ईरान की सशर्त सदाशयता

पश्चिम एशिया में चल रहे ईरान व इजराइल-अमेरिका युद्ध के 15वें दिन में पहुंच जाने के बाद अब यह लगने लगा है कि इसकी विभीषिका से दुनिया की पूरी अर्थव्यवस्था पर गंभीर संकट आ सकता है परन्तु इसके साथ ही भारत को लेकर ईरान की तरफ से जो संकेत आये हैं उनसे लगता है कि वे दोनों देशों के बीच रहे ऐतिहासिक व सांस्कृतिक सम्बन्धों की ऊर्जा से निस्तेज नहीं हुए हैं। दुनिया जानती है कि इस युद्ध के शुरू होने के बाद ईरान ने अपने समुद्री मार्ग के होर्मुज जलडमरू मध्य की नाकेबन्दी इस प्रकार कर दी है कि इससे दुनिया के वाणिज्यिक जलपोत गुजर ही न सकें जबकि इस संकरे रास्ते से दुनिया के 20 प्रतिशत कच्चे पेट्रोलियम तेल का यातायात होता है। इसमें भारत का 50 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल व 80 प्रतिशत प्राकृतिक गैस का आयात भी शामिल है। अतः हमारे देश के लिए यह जलडमरू मध्य बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि हम अपनी कुल पैट्रोल व डीजल जरूरत की भरपाई 80 प्रतिशत से अधिक तेल आयात करके ही करते हैं जबकि गैस की आपूर्ति इससे भी ऊपर आयात करके की जाती है।
भारत में ईंधन गैस की कमी होने की मुख्य वजह यही है कि इस जलडमरू मध्य के रास्ते से भारतीय मालवाहक पोत नहीं गुजर पा रहे हैं परन्तु कल ईरान ने इस समुद्र में खड़े दो भारतीय मालवाहक पोतों शिवालिक व नन्दा देवी को इससे गुजरने की अनुमति दे दी। इन पोतों पर ईंधन गैस ही लदी हुई है। ईरान की इस सदाशयता को हमें युद्ध से उपजे पारिस्थितिक सन्दर्भों में ही देखना होगा और तद्नुरूप अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए रणनीति तय करनी होगी। पिछले दिनों प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति श्री मसूद पेजेशकियन से भी फोन पर वार्ता की जबकि भारत के विदेश मन्त्री श्री एस. जयशंकर ईरानी विदेश मन्त्री से श्री अरागची से अब तक चार बार फोन पर वार्ता कर चुके हैं। इससे पता चलता है कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक गर्मजोशी जारी है। इस गर्मजोशी को भारत में ईरान के राजदूत श्री मोहम्मद फथाली ने बहुत खूबसूरत शब्दों में व्यक्त किया है जिनसे ध्वनित होता है कि ईरान भारत के साथ अपने पूर्व सम्बन्धों को देखते हुए दोस्ती बरकरार रखना चाहता है और आपसी समीकरणों को मजबूत करना चाहता है। श्री फथाली से एक समारोह के बाद यह पूछा गया था कि क्या ईरान होर्मुज जलडमरू मध्य से गुजरने की भारतीय पोतों को इजाजत देगा तो उन्होंने उत्तर दिया कि भारत हमारा मित्र देश है क्योंकि हमारे हित एक समान हैं और हमारा विश्वास भी एक समान है। हम दोनों देश आम नागरिकों की तकलीफों के प्रति संवेदनशीलता रखते हैं अतः आप भविष्य में जल्दी ही खुश खबरी सुन सकते हैं।
यह सच है कि अमेरिका और इजराइल ने मिलकर विगत 28 फरवरी को यह युद्ध ईरान पर तब थोपा है जब जिनीवा में ओमान की मध्यस्थता में उसकी अमेरिका के साथ शान्तिवार्ता चल रही थी लेकिन दूसरी तरफ भारत के ईरान व इजराइल और अमेरिका से भी बहुत घनिष्ठ व रणनीतिक रिश्ते हैं अतः भारत ने इस युद्ध से दूरी बना कर रखी और घोषणा की कि भारत किसी भी समस्या का हल युद्ध से नहीं, बल्कि शान्तिपूर्ण ढंग से निकालने का पक्षधर है। इसके साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति श्री डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के खिलाफ जिस लक्ष्य को लेकर युद्ध शुरू किया वह ईरान में सत्ता परिवर्तन के साथ उसे परमाणु हथियारों से महरूम रखना था। इस मामले में यह भी विचारणीय है कि ईरान परमाणु अप्रसार सन्धि पर हस्ताक्षर करने वाला देश है अतः परमाणु बम बनाने की उसकी गतिविधियों पर अन्तर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की पैनी नजर रहती है और वह उसके परमाणु कार्यक्रम की जांच करने के लिए भी स्वतन्त्र रहती है। इसलिए ईरान ने भारत से कहा बताते हैं कि वह ब्रिक्स देशों के संगठन के वर्तमान अध्यक्ष होने के नाते उस पर किये गये अमेरिकी हमले की निन्दा करे और ईरान द्वारा अपने देश में भारतीय नागरिकों की की जा रही सुरक्षा के लिए धन्यवाद प्रस्ताव भी पारित करे। ब्रिक्स संगठन का अब ईरान भी सदस्य है। उसके अलावा मिस्र, इथोपिया, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात व इंडोनेशिया भी इसके सदस्य हैं। ईरान के इस सुझाव का मुख्य मक्सद लगता है कि भारत उस पर किये गये अमेरिकी हमले को उसी नजर से देखे जिस प्रकार उसने 2003 में इराक पर हुए अमेरिकी फौजी हमले को देखा था। 2003 में भारत में भाजपा नीत एनडीए की वाजपेयी सरकार थी जिसने इराक में अमेरिकी फौजों के प्रवेश पर संसद के दोनों सदनों में निन्दा प्रस्ताव पारित किया था। उस समय राज्यसभा में इस मुद्दे पर अंग्रेजी में रखे गये प्रस्ताव में लिखे शब्द ‘डिप्लोर’ पर विपक्ष में बैठी कांग्रेस पार्टी ने घोर आपत्ति करते हुए कहा था कि इसके स्थान पर ‘कंडेम’ शब्द का प्रयोग होना चाहिए। अंग्रेजी का वाक्य यह था कि ‘इंडिया डिप्लोर द अमेरिकन इनवेजन इन इराक’। बाद में तीन दिन तक चली लम्बी बहसबाजी के बाद राज्यसभा में भी लोकसभा की भांति हिन्दी में ही निन्दा प्रस्ताव पारित हुआ था लेकिन विश्व के वर्तमान हालात आज 2003 जैसे नहीं हैं क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति अपने देश की सामरिक व आर्थिक ताकत के बूते पर पूरी विश्व व्यवस्था को ही बदलने के लिए आमादा दिखाई पड़ते हैं। इससे पूरी दुनिया के विभिन्न देशों के बीच आपसी रिश्तों के समीकरणों पर भी परोक्ष प्रभाव पड़ रहा है। अतः भारत को बहुत गंभीरता के साथ अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद अपना रुख तय करना होगा। निश्चित रूप से आजादी मिलने के बाद से अब तक भारत किसी भी एक विशेष महाशक्ति के गुट में नहीं रहा है अतः 2006 के करीब ब्रिक्स संगठन के बनने का लक्ष्य भी यही था कि 1990 में सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया एकल ध्रुवीय न रहकर बहुध्रुवीय बनने की ओर अग्रसर इस प्रकार रहे कि इसमें बदलती विश्व परिस्थियों के अनुसार शक्ति सन्तुलन बना रहे।

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