युद्ध हमेशा खतरनाक होते हैं लेकिन पश्चिम एशिया में चल रहा युद्ध और भी खतरनाक मोड़ ले चुका है। स्थिति नियंत्रण से बाहर हो चुकी है। युद्ध का प्रभाव वैश्विक है। युद्ध के प्रभाव से कोई देश अछूता नहीं है। युद्ध हो या आपदा इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत हमेशा मजबूती से खड़ा रह है। मोदी सरकार ने हर संकट के समय सजग नेतृत्व का परिचय दिया है। इतिहास गवाह है कि जब-जब संकट आया भारत ने उसका सामना करते हुए सामूहिक शक्ति प्राप्त की। कोरोना काल में हमने देखा कि मोदी सरकार ने बहुत ही संयम से एक बड़े संकट को नियंत्रित करने में सफलता प्राप्त की।
पश्चिम में अब जब तनाव पैदा हुआ तो मोदी सरकार ने एयर लिफ्ट अभियान चला कर हजारों भारतीयों को सुरक्षित निकालने में सफलता प्राप्त की। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी हजारों भारतीय छात्र यूक्रेन से सुरक्षित भारत लाए गए। अमेरिका-इजराइल और ईरान युद्ध को लेकर सरकार सतर्क और संवेदनशील है। अमेरिका-इजराइल और ईरान का युद्ध अब चौथे हफ्ते में प्रवेश कर गया है। गैस और ऊर्जा संकट के साथ-साथ कृषि, वस्त्र, होटल, रेस्तरां, एयरलाइंस और उद्योग धंधे प्रभावित होने लगे हैं। कच्चे तेल और गैस की कीमतें बढ़ने लगी हैं। कच्चे तेल में 10 डालर की बढ़ौतरी भारत में थोक महंगाई को लगभग 0.9 प्रतिशत तक बढ़ा सकती है। डालर के मुकाबले रुपए की घटती कीमत से भारत का तेल आयात बिल बढ़ रहा है।
विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव रोजाना बढ़ रहा है। तनाव के कारण भारत की 800 कम्पनियों के अरबों डालर के निवेश पर खतरा मंडरा चुका है। विशेषज्ञों के अनुसार, इन कंपनियों का निवेश मुख्य रूप से ऊर्जा, ऑयल-गैस, रियल एस्टेट और बड़े उद्योग क्षेत्रों में है। खाड़ी क्षेत्र और मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के कारण अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय लेन-देन प्रभावित हो रहे हैं। इससे भारत की कंपनियों को आपूर्ति श्रृंखला, विदेशी निवेश और परियोजनाओं में देरी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। कुछ बड़े कॉर्पोरेट हाउसों ने पहले ही अपनी निवेश योजनाओं को रोक दिया है, जबकि अन्य कंपनियां अपने संचालन में सतर्कता बरत रही हैं। अरबों डॉलर के निवेश को खतरे में देखकर निवेशक भी चिंता में हैं और बाजार में अस्थिरता बनी हुई है।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यदि युद्ध और तनाव लंबे समय तक जारी रहता है तो भारत की औद्योगिक उत्पादन क्षमता और निवेश पर गंभीर असर पड़ सकता है। साथ ही यह घरेलू शेयर बाजार, मुद्रा दर और विदेशी निवेश को भी प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि तेल की कीमतों में वृद्धि और व्यापारिक लागत में बढ़ौतरी के चलते भारतीय कंपनियों की मुनाफाखोरी पर दबाव बढ़ सकता है। भारतीय कम्पनियां समान की ढुलाई में देरी, ऊर्जा से जुड़ी जरूरी संसाधनों की कमी और कई क्षेत्रों में जरूरी कच्चे माल की कमी जैसी समस्याओं का सामना करने लगी हैं।
