कार्ययोजना के हाशिये से निर्णय के केंद्र तक

Summary :

जब मैं 2015 में बैराबी-सैरांग रेलवे परियोजना में शामिल हुआ तो मुझे लगता था कि यह देश के ऐसे हिस्से में कदम रखने जैसा है जिस पर शायद ही कभी राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान दिया गया हो। यह सफ़र खुद ही अपनी कहानी कहता है। राष्ट्रीय राजमार्ग-154, जिसे अब राष्ट्रीय राजमार्ग-06 कहा जाता है, एकमात्र पहुंच मार्ग था जो बुरी तरह क्षतिग्रस्त था और भरोसे के लायक नहीं था। भारी ट्रक अक्सर कई दिनों तक फंसे रहते थे और निकटवर्ती स्थानों की यात्रा हिचकोलों से भरी होती थी। आसपास की पहाड़ियां छोटी, कमजोर और अस्थिर थीं, जिनका आकार तीव्र वर्षा…

जब मैं 2015 में बैराबी-सैरांग रेलवे परियोजना में शामिल हुआ तो मुझे लगता था कि यह देश के ऐसे हिस्से में कदम रखने जैसा है जिस पर शायद ही कभी राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान दिया गया हो। यह सफ़र खुद ही अपनी कहानी कहता है। राष्ट्रीय राजमार्ग-154, जिसे अब राष्ट्रीय राजमार्ग-06 कहा जाता है, एकमात्र पहुंच मार्ग था जो बुरी तरह क्षतिग्रस्त था और भरोसे के लायक नहीं था। भारी ट्रक अक्सर कई दिनों तक फंसे रहते थे और निकटवर्ती स्थानों की यात्रा हिचकोलों से भरी होती थी। आसपास की पहाड़ियां छोटी, कमजोर और अस्थिर थीं, जिनका आकार तीव्र वर्षा और निरंतर ढलान गति के कारण बदलता रहता था। कागज पर परियोजना ऐतिहासिक थी, राष्ट्रीय नेटवर्क से मिजोरम का पहला रेल-परिवहन संपर्क जो पहाड़ों, तीव्र ढलान और गहरी घाटियों को काट कर तैयार किया जा रहा था।

हालांकि, ज़मीनी स्तर पर प्रगति बहुत धीमी थी। सामग्री की अनुपलब्धता, श्रम की कमी, परिवहन में विलंब, स्थानीय बाधाएं और लगातार स्थगित निर्णयों के कारण कार्यस्थल पर काम न होना आम बात थी। एक सुरंग डिज़ाइन सलाहकार और भूविज्ञानी के रूप में भूविज्ञान कार्य चुनौतीपूर्ण था लेकिन इसकी गंभीरता समझी जा सकती थी। जो बात वास्तव में अधिक कठिन साबित हुई, वह थी- संस्थागत निष्क्रियता। परियोजना देश के सबसे दूर-दराज के क्षेत्र में स्थित थी।

समीक्षा छिटपुट थी। निर्णय लेने का अधिकार मंत्रालयों, राज्य विभागों और एजेंसियों में बिखरा हुआ था। धीरे-धीरे, एक असहज सच्चाई स्पष्ट होने लगी। ऐसा प्रतीत होता था कि कोई भी वास्तव में यह उम्मीद नहीं करता था कि परियोजना निकट भविष्य में पूरी होगी। फिर, शांतिपूर्वक और बिना किसी घोषणा के पूरी प्रणाली में अचानक तेजी आयी। परियोजना कार्यालयों में एक स्पष्ट तत्परता का भाव दिखने लगा। फोन बार-बार बजने लगे। वरिष्ठ अधिकारी नियमित रूप से कार्यस्थलों का दौरा करने लगे। लंबे समय से लंबित फाइलों को तुरंत सामने लाया गया, उनकी समीक्षा की गई और उन्हें दूसरी जगहों पर भेजा गया। बैठकें तेजी से व नियमित रूप से निर्धारित की जाने लगीं, अक्सर उन एजेंसियों को भी शामिल किया गया जो पहले अलग-थलग रहकर काम करती थीं।

एक निजी सलाहकार के रूप में मैं प्रशासनिक विभाग का हिस्सा नहीं था और किसी ने भी गतिविधि में आयी इस अचानक तेजी के पीछे का कारण नहीं बताया लेकिन बड़ी अवसंरचना परियोजनाओं के लंबे अनुभव ने मुझे संकेत की पहचान करना सिखा दिया था। यह सामान्य दबाव नहीं था। यह शीर्ष स्तर पर निरीक्षण की तैयारी थी। जल्द ही कारण स्पष्ट हो गया। बैराबी-सैरांग रेलवे परियोजना की समीक्षा पीएम की अध्यक्षता वाले सक्रिय शासन और समय पर कार्यान्वयन (प्रगति) मंच के तहत निर्धारित की गई थी। परियोजना लंबे समय तक हाशिये पर रही लेकिन प्रगति के अंतर्गत समीक्षा से प्राधिकार व जवाबदेही तय हुई और हर लंबित मुद्दे तथा एजेंसियों के बीच अड़चनों के सम्बन्ध में वास्तविक समय पर जांच की व्यवस्था की गयी। इस बैठक के बाद निर्णय मेल खाने लगे, और प्रगति दिखाई दी जिससे यह स्पष्ट हुआ कि किस प्रकार शासन अक्सर परिणाम तय करता है।

