बाढ़ से बर्बादी कोई नई बात नहीं है। हर साल इससे देश को भीषण नुक्सान होता है। देश में बाढ़ का कहर जारी है। असम और जम्मू-कश्मीर में इसका प्रकोप ज्यादा दिखाई दे रहा है। जान-माल की हानि भी हुई है। लोग अपने घरों से बाहर निकल कर राहत शिविरों में आश्रय लिए हुए हैं, लेकिन अच्छी बात यह रही कि बचाव और राहत कार्यों में बड़ी ही तत्परता से सेनाए एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, फायर और इमरजेंसी सर्विस के लोग तैनात हो गए और बाढ़ प्रभावित इलाकों में नुक्सान न्यूनतम हुआ।
वैसे असम में बाढ़ की यह स्थिति हर साल बनती है। लाखों लोग प्रभावित होते हैं। बाढ़ यहां के जीवन का एक नियमित हिस्सा बन गई है। राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार राज्य का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा बाढ़ संभावित क्षेत्र में आता है, क्योंकि यह ब्रह्मपुत्र नदी की जद में है और हिमालय से निकलने वाली 50 से ज़्यादा सहायक नदियां इसमें आ कर मिलती हैं। हालांकि यह एक प्राकृतिक चक्र का हिस्सा है, लेकिन इससे बचने का या न्यूनतम नुकसान की एक मजबूत व्यवस्था देश में उपलब्ध है। इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को श्रेय दिया जाना चाहिए, जिन्होंने आपदा प्रबंधन का एक ऐसा इको सिस्टम तैयार किया है, जो वैश्विक मानदंडों पर न सिर्फ खरा उतरता है, बल्कि दुनिया के कई देशों को नेतृत्व भी प्रदान कर रहा है।
आज भारत आपदा प्रबंधन की ग्लोबल रैंकिंग में विश्व के श्रेष्ठ 6 देशों में शामिल हो गया है। एक कनाडियन रिसर्च एजेंसी के अनुसार आपदा प्रबंधन की तैयारी की रैंकिंग में हमारा देशए ऑस्ट्रेलिया, मैक्सिको, नीदरलैंड, ग्रीस और न्यूज़ीलैंड के बाद सबसे प्रमुख देश है। भारत में प्राकृतिक आपदा से नुक्सान कुल जीडीपी का केवल 0.45 प्रतिशत होता है।
पिछले दो दशकों के आकड़े देखें तो स्पष्ट होता है कि हर साल देश के आपदा प्रबंधन में उतरोत्तर सुधार हो रहा है। 2013-14 में जहां प्राकृतिक आपदा से 5677 लोगों की मौतें हुईं थीं, वहीं 2024-25 में 3080 लोगों की मौतें हुईं। इसी तरह से मवेशियों का सबसे ज़्यादा नुक्सान 2006-07 में हुआ जब यह आकड़ा 4.55 लाख तक पहुंच गया। 2023-24 में यह आकड़ा 1.19 लाख रहा। 2007-08 में प्राकृतिक आपदा से 35 लाख से ज़्यादा घर प्रभावित हुए, जबकि 2023-24 में 1.4 लाख घरों को इन्हीं आपदाओं से नुक्सान हुआ। 2024-25 में फसल क्षेत्र का भी सबसे कम नुक्सान हुआ।
देश में आपदा प्रबंधन की जिम्मेदारी केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की है और वह लगातार कह रहे हैं की भारत प्राकृतिक आपदाओं से शून्य मृत्यु की तरफ बढ़ रहा है। वह केवल भौतिक उपायों की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे प्राकृतिक आपदाओं के लिए जिम्मेदार जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के उपायों पर ज्यादा जोर दे रहे हैंए क्योंकि आपदाओं को कम करने के लिए जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार परिस्थितियों से ही निपटना जरूरी है। अमित शाह ने संसद में खड़े होकर कहा कि उनका लक्ष्य देश में जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन क्षमताओं को सशक्त बनाना हैए क्योंकि आपदा प्रबंधन की प्राथमिक जिम्मेदारी ही जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (डीडीएमए) की है। इसलिए उन्होंने आपदा प्रतिक्रिया निधि राज्य और जिला दोनों स्तरों पर आवंटित करने की उन्होंने योजना बनाई। अकेले वर्ष 2025-26 में, केंद्र ने आपदा प्रबंधन पर कुल 30,946 करोड़ रुपये खर्च किएए जिनमें स्टेट डिजास्टर रिस्पॉन्स फंड, नेशनल डिजास्टर रिस्पॉन्स फंड और मिटिगेशन फंड को दिए कोष प्रमुख रूप से शामिल रहे। जबकि 2010-2015 की पांच साल की अवधि के लिए यूपीए सरकार ने कुल ₹33,580 करोड़ का कोष तय किया था।