इन सब चुनौतियों के बावजूद भारत पहले के मुकाबले ऐसे झटकों से निपटने के लिए बेहतर स्थिति में है। मोदी सरकार ने इस स्थिति से निपटने के लिए तेजी से और संतुलित कदम उठाए हैं। इनमें कच्चे तेल के आयात के स्रोतों में विविधता लाना। देश के अंदर एलपीजी उत्पादन बढ़ाना, निर्यात को बढ़ावा देना और मुद्रीस्फीति को नियंत्रण में रखना शामिल है। मिसाइलों, रॉकेटों, हवाई हमलों के बीच ईरान से सीधी बातचीत करके होर्मुज जलडमरूमध्य से एक-एक कर तेल और गैस के टैंकर निकाल कर भारत लाना मोदी सरकार की कूटनीतिक सफलता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी न लगातार अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों से आपात बैठकें कर भारत में कच्चे तेल, गैस की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने, लॉजिस्टिक और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी आक्समिक योजनाओं पर भी व्यापक चर्च की। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस बात पर बल दिया कि सभी मंत्रालय इस बात का ध्यान रखें कि आम आदमी इससे प्रभावित न हो।
बैठक में जमाखोरी के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर चर्चा हुई ताकि आम वस्तुओं की कीमतें न बढ़ें। बैठक में प्रधानमंत्री ने वैकल्पिक बाजार तलाशने का भी निर्देश दिया। सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति भी कई बार क्षेत्रीय सुरक्षा और आर्थिक और वाणिज्यिक गतिविधियों पर पड़ने वाले व्यापक प्रभावों की समीक्षा कर चुकी है। ईरान-इजराइल में लगभग 50 हजार से अधिक भारतीय नागरिक रहते हैं जबकि खाड़ी देशों और पश्चिम एशिया में रहने वाले भारतीयों की संख्या 90 लाख है। ईरान ने इजराइल के न्यूक्लियर सिटी कहे जाने वाले डिमोना और अराद पर जबरदस्त हमला किया उससे भारतीयों की चिंता और बढ़ गई है। डिमोना को लिटिल इंडिया भी कहा जाता है। वहां महाराष्ट्र और कुछ अन्य राज्यों के मजदूर रहते हैं और वहां खाने-पीने के लिए भारतीय व्यंजन आसानी से उपलब्ध हैं।
इन मजदूरों के परिवार उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। भारतीय दूतावास अपने नागरिकों के साथ लगातार सम्पर्क में है और हैल्पलाइनें 24 घंटे सक्रिय हैं। फिलहाल भारत के पास तेल और ऊर्जा का ज्यादा संकट नहीं है लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचा तो भारत सरकार को भी उनकी कीमतें बढ़ानी पड़ सकती हैं। तेल का उपयोग केवल वाहन और मशीनों को चलाने के लिए नहीं होता बल्कि यह रसायनों का भी समृद्ध स्रोत है। सल्फर, उर्वरक, खाना पकाने की गैस, प्लास्टिक, सिंथैटिक धागे आदि में प्रयुक्त कच्चे माल का उत्पादन खनिज तेल के परासंस्करण पर निर्भर करता है।
इससे ऑटो उद्योग भी प्रभावित हो रहे हैं। भारत जैसे बड़े देश के सामने चुनौती केवल सप्लाई बनाए रखने की नहीं बल्कि पूरे तंत्र को कायम रखने की भी है। यह केवल सरकार की ही परीक्षा नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक धैर्य और समझदारी की भी परीक्षा है। सरकार के हर प्रयास को जन-जन का समर्थन चाहिए। नेतृत्व का धर्म है कि वह सही दिशा में काम करे। समाज का धर्म है वह उस दिशा में संयम के साथ आगे बढ़े। यदि शासन और जनता दोनों एक साथ हों तो कोई संकट बड़ा नहीं होता। जनता को भी संयम और धैर्य से काम लेना होगा। धैर्य और विश्वास ही सबसे बड़े शस्त्र होता है। आज भी जरूरत है कि अफवाहों से बचा जाए। जमाखोरी न हो और हर नागरिक अपनी जिम्मेदारी को समझे।


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