दुबई पर क्यों हमले कर रहा है ईरान?

Summary :

मौजूदा जंग में ईरान का इरादा बिल्कुल साफ है कि अमेरिका और इजराइल के आगे झुकना नहीं है। मध्य-पूर्व के जिन देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं उन पर हमला करते रहना है। मगर दुबई में तो कोई अमेरिकी सैन्य अड्डा है ही नहीं, फिर ईरान क्यों शांतिप्रिय दुबई पर हमले कर रहा है? यह सवाल इन दिनों हर किसी के मन में है, क्योंकि यह केवल एक शहर नहीं बल्कि आधुनिक कुबेर नगरी है। यहां के कण-कण में धन है। आंकड़ों की भाषा में बात करें तो यहां दुनिया के करीब 200 देशों के लोग रहते हैं। पिछले साल…

मौजूदा जंग में ईरान का इरादा बिल्कुल साफ है कि अमेरिका और इजराइल के आगे झुकना नहीं है। मध्य-पूर्व के जिन देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं उन पर हमला करते रहना है। मगर दुबई में तो कोई अमेरिकी सैन्य अड्डा है ही नहीं, फिर ईरान क्यों शांतिप्रिय दुबई पर हमले कर रहा है? यह सवाल इन दिनों हर किसी के मन में है, क्योंकि यह केवल एक शहर नहीं बल्कि आधुनिक कुबेर नगरी है। यहां के कण-कण में धन है।

आंकड़ों की भाषा में बात करें तो यहां दुनिया के करीब 200 देशों के लोग रहते हैं। पिछले साल करीब दो करोड़ अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों ने दुबई की यात्रा की। हर किसी की तमन्ना होती है कि वह दुबई जरूर जाए। दुबई जाने की तमन्ना से मुझे एक पाकिस्तानी फिल्म याद आ गई जिसका नाम था…चलो दुबई! पाकिस्तानी फिल्म डायरेक्टर रियाज बटालवी ने 1979 में यह फिल्म बनाई थी, जब ब्रिटेन से स्वतंत्र हुए दुबई को केवल आठ साल हुए थे। कई बार सोचता हूं कि क्या बटालवी को यह अंदाजा था कि दुबई की किस्मत बुलंदी के शिखर को छुएगी? लगता तो ऐसा ही है, क्योंकि आज दुबई में लाखों-लाख भारतीय और पाकिस्तानी रहते हैं।

वैसे अभी तो दुबई ने पाकिस्तानियों के लिए वीजा करीब-करीब बंद कर रखा है। सवाल यह है कि करीब आधी सदी पहले जिस दुबई की पहचान आपस में लड़ने वाले कबीलों, मछली पकड़ने, सागर से मोतियों को निकालने और छुटपुट व्यापार करने वाले कोस्टल एरिया के रूप होती थी, उसने पिछले पचास वर्षों में ऐसी बेमिसाल तरक्की कैसे कर ली? आप सोच रहे होंगे कि ईरान के हमलों की बात करते-करते मैं दुबई के विकास की बुलंदियों की बात क्यों करने लगा? दरअसल हमलों के पीछे यही बुलंदी है इसलिए पहले दुबई की बुलंदी को समझना जरूरी है।

जब भी हम संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की बात करते हैं तो सबसे पहले दुबई का ख्याल जेहन में आता है लेकिन वास्तव में यूएई सात अमीरातों (रियासतों) का समूह है। इसमें दुबई के अलावा अबुधाबी, शारजाह, उम्मुल क्वैन, अजमान, अल फुजैरा और रास-अल-खैमा शामिल हैं। यूएई की राजधानी अबुधाबी है। इन सभी को 1 दिसंबर 1971 को ब्रिटेन से आजादी मिली। अगले ही दिन रास-अल-खैमा को छोड़कर बाकी सभी ने एक संघ बना लिया। करीब दो महीने बाद ईरान ने होर्मुज जलमार्ग के कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया तो रास-अल-खैमा भी यूएई में आ मिला ताकि ईरान से जंग की स्थिति में वह कमजोर न पड़े। इस तरह से ईरान के साथ का विवाद यूएई से आ जुड़ा। तब से ही दोनों देशों के बीच तनाव बने हैं।

