मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग का प्रयोग

Summary :

स्वतन्त्र भारत के इतिहास में संभवतः यह पहला अवसर है जब भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए संसद में महाभियोग लाने की तैयारी हो रही है। चुनाव आयोग भारत की ऐसी स्वतन्त्र संवैधानिक संस्था है जो अपना कार्य सीधे संविधान से शक्ति लेकर करती है और उसके कामकाज पर सरकार का कोई नियन्त्रण नहीं रहता। भारत के लोकतन्त्र में राजनीतिक दलों की सबसे बड़ी भागीदारी होती है अतः चुनाव आयोग को इन राजनीतिक दलों के नियमन का अधिकार भी दिया गया और यह सुनिश्चित किया गया कि देश के लोकतन्त्र के कर्णधार इन दलों के…

स्वतन्त्र भारत के इतिहास में संभवतः यह पहला अवसर है जब भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए संसद में महाभियोग लाने की तैयारी हो रही है। चुनाव आयोग भारत की ऐसी स्वतन्त्र संवैधानिक संस्था है जो अपना कार्य सीधे संविधान से शक्ति लेकर करती है और उसके कामकाज पर सरकार का कोई नियन्त्रण नहीं रहता। भारत के लोकतन्त्र में राजनीतिक दलों की सबसे बड़ी भागीदारी होती है अतः चुनाव आयोग को इन राजनीतिक दलों के नियमन का अधिकार भी दिया गया और यह सुनिश्चित किया गया कि देश के लोकतन्त्र के कर्णधार इन दलों के भीतर भी पूरी तरह से लोकतन्त्र हो। अतः राजनीतिक दलों की जवाबदेही चुनाव आयोग के प्रति भी तय की गई। इसके साथ ही राजनीतिक दलों के विवादों को दूर करने के लिए चुनाव आयोग को कुछ न्यायिक अधिकार भी दिये गये। इसीलिए हम देखते हैं कि जब किसी राजनीतिक दल के भीतर बंटवारे या अन्य किसी आन्तरिक मुद्दे पर किसी प्रकार का विवाद होता है तो उसका निपटारा चुनाव आयोग द्वारा ही किया जाता है।
भारत में ऐसा पहला मामला 1969 में तब आया था जब केन्द्र में सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस का पहला विभाजन हुआ था और तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने अपनी कांग्रेस पार्टी को दो भागों में विभाजित कर दिया था । उस समय चुनाव आयोग में एक ही मुख्य चुनाव आयुक्त हुआ करते थे । तब इस पद पर स्व. एस.पी. सेनवर्मा थे। इस विवाद के दौरान कांग्रेस पार्टी की सम्पत्ति से लेकर उसके चुनाव निशान ( दो बैलों की जोड़ी) तक पर पार्टी के दोनों गुटों ने अपना– अपना दावा चुनाव आयोग के समक्ष ठोका था। यह प्रकरण इसलिए इतिहास में दर्ज हो चुका है क्योंकि तब मुख्य चुनाव आयुक्त एस.पी. सेनवर्मा पर सत्ता पर काबिज इन्दिरा गांधी गुट के कांग्रेस धड़े का कोई प्रभाव नहीं चला था और उन्होंने अपना फैसला पूरी तरह निष्पक्ष रहते हुए हर मुद्दे पर दिया था। एस.पी. सेनवर्मा ने कांग्रेस के चुनाव निशान दो बैलों की जोड़ी को जब्त कर लिया था और इसके स्थान पर कांग्रेस के दोनों धड़ों को अलग-अलग चुनाव निशान दे दिये थे। यह समय उस दौर के इस फैसले की तफसील में जाने का नहीं है बल्कि मन्तव्य यह है कि चुनाव आयोग का काम इस तरह चलना चाहिए कि किसी भी राजनीतिक दल को उसकी नीयत पर शक करने की हिम्मत न हो। ठीक एेसी ही स्वतन्त्र व निष्पक्ष भूमिका चुनाव आयोग ने तब भी निभाई थी जब इमरजेंसी समाप्त होने पर मार्च 1977 में चुनाव आयोग ने लोकसभा के चुनाव कराये थे जिनमें देश के प्रधानमन्त्री पद पर रहते हुए ही श्रीमती इन्दिरा गांधी उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट से चुनाव हार गई थीं। इसके बाद 90 के दशक मे मुख्य चुनाव आयुक्त स्व. टी.