भारत में सौर ऊर्जा का तेजी से होता विस्तार

भारत

मोदी सरकार के प्रयासों से भारत की सौर ऊर्जा क्षमता में पिछले दशक में उल्लेखनीय रूप से विस्तार हुआ है। विशाल सौर पार्कों से लेकर शहरों, कस्बों और गांवों की नीली छतों तक, हर जगह सोलर पैनल नजर आते हैं सिर्फ़ एक दशक पहले, भारत का सौर ऊर्जा परिदृश्य अपनी प्रारंभिक अवस्था में था, जहां सोलर पैनल केवल कुछ छतों और रेगिस्तानों में ही दिखते थे। आज, देश इतिहास रचने की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारत आधिकारिक तौर पर जापान को पीछे छोड़कर दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा सौर ऊर्जा उत्पादक देश बन गया है। असल में, नवीकरणीय ऊर्जा देश की जलवायु रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

भारत में सौर ऊर्जा का तेज़ी से विस्तार होना एक बड़ी सफलता माना जा रहा है। वर्ष 2014 में मात्र 3 गीगावाट से बढ़कर वर्ष 2025 में लगभग 129 गीगावाट तक पहुंच गई है। इसमें ग्राउंड-माउंटेड प्रोजेक्ट, रूफटॉप सोलर, हाइब्रिड सिस्टम और ऑफ-ग्रिड इंस्टॉलेशन शामिल हैं। बड़े सौर पार्कों के साथ-साथ लाखों घरों पर लगे रूफटॉप सिस्टम अब बिजली पैदा कर ग्रिड में ऊर्जा पहुंचा रहे हैं। दरअसल, भारत उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में स्थित है, जहां कर्क रेखा कई राज्यों से होकर गुजरती है। इससे देश में सौर ऊर्जा उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं। भारतीय महाद्वीप की कुल सौर ऊर्जा क्षमता 748 गीगावाट है।

राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में देश की सबसे अधिक सौर ऊर्जा क्षमता है, जो उन्हें भारत के स्वच्छ ऊर्जा विकास के प्रमुख चालक बनाती है। चूंकि सौर ऊर्जा अब भारत के ऊर्जा मिश्रण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है तथा भारत को वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता हासिल करने के लिये प्रेरित करती है। भारत की सौर ऊर्जा क्षमता जुलाई 2025 तक 4,000 प्रतिशत बढ़ गई थी और देश की कुल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 227 गीगावाट तक पहुंच गई थी। जम्मू-कश्मीर का पल्ली गांव एक उल्लेखनीय उदाहरण बन गया जो पूरी तरह से सौर ऊर्जा पर चलने के कारण भारत की पहली कार्बन-न्यूट्रल पंचायत के रूप में उभरा। पीएम सूर्य घर मिशन, नवीकरण ऊर्जा और नेट-जीरो उत्सर्जन की ओर भारत के प्रयासों के मुख्य स्तंभों में से एक है।

1 3 फरवरी, 2024 को मंत्रिमंडल की मंजूरी के साथ शुरू की गई इस योजना का कुल खर्च 75,021 रुपये करोड़ है। इसका मकसद एक करोड़ घरों को रूफटॉप सौर ऊर्जा प्रणाली देना है, जिससे हर महीने 300 यूनिट तक मुफ्त बिजली मिलेगी। यह योजना नवीकरण ऊर्जा स्रोत अपनाने को बढ़ावा देती है जिससे भारत के कार्बन फुटप्रिंट को कम करने के वादे को समर्थन मिलता है। सौर ऊर्जा अब कुल ऊर्जा में 20 फीसदी से अधिक का योगदान करती है। यह एक उल्लेखनीय उपलब्धि तो है लेकिन इसके साथ एक चुनौती भी है। बेशक यह इस्तेमाल में साफ यानी प्रदूषण मुक्त है लेकिन अगर सही तरीके से प्रबंधन न किया जाए तो सोलर पैनल पर्यावरण के लिए खतरा बन सकते हैं। सोलर पैनल का ज्यादातर हिस्सा रिसाइकल किया जा सकता है। इनमें कांच, एल्युमिनियम, चांदी और पॉलिमर होते हैं लेकिन इनमें थोड़ी मात्रा में ही मौजूद सीसा और कैडमियम जैसी ज़हरीले धातुओं को अगर ठीक तरीके से संभाला न जाए तो ये मिट्टी और पानी को प्रदूषित कर सकते हैं।
आमतौर पर सोलर पैनल लगभग 25 साल तक चलते हैं, उसके बाद उन्हें हटाकर फेंक दिया जाता है। फिलहाल भारत में सौर कचरे को रिसाइकल करने के लिए अलग से कोई बजट नहीं है और पुराने पैनलों को प्रोसेस करने के लिए कुछ छोटे-छोटे केंद्र ही हैं। भारत के पास सौर कचरे का कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है। एक अध्ययन के मुताबिक 2023 तक लगभग एक लाख टन और 2030 तक 6 लाख टन तक सौर कचरा पैदा हो सकता है। अभी यह मात्रा कम है लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि कचरे का असली बोझ आगे आने वाला है। अगर जल्द ही निवेश कर रीसाइक्लिंग की व्यवस्था नहीं बनाई गई तो भारत को बढ़ते सौर कचरे के संकट का सामना करना पड़ सकता है।

ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद (सीईईडब्ल्यू) के एक नए अध्ययन के मुताबिक, भारत में 2047 तक 1.1 करोड़ टन से ज़्यादा सौर कचरा पैदा हो सकता है। इसे सुरक्षित रूप से ठिकाने लगाने के लिए लगभग 300 विशिष्ट रीसाइक्लिंग केंद्र चाहिए होंगे और अगले दो दशक में करीब 47.80 करोड़ डॉलर का निवेश करना होगा। संभावित खतरों को देखते हुए भारत में 2022 में सोलर पैनलों को ई-वेस्ट नियमों के तहत लाया गया। इससे अब यह निर्माताओं की जिम्मेदारी है कि पैनलों की उम्र पूरी होने पर वे (निर्माता) उन्हें इकट्ठा करें, स्टोर करें, तोड़ें और रिसाइकल करें।

अंतर्राष्ट्रीय सौर अलायंस और ओएसओडब्ल्यूओजी जैसी पहलों के जरिए वैश्विक भागीदारी के साथ बड़े पैमाने पर योजनाओं पर अमल के साथ, भारत यह दिखा रहा है कि सौर ऊर्जा एक घरेलू समाधान और वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा प्रगति का जरिया, दोनों हो सकती है। जैसे-जैसे भारत अपनी सौर ऊर्जा क्षमता को बढ़ा रहा है, नवाचार को बढ़ावा दे रहा है और सबको साथ लेकर चलने वाली पहुंच को मुमकिन बना रहा है, यह एक मजबूत, निम्न कार्बन वाले भविष्य की ओर एक साफ रास्ता बना रहा है-दुनिया को दिखा रहा है कि सौर ऊर्जा राष्ट्रीय और वैश्विक, दोनों तरह के जलवायु लक्ष्यों को पाने के लिए जरूरी है।

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