आज दुबई जिस बुलंद मुकाम पर है उसमें निश्चय ही वहां के शासक शेख मोहम्मद की दूर दृष्टि है। दुबई के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में तेल की हिस्सेदारी केवल एक प्रतिशत है, मगर उन्होंने परिस्थितियां ऐसी तैयार कर लीं कि देश वैभव की राह पर तेजी से आगे बढ़ता चला गया। नजरिया बहुत स्पष्ट है। आओ, यहां काम करो, व्यापार करो, खाओ-पियो, मौज करो लेकिन नो नॉनसेंस! वहां पूरी तरह कानून का राज है। देश टैक्स फ्री है। व्यापार के लिए ईज ऑफ डूइंग के मामले में सबको पीछे छोड़ दिया है। यही कारण है कि दुबई इस समय दुनिया का सबसे बड़ा वित्तीय केेंद्र है।

मुहावरे की भाषा में कहें तो जहाज भर-भर कर सोना आता है। दुनिया भर का धन यहां पार्क होता है। यहां तक कि दूसरे देशों के माध्यम से इजराइल और चीन का भी यहां निवेश है। कभी डायमंड बिजनेस बेल्जियम और इजराइल में फलफूल रहा था लेकिन अब दुबई इसका हब है। यूएई और खासकर दुबई में हर किसी के लिए कुछ न कुछ है, यहां तक कि क्रिकेट को भी उन्होंने अपने यहां स्थापित कर लिया। दुबई अचंभित कर देने वाले निर्माण और शानो-शौकत की बेमिसाल इबारत लिखता जा रहा है, जैसा कि कभी यूरोप करता था। दुबई में बुर्ज खलीफा, पाम जुमेराह, दुबई मरीना, जुमेरा लेक टावर्स, जुमेराह हाइट्स जैसे आधुनिक निर्माण आश्चर्य से भर देते हैं।

पाम जुमेराह मानव निर्मित द्वीप है और कमाल की बात है कि इसके निर्माण के लिए कांक्रीट या लोहे का उपयोग नहीं किया गया। समुद्र से 120 मिलियन क्यूबिक मीटर रेत निकाल कर पाम जुमेराह द्वीप बनाया गया। दुबई मेट्रो अपने आप में एक अद्वितीय प्रोजैक्ट है। दरअसल दुबई ने जो सोचा, उसे आकार दे दिया। दुनियाभर से बेहतरीन काम करने वालों को आकर्षित करने के लिए दुबई वह सब कर रहा है और करता रहा है जो जरूरी है। विदेशियों के लिए यहां तक छूट है कि अविवाहित जोड़े एक साथ रह सकते हैं और बच्चा हो जाए तो वह भी स्वीकार्य है। यानी दूरगामी सोच यूएई की खासियत है। उसने हर देश के साथ दोस्ताना रिश्ता रखा है। एक तरफ आलीशान मस्जिदें बनाई हैं तो दूसरी तरफ धर्मनिरपेक्षता की भावना का आदर करते हुए अबुधाबी में हिंदू मंदिर की इजाजत दी।

अब असली सवाल कि यूएई और खासकर दुबई पर ईरान हमले क्यों कर रहा है? अब तक 2000 से ज्यादा मिसाइलें और ड्रोन ईरान दाग चुका है। ज्यादातर को नाकाम कर दिया गया लेकिन बहुत सी मिसाइलें और ड्रोन दुबई पर गिरे भी हैं। दुबई एयरपोर्ट पर भी धमाके हुए हैं। लोगों की जानें भी गई हैं। मकसद साफ है कि दुबई के सुरक्षित होने के विश्वास को खंडित किया जाए ताकि दुनिया भर में दुबई को लेकर ऐसा भय व्याप्त हो जाए कि लोग इधर का रुख करें ही नहीं! क्या ईरान को इसमें सफलता मिलेगी? परिणाम जो भी हो, लेकिन ईरान का इरादा बुलंद है कि तुम अमेरिका के साथ हो तो तुमको छोड़ेंगे नहीं लेकिन कल्पना कीजिए कि जिन लोगों पर मिसाइलों की बरसात हो रही है उनकी जिंदगी कितनी सांसत में होगी।

मगर आम आदमी के बारे में सोचता कौन है। सांडाें की लड़ाई में खेत रौंदा ही जाता है। आज यूनाइटेड नेशन और शांति का राग अलापने वाली सारी संस्थाएं बेमानी हो गई हैं। जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। अमेरिका दुनिया का लीडर खुद को कहता है तो उसे लीडर की तरह व्यवहार भी करना चाहिए।

विजय दर्डा