यह हमारे लिए गर्व की बात है कि भारत को इस समय आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि पिछले 12 वर्षों में, मोदी सरकार ने आपदा प्रबंधन में क्षमता निर्माण, गति, दक्षता और सटीकता के कई मानदंड स्थापित किये हैं। इस समय राज्यों के हर जिले में आपदा प्रबंधन योजना तैयार की जा रही है। हर प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए कार्य योजना तैयार की जा रही है। इसी का परिणाम है कि भारत कई आपदाओं में शून्य मानवीय जान के नुक्सान की उपलब्धि हासिल कर पाया है। चक्रवातों से न्यूनतम नुक्सान से निपटने का रिकार्ड यह दर्शाता है कि किस तरह केंद्र, राज्य और स्थानीय इकाइयां मिलकर बड़ी सफलताएं हासिल कर सकते हैं।
इस समय आपदा प्रबंधन से जुड़ी सभी एजेंसियां एक मंच पर हैं और आपदा प्रबंध में संपूर्ण सरकार तैयार के सिद्धांत को चरितार्थ कर रही हैं। अंतर एजेंसी समन्वय बेहतर ढंग से काम कर रहा है। मोदी सरकार ने नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (एनडीएमए) नेशनल डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स (एनडीआरएफ) और कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर (सीदीआरआई) के बेहतरीन ढांचे खड़े कर दिए हैं। जिसके कारण ही भारत इस समय आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में एक ग्लोबल लीडर के रूप में अपनी पहचान बना चुका है।
एनडीआरएफ की तत्परता और कार्यकुशलता का प्रमाण हमने कई बार देख लिया है। हर आपदा में एनडीआरएफ का रिस्पॉन्स काबिले तारीफ रहा है। किसी भी आपदा के समय जान बचाने का इनका रिकार्ड शानदार रहा है। इस बल ने अब तक खतरे में फंसे 1,68,000 से ज़्यादा लोगों की जान बचाई। फंसे हुए 8,50,000 से ज़्यादा लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया और 2024 में रिकॉर्ड 1038 ऑपरेशन किए।
अब भारत भविष्य की आपदाओं का अनुमान लगाने, पहले से अनुसंधान करने के साथ साथ ग्लोबल मानदंडों के आधार को अपनाकर उसे भारत की भौगोलिक स्थितियों के अनुकूल बनाने पर काम कर रहा है। मानसून आने से पहले ही गृहमंत्री अमित शाह ने सभी राज्यों को किसी भी संभावित आपदा से निपटने की व्यवस्था मज़बूत करने का दिशा निर्देश दे दिया था। उसके तहत बाढ़ प्रबंधन टीमें बनाने और उन्हें सक्रिय करने का भी निर्देश दे दिया था। केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर बाढ़ की भविष्यवाणी करने वाली एक एकीकृत प्रणाली भी एक्टिव कर दी गई थी। खास कर हिमालयी क्षेत्रों और ज़्यादा जोखिम वाले राज्यों को अलर्ट मोड पर ही रखा गया था। अर्ली वार्निंग सिस्टम से जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम को विशेष कर जोड़ा गया और उनके सभी जलाशयों को इसके दायरे में लाया गया, ताकि स्थानीय समुदाय खराब मौसम की स्थितियों में तुरंत प्रतिक्रिया दे सकें।
इस समय गृहमंत्री ने सभी अधिकारियों को आपदा की तैयारियों को और बेहतर बनाने के लिए मॉनसून से होने वाले नुकसान, भविष्यवाणी की सटीकता और खेती को हुए नुक्सान का अध्ययन करने का भी निर्देश जारी कर दिया है, ताकि प्रभावित लोगों को उचित सहायता मिल सके। खुद गृह मंत्री अमित शाह लगातार देश में बाढ़ प्रबंधन की निगरानी एवं उनकी समीक्षा कर रहे हैं और आवश्यक निर्देश जारी कर रहे हैं। सबसे खास बात यह है कि इस काम में स्पेस टेक्नोलॉजी का भी अधिकतम उपयोग हो रहा है। केवल मानसून की बात करें तो असम के साथ-साथ भारत में बाढ़ की सबसे ज़्यादा आशंका वाले क्षेत्र उत्तर प्रदेश को माना जाता है। बिहार भी सबसे ज़्यादा जोखिम वाला राज्य माना जाता है।
बाढ़ प्रकोप से बचाव पर भारत की ठोस तैयारी
Summary :
बाढ़ से बर्बादी कोई नई बात नहीं है। हर साल इससे देश को भीषण नुक्सान होता है। देश में बाढ़ का कहर जारी है। असम और जम्मू-कश्मीर में इसका प्रकोप ज्यादा दिखाई दे रहा है। जान-माल की हानि भी हुई है। लोग अपने घरों से बाहर निकल कर राहत शिविरों में आश्रय लिए हुए हैं, लेकिन अच्छी बात यह रही कि बचाव और राहत कार्यों में बड़ी ही तत्परता से सेनाए एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, फायर और इमरजेंसी सर्विस के लोग तैनात हो गए और बाढ़ प्रभावित इलाकों में नुक्सान न्यूनतम हुआ। वैसे असम में बाढ़ की यह स्थिति हर साल बनती…


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