मार्च 2016 की प्रगति समीक्षा बैठक ने परियोजना के आयाम में मूलभूत बदलाव किये। इस रूपरेखा के तहत समस्याओं की अलग-अलग जांच नहीं की जा सकती थी और न ही उन्हें अनिश्चितकाल के लिए टाला जा सकता था। एन-एच-06 की अत्यंत खराब हालत अब रेलवे के कार्य क्षेत्र के बाहर नहीं मानी जा रही थी। स्पष्ट समयसीमा और निरंतर निगरानी के साथ सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय को मरम्मत और सुधार कार्य करने का निर्देश दिया गया। भूमि अधिग्रहण में देरी को अब केवल सामान्य प्रशासनिक बाधाओं के रूप में नहीं देखा जा रहा था, मिजोरम सरकार को समाधान तेज करने का निर्देश दिया गया और प्रगति पर निगरानी रखी गई। कानून और व्यवस्था से संबंधित मुद्दों को औपचारिक रूप से क्रियान्वयन के लिए महत्वपूर्ण जोखिम माना गया और उन पर कड़ी निगरानी रखी गयी।

जैसे-जैसे महीने बीतते गए, यह स्पष्ट हो गया कि प्रगति संस्थागत व्यवहार को बदल रही थी। समीक्षा अब देरी की व्याख्या करने से हटकर उन्हें हल करने पर केंद्रित हो गई और रिपोर्ट के स्थान पर तस्वीरों, समय रेखाओं और स्थल अवस्थति डेटा का उपयोग होने लगा। डिजिटल निगरानी यह सुनिश्चित करती थी कि एक बार उठाए गए मुद्दे तब तक चर्चा में बने रहें जब तक कि उनका समाधान न हो जाए। इस अनुशासन से पूरी प्रणाली में काम करने के तरीके बदल गये।

इंजीनियर अधिक निर्णायक हो गए, ठेकेदार अधिक जवाबदेह बन गये तथा राज्य और केंद्रीय एजेंसियां अधिक निकटता से समन्वय करने लगीं, क्योंकि हिस्सों में काम करने को अब सहन नहीं किया जाता था। जमीनी स्तर पर प्रभाव स्पष्ट था। सुरंग खुदाई पहले छिटपुट तरीके से की जा रही थी। जटिल भूविज्ञान, टूटे हुए चट्टान, संरचनात्मक बदलाव क्षेत्र, पानी का रिसाव और कमजोर स्तरों के बावजूद अब खुदाई के काम में लगातार प्रगति होने लगी। समय के साथ उपलब्धि का पैमाना स्पष्ट हो गया। लगभग एक-तिहाई मार्ग को कवर करने वाली 45 सुरंगें, 150 से अधिक पुल, सुरंग खंडों के माध्यम से बिना बालास्ट वाला ट्रैक और देश के सबसे चुनौतीपूर्ण भौगोलिक क्षेत्रों में से एक में 100 किलोमीटर प्रति घंटे की डिजाइन गति की सुविधा।

चार नए स्टेशन होर्टोकी, काउनपूई, मुअलखांग और सैरांग लंबे समय से अलग-थलग समुदायों की सेवा के लिए तैयार हुए। इंजीनियरिंग से परे, परियोजना ने एक गहरी सच्चाई को उजागर किया। पूर्वोत्तर में परियोजनाओं पर इसके प्रभाव से परे, प्रगति पोर्टल का देशव्यापी विकास पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है, क्योंकि निर्णय लेने में तेजी और बेहतर समन्वय ने पूरे देश में अवसंरचना के निरंतर विस्तार का समर्थन किया है। हाल ही में एक संवाददाता सम्मेलन में कैबिनेट सचिव ने प्रगति व्यवस्था के प्रभाव को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि दिसंबर 2025 तक, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रगति व्यवस्था के तहत 382 प्रमुख परियोजनाओं की समीक्षा कर चुके हैं।

प्रगति इकोसिस्टम से 85 लाख करोड़ रुपये (लगभग 850 बिलियन डॉलर) से अधिक मूल्य की अवसंरचना परियोजनाओं के कार्यान्वयन में तेजी आयी है। कुल मिलाकर देखा जाए तो जमीन पर किए गए अवलोकन, स्थानिक परिणाम और वित्तीय संकेतक साथ मिलकर दर्शाते हैं कि भारत में अवसंरचना व्यय को व्यवस्थित रूप से बढ़ाया गया है और प्रभावी ढंग से प्रबंधित किया गया है जिससे राष्ट्रीय विकास में एक स्थिर योगदानकर्ता के रूप में इसकी भूमिका मजबूत हुई है।

(लेखक एक मुख्य इंजीनियरिंग भूविज्ञानी हैं)

Team Desk