एन. शेषन बने और चुनावों की प्रक्रिया को लेकर कई प्रकार के संशोधन किये जिनकी वजह से वह अक्सर चर्चा में रहा करते थे। भारतवासी जानते हैं हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था जिन चार पायों, विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका व चुनाव आयोग पर टिकी हुई है उनमें दो पाये न्यायपालिका व चुनाव आयोग सरकार के अंग नहीं बनाये गये हैं । इसकी वजह यही है कि भारत की राजनीतिक शासन व्यवस्था में हर हाल में संविधान का ही शासन रहे। इस सिलसिले में चुनाव आयोग की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं रखी गई है बल्कि संविधान निर्माताओं ने उस पर जिम्मेदारी डाली है कि वह केवल संविधान के प्रति वफादार रहने वाली राजनीतिक पार्टियों को ही मान्यता देकर भारत में राज्य स्तर से लेकर केन्द्र स्तर तक हर पांच साल बाद चुनाव करा कर सरकारों के गठन का मार्ग प्रशस्त करे। इस काम को चुनाव आयोग संविधान की रुह के अनुसार प्रत्येक भारतीय नागरिक को मतदाता बना कर ही करता है। अतःभारतीय संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार जो भी भारतीय नागरिक 18 वर्ष की आयु को पा लेता है वह मतदाता बनने का अधिकारी हो जाता है। इसलिए चुनाव आयोग पर यह जिम्मेदारी आ जाती है कि वह भारत की बढ़ती जनसंख्या के अनुरूप मतदाताओं की संख्या भी बढ़ाता रहे। परन्तु संविधान ही चुनाव आयोग को यह अधिकार भी देता है कि वह केवल वैध भारतीय नागरिकों को ही मतदाता बनाये और कोई भी अवैध व्यक्ति मतदाता न बन सके। इसके लिए चुनाव आयोग को समय–समय पर मतदाता सूचियों का विशेष पुनरीक्षण करने का अधिकार भी मिला हुआ है। वर्तमान समय में इसी पुनरीक्षण कार्रवाई को लेकर देश के प्रमुख विपक्षी दलों में चुनाव आयोग के प्रति गुस्सा है क्योंकि आयोग जिस राज्य में भी पुनरीक्षण का काम कर रहा है वहीं लाखों की संख्या मे मतदाताओं के नाम सूची से काट रहा है। अतः राजनैतिक दलों का कहना है कि विशेष मतदाता पुनरीक्षण के नाम पर चुनाव आयोग मतदाताओं के सामने एसे कागजात भरने की शर्ते लगा रहा है जिनका उनके दैनन्दिन जीवन से ज्यादा लेना-देना नहीं रहता है और अथक प्रयास करने पर उन्हें ये कागजात सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने के बाद बनवाने पड़ते हैं। यह मामला देश के सर्वोच्च न्यायालय में भी गया जहां से मतदाताओं को राहत मिली क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि वैध मतदाता की पहचान करने के लिए उसका आधार कार्ड भी पर्याप्त सबूत माना जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने तब हस्तक्षेप किया था जब बिहार में वहां होने वाले विधानसभा चुनावों से कुछ महीने पहले ही चुनाव आयोग मतदाता सूची पुनरीक्षण का काम शुरू किया था।
