बदलेगी नोटों की सूरत

Summary :

भारत में प्लास्टिक के नोट चलाने का विचार नया नहीं है। प्लास्टिक की करैंसी सबसे पहले 1988 में ऑस्ट्रेलिया में शुरू की गई। रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया, यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबर्न और कॉमनवैल्थ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल कौंसिल को प्लािस्टक मनी नोट बनाने का श्रेय दिया जाता है। ट्रायल के अच्छे नतीजों की वजह से 1996 में पूरे ऑस्ट्रेलिया में बड़ी संख्या में प्लास्टिक के नोट चलाए गए। कई देशों ने पारंपरिक कागजी नोटों को पूरी तरह से हटा दिया है और अपनी करैंसी नागरिकों को पॉलीमर नोटों में बदल दिया है। न्यूज़ीलैंड ने 1999 तक अपनी कागजी करैंसी को पूरी तरह…

भारत में प्लास्टिक के नोट चलाने का विचार नया नहीं है। प्लास्टिक की करैंसी सबसे पहले 1988 में ऑस्ट्रेलिया में शुरू की गई। रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया, यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबर्न और कॉमनवैल्थ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल कौंसिल को प्लािस्टक मनी नोट बनाने का श्रेय दिया जाता है। ट्रायल के अच्छे नतीजों की वजह से 1996 में पूरे ऑस्ट्रेलिया में बड़ी संख्या में प्लास्टिक के नोट चलाए गए। कई देशों ने पारंपरिक कागजी नोटों को पूरी तरह से हटा दिया है और अपनी करैंसी नागरिकों को पॉलीमर नोटों में बदल दिया है। न्यूज़ीलैंड ने 1999 तक अपनी कागजी करैंसी को पूरी तरह से बदल दिया था और अब सभी मूल्यवर्गों में पॉलीमर नोटों का इस्तेमाल करता है। रोमानिया 1999 में प्लास्टिक के नोट फैलाने वाला पहला यूरोपीय देश बना। इसी तरह, कनाडा ने 2013 तक पॉलीमर करैंसी में अपना पूरा बदलाव कर लिया था। ब्रुनेई 2006 से विशेष रूप से पॉलीमर नोटों का इस्तेमाल कर रहा है। वियतनाम भी अपनी ज़्यादातर करैंसी पॉलीमर रूप में ही जारी करता है। कई देश अभी मिश्रित नागरिकों पर काम कर रहे हैं, जहां कागजी और पॉलीमर दोनों तरह के नोट चलन में हैं। ब्रिटेन ने 2016 में पॉलीमर पाउंड स्टर्लिंग नोट जारी करना शुरू किया। इस पहल की शुरुआत 5 रुपए के नोट से हुई थी और बाद में इसे 10 रुपए, 20 रुपए और 50 रुपए जैसे बड़े मूल्यवर्गों तक बढ़ाया गया। सिंगापुर और मलेशिया जैसे देश भी कुछ खास मूल्यवर्गों के नोटों के लिए पॉलीमर तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। इस बीच, थाईलैंड और फिलीपींस ने हाल ही में प्लास्टिक करैंसी की ओर अपने बदलाव की गति तेज़ कर दी है।
लगभग 60 देश प्लास्टिक के नोटों को अपना चुके हैं। अब भारत में भी ​रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने प्लास्टिक नोटों के सर्कुलेशन को टेस्ट करने का फैसला किया है। रिजर्व बैंक जल्दी ही 10 और 20 रुपए के नोट जारी करेगा। फिलहाल 200 करोड़ के नोट छापे जाएंगे और ट्रायल सफल रहा तो आगे और भी नोट छापे जाएंगे। देखा जाए तो प्लास्टिक नोटाें के बहुत फायदे हैं। प्लास्टिक नोट आमतौर पर प्लास्टिक या पॉलीमर सब स्ट्रेट से बनाए जाएंगे। कागज के नोटों की नकल करना आसान है, जबकि प्लास्टिक के नोटों की नकल करना मुश्किल होगा। