिणामों से निपटने में न जाने कितना वक्त लग जाएगा। अब तक ठीक से पता ही नहीं कि तिब्बत के ऊंचे पहाड़ों के बीच क्या हुआ कि नेपाल का एक पूरा इलाका तबाह हो गया। कहा जा रहा है कि ग्लेशियर टूटे, ग्लेशियर से बनी झील में बेहिसाब पानी आ गया। प्राकृतिक बांध टूट गए और नेपाल में तबाही आ गई। एक सूचना यह भी आई कि वहां भूकंप के…

नेपाल में आई आपदा में जान गंवाने वालों और तबाह हुए परिवारों के प्रति मैं गहरी संवेदना व्यक्त करता हूं। मन व्यथित है, दिल रो रहा है, इस आपदा के दुष्परिणामों से निपटने में न जाने कितना वक्त लग जाएगा। अब तक ठीक से पता ही नहीं कि तिब्बत के ऊंचे पहाड़ों के बीच क्या हुआ कि नेपाल का एक पूरा इलाका तबाह हो गया। कहा जा रहा है कि ग्लेशियर टूटे, ग्लेशियर से बनी झील में बेहिसाब पानी आ गया। प्राकृतिक बांध टूट गए और नेपाल में तबाही आ गई।

एक सूचना यह भी आई कि वहां भूकंप के झटके आए जिससे झील के बांध टूट गए, मगर अमेरिकी जियोलॉजिकल सर्वे ने साफ कहा है कि नेपाल में फ्लैश फ्लड से पहले तिब्बत के उस इलाके में भूकंप का संकेत नहीं मिला है यानी भूकंप नहीं आया, तो फिर क्या केवल ग्लेशियर टूटने से यह सब हुआ? मगर सबसे गंभीर सवाल यह है कि जो भी प्राकृतिक घटनाएं हुईं वो चीन के कब्जे वाले तिब्बत में हुईं। चीन तकनीकी रूप से बेहद सक्षम देश है। उसे पता है कि हिमालय के इस अत्यंत दुर्गम इलाके में हमेशा ही प्राकृतिक उथल-पुथल चलती रहती है।

निश्चित रूप से उस पूरे इलाके पर उसकी आकाशीय नजर होगी, जब कोई प्राकृतिक झील टूटने वाली होती है तो इसके संकेत पहले मिलने शुरू हो जाते हैं। उम्मीद यही की जाती है कि चीन को भी संकेत जरूर मिले होंगे लेकिन इस संबंध में नेपाल को कोई जानकारी नहीं दी गई, यही वो बिंदु है जिसने चीन की नीयत पर सवाल खड़ा किया कि उसने नेपाल को आपदा की आशंका से परिचित क्यों नहीं कराया? हालांकि जब सवाल उठे तो चीन ने इसका खंडन कर दिया कि यह बात सही नहीं है, मगर चीन ने यह नहीं बताया कि उसके सैटेलाइट ने कुछ नोट किया था या नहीं?

नेपाल खुल कर नहीं बोल रहा है लेकिन अधिकारियों ने यह जरूर कहा है कि यदि आपदा का स्रोत नेपाल में होता तो वे नजर रख रहे होते। आपदा का स्रोत तिब्बत में था इसलिए तबाही आने से पहले उन्हें कुछ भी पता नहीं चल पाया। इस पूरे घटनाक्रम के संदर्भ में मुझे एक चिंता सताने लगी है कि यदि कभी तिब्बत के मे-डोंग में बन रहा दुनिया का सबसे बड़ा बांध टूट गया तो क्या होगा? पिछले साल जब डैम निर्माण की बात सामने आई थी तब भी मैंने इस विषय पर लिखा था। अब फिर वही सवाल मौजूं हो गया है। भारतीय सीमा से इस डैम की दूरी महज तीस से चालीस किलोमीटर है। डैम उसी नदी पर है जिसे हम भारत में ब्रह्मपुत्र कहते हैं।