शुरू में चुनाव आयोग ने मतदाताओं से जिन 11 कागजात दिखाने की मांग की थी उनमें आधार कार्ड को शामिल ही नहीं किया गया था। इसके बाद उसने अन्य राज्यों में पुनरीक्षण का काम शुरू किया जिसका सबसे ज्यादा विरोध प. बंगाल की तृणमूल कांग्रेस की मुख्यमन्त्री सुश्री ममता बनर्जी ने किया । उन्होंने चुनाव आयोग पर बहुत भीषण आरोप भी लगाये और मुख्य चुनाव आयुक्त श्री ज्ञानेश कुमार पर अहंकारी होने के आरोप भी लगाये। मामला सर्वोच्च न्यायालय में भी गया और वहा पुनरीक्षण प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगाये गये जिस पर न्यायालय ने ममता दीदी को कुछ राहत भी दी । वैसे गौर से देखा जाये तो जिन-जिन राज्यों में भी विपक्षी दलों की सरकारें हैं सभी ने चुनाव आयोग पर पक्षपात के आरोप लगाये मगर इसका मतलब यह नहीं है कि संसद में ही विपक्षी दल मिल कर ज्ञानेश कुमार को पद मुक्त करने के लिए महाभियोग लेकर आ जायें। भारत का लोकतन्त्र इस व्यवस्था के तहत सृजित विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं की पवित्रता व साफगोई के भरोसे चलता है जिनसे भारी मतभेद भी हो सकते हैं अतः उनके कामकाज को दुरुस्त कराने के लिए कई प्रकार के लोकतान्त्रिक हथियार भी होते हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि श्री ज्ञानेश कुमार राजनीतिक भेदभाव करते हैं और उनका व्यवहार भी उचित नहीं रहता तथा वह भारी संख्या में मतदाताओं का नाम काट रहे हैं जो कि लोकतान्त्रिक दृष्टि से सही नहीं माना जा सकता। परन्तु भारत में चुनाव आयुक्तों को नियुक्त करने का तो मूल विधान संविधान में था कि उन्हें राष्ट्रपति नियुक्त करेंगे परन्तु उन्हें हटाने का कोई सरल तरीका नहीं था अतः यह विचारा गया कि उन्हें भी संसद की सर्वोच्चता को देखते हुए केवल महाभियोग लाकर ही हटाया जा सकता है किन्तु 2023 में मोदी सरकार ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति सम्बन्धी जो विधान बनाया उसके अनुसार चुनाव आयुक्त को भी पदमुक्त करने की प्रणाली वही होगी जो कि किसी सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की होती है।
इसके अनुसार चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए जो महाभियोग प्रस्ताव संसद में आयेगा उस पर लोकसभा के कम से कम 100 और राज्यसभा के कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर होने चाहिएँ। विपक्ष में तृणणूल कांग्रेस की ओर से एसे प्रस्ताव को तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की गई जिस पर लोकसभा व राज्यसभा के मिला कर 193 सांसदों ने हस्ताक्षर कर दिये अतः यह प्रस्ताव जो कि राष्ट्रपति को सम्बोधित है लोकसभा सचिवालय को सौप दिया गया है । यदि यह प्रस्ताव लोकसभा में विचारार्थ स्वीकृत कर लिया जाता है तो अध्यक्ष एक तीन सदस्यीय जांच समिति गठित करेंगे , यह समिति अपनी जांच के आधार पर आरोप पत्र अध्यक्ष को सौंपेगी । इसके बाद अध्यक्ष उसे सदन में रखेंगे और यदि जांच में पाया जाता है कि आरोपों में सत्यता है तो वह इसे बहस कराने के लिए पेश कर देंगे परन्तु प्रस्ताव पारित होने के लिए सदन के दो तिहाई बहुमत की जरूरत इस शर्त के साथ होगी कि मतदान के समय सदन में सदस्यों की उपस्थिति उसकी कुल शक्ति के 50 प्रतिशत से ज्यादा हो। परन्तु विपक्ष की यह सारी कवायद केवल सांकेतिक ही होगी क्योंकि संसद के दोनों सदनों में सत्ताधारी भाजपा के एनडीए समूह का पूर्ण बहुमत है। अभी दो दिन पहले ही लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव गिर चुका है, परन्तु यह भी हकीकत है कि लोकतन्त्र में सांकेतिक कृत्यों का कम महत्व नहीं होता क्योंकि इस प्रणाली में जन अवधारणा की महत्ता सबसे ऊपर मानी जाती है।

Shera Rajput