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था में नकली करैंसी की घुसपैठ बंद होगी। क्योंकि भारत में आतंकवाद के वित्त पोषण के लिए पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी संगठन नकली करैंसी का इस्तेमाल करते रहे हैं और देश की अन्दरूनी सुरक्षा पर असर डालते रहे हैं। प्लास्टिक के नोट कागज के नोटों के मुकाबले काफी समय तक चलेंगे। कागज के नोट बहुत जल्दी खराब हो जाते हैं जिससे छपाई का खर्च बढ़ता है। वित्त वर्ष 2025 में आरबीआई ने कागजी नोटों की छपाई पर 6372.9 करोड़ खर्च किए थे। पॉलिमर नोटों को बार-बार छापने से खर्चा घटेगा। प्लास्टिक के नोट छापने से पर्यावरण को होने वाला नुक्सान भी काफी हद तक कम होगा। दुनिया में हर साल 600 बिलियन प्लास्टिक बैग इस्तेमाल होते हैं। इनमें से अधिकांश सीवर और नदियों में चले जाते हैं और जहां वह सीवर जाम कर देते हैं। महानगरों में यह समस्या आम है, जहां सीवर जाम होने से पूरा प्रवाह ही अवरुद्ध हो जाता है। प्लास्टिक बैग दुनियाभर में समुद्रों के बीच पाए जाने वाले 10 तरह के कूड़े में से एक है। अगर प्लास्टिक का रिसाइक्लिंग कर नोट छापे जाएंगे तो कागज तैयार करने के लिए पेड़ों पर भी कम दबाव पड़ेगा। इस तरीके से पर्यावरण को होने वाला नुक्सान कम होगा। हालांकि भारत में प्लास्टिक के नोट अपनाने में तकनीकी समस्याएं जरूर आएंगी। एटीएम मशीनों में ऐसे नोटों को लगाना महंगा होगा लेकिन धीरे-धीरे इन मुश्किलों पर पार पाना सम्भव हो जाएगा।
मोबाइल फ़ोन के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से भारत के गांवों में फ़ाइनेंशियल सर्विस तक पहुंच बढ़ी है। भारत में टेलीकॉम इंडस्ट्री “कैशलेस इकॉनमी” के लिए मोबाइल मनी या डिजिटल पेमेंट की ओर बढ़ रही है, जैसा कि इस आर्टिकल में बताया गया है। इस स्टडी की मदद से, बिज़नेस और सरकारें डिजिटल पेमेंट को अपनाने को बेहतर ढंग से समझ सकती हैं। विकासशील देशों के गांवों में इनोवेटिव मोबाइल टेक्नोलॉजी एप्लीकेशन की ज़रूरत बढ़ रही है। अगर मोबाइल पेमेंट का ज़्यादा इस्तेमाल होने लगे तो वे देश के फ़ाइनेंशियल इनक्लूजन की कोशिशों में मदद कर सकते हैं। ई-कॉमर्स के विकास से दुनिया भर में कमर्शियल आकर्षण और सामाजिक-आर्थिक तरक्की बढ़ रही है। भारत और दक्षिण के देशों में टेक्नोलॉजी का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल होता है। 25 से 35 साल के लोग डिजिटल पैसे को ज़्यादा पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यह सुरक्षित है और इसमें कोई धोखाधड़ी नहीं होती। स्टडी के नतीजों के मुताबिक, छोटे और मीडियम साइज़ के बिज़नेस तेज़ी से इंटरनेट कॉमर्स (एसएमईएस ) का सहारा ले रहे हैं। छोटे और मीडियम साइज़ के बिज़नेस (एसएमईएस) ऑर्गनाइज़ेशन के एक बड़े हिस्से को कंट्रोल करते हैं, जिसमें इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स (आईओटी) पर ज़ोर दिया जाता है। यह उन लोगों के लिए कोई स्मार्ट सॉल्यूशन नहीं है जो साइबर क्राइम से डरते हैं और कोई रिस्क नहीं लेना चाहते। इस तरह की रिसर्च अलग-अलग तरह के ऑनलाइन सिस्टम चैनल के लिए फायदेमंद हो सकती है।
कुल मिलाकर भारत में रुपए की सूरत बदल जाएगी। फिलहाल कागज के नोट भी चलते रहेंगे। नोटबंदी के बाद आरबीआई की पहल सराहनीय है। देखना होगा कि प्लास्टिक के नोट अर्थव्यवस्था में क्या साकारात्मक परिवर्तन लाते हैं।

Aditya Chopra

Aditya Chopra is well known for his phenomenal viral articles.