चीन ने अभी तक यह नहीं बताया कि इसमें कितना पानी जमा रहेगा, मगर विशेषज्ञों का मानना है कि वहां हर समय कई करोड़ क्यूसेक पानी जमा रहेगा। मान लीजिए कि कभी यह डैम फूट गया तो फिर क्या होगा? यदि कभी चीन ने जानबूझ कर भारतीय क्षेत्र में पानी छोड़ दिया तो क्या होगा? मगर हम भारत के लोग इतने सात्विक हैं कि इस तरह की आशंका को तवज्जो नहीं देंगे। हमारी आशंका प्राकृतिक कारणों को लेकर है। यह डैम अत्यंत संवेदनशील हिमालयी इलाके में है, वहां भूगर्भीय हलचल होती रहती है। जनवरी 2025 में ही यहां 7.1 रिक्टर स्केल का भूकंप आया था, ऐसे किसी भूकंप के झटके से करोड़ों क्यूसेक पानी ने बांध तोड़ दिया तो जो तबाही होगी वह न केवल अरुणाचल प्रदेश बल्कि असम समेत पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों और बांग्लादेश तक को तोड़कर रख देगी।

बांग्लादेश ने भी इस प्रोजैक्ट को लेकर चीन के सामने चिंता जताई है और बीजिंग को पत्र भेजकर बांध के बारे में और जानकारी मांगी मगर चीन तो चुप्पी का बादशाह है। यह डैम जहां बन रहा है, वहां आगे बढ़ते हुए जब नदी भारत में प्रवेश करती है तो हजारों फुट नीचे गिरती है। सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि चीन ने अभी तक इस डैम के आंकड़ों को गोपनीय रखा है। दुनिया के किसी देश को पता नहीं है कि डैम का डिजाइन क्या है, इससे भारत और बांग्लादेश किस तरह से प्रभावित होने वाले हैं। इसलिए चिंता होती है।

चिंता इस बात की भी होती है कि नदियों के बहाव या उससे उत्पन्न होने वाली आशंकाओं को लेकर रियल टाइम इन्फॉर्मेशन शेयर करने की कोई संधि चीन और भारत के बीच में नहीं है। चीन हमें जानकारी नहीं देगा, मगर एक सुकून भरी खबर यह है कि चीन की ओर से आने वाले पानी को संभालने के लिए भारत अरुणाचल प्रदेश में 11 हजार मेगावाट की क्षमता वाला अपर सियांग प्रोजैक्ट बना रहा है। मगर दूसरी चिंता यह भी है कि चीन ने यदि पानी रोक दिया तो? चीन कुछ भी कर सकता है! भारत को पूरी तरह से सतर्क रहना होगा।

मेरा यह मानना है कि हम जिस दुनिया में रह रहे हैं वहां मैत्री के अलावा कोई विकल्प नहीं हो सकता, कोई देश कितना भी शक्तिशाली हो, किसी छोटे देश को भी नहीं दबा सकता, अमेरिका-ईरान युद्ध के मामले में हम यह देख रहे हैं। चीन ने खुद को बहुत शक्तिशाली बना लिया, दुनिया को खुद पर आश्रित कर लिया, सैकड़ों चीजें ऐसी हैं, जो हमें चीन से न मिलें तो कारोबार ठप्प हो जाए। वह कभी अरुणाचल में तो कभी डोकलाम में या कभी लद्दाख में हमें उलझाने की हरकतें करता रहता है, मगर केवल चीन को कोसने से कुछ नहीं होगा, हमें अपने युवा ज्ञान का भरपूर उपयोग करते हुए खुद को इतना सक्षम बनाना होगा कि कोई हमारा बाल भी बांका न कर पाए।

जयशंकर की रूस यात्रा और डोभाल चीन पहुंचे क्या यह महज संयोग है कि पिछले सप्ताह विदेश मंत्री एस. जयशंकर दो दिनों की यात्रा पर रूस में थे तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल दो दिन के लिए चीन जा पहुंचे? दोनों की यात्राओं में कई अलग-अलग कार्यक्रम थे लेकिन वास्तव में दोनों की यात्राओं का मकसद 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन है। जयशंकर ने सीधे पुतिन से मुलाकात की है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक निजी संदेश भी उन्हें सौंपा।

कूटनीतिक हलकों में यह तय माना जा रहा है कि ब्रिक्स सम्मेलन के लिए पुतिन नई दिल्ली आ सकते हैं। इस बात की भी पूरी उम्मीद है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी आएं। पिछली बार शी जिनपिंग अक्तूबर 2019 में भारत आए थे। आपको याद होगा कि पिछले साल सितंबर में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में चीन के तियानजिन शहर से आई नरेंद्र मोदी, पुतिन और शी जिनपिंग की तस्वीर के कारण अमेरिका के सीने पर सांप लोट गया था। क्या नई दिल्ली से भी ऐसी ही कोई तस्वीर निकलेगी और कलेजे पर सांप फिर लोटेगा? उम्मीद तो यही की जानी चाहिए।

विजय दर्डा