ईरान के एक प्रमुख मजहबी नेता की हत्या, जिसे आम तौर पर लोगों की स्मृति में रुहोल्लाह खोमैनी जैसे व्यक्तित्वों से जोड़कर देखा जाता है, कई बार ईरान की सीमाओं से बाहर भी विरोध-प्रदर्शनों की वजह बनती रही है। भारत के कुछ हिस्सों में भी ऐसी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलती रही हैं। हाल में अमेरिका-इजराइल की संयुक्त कार्रवाई में खामेनेई की हत्या के बाद भारत के कई हिस्सों में विरोध-प्रदर्शन हुए। ये घटनाएं केवल विदेश नीति या अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का सवाल नहीं हैं।
वे भारतीय मुसलमानों की राजनीतिक सोच, पहचान, मजहबी भावनाओं और भारत की धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के बीच मौजूद जटिल रिश्तों को भी सामने लाती हैं। वैश्विक इस्लामी व्यक्तित्वों के प्रति भावनात्मक जुड़ाव अक्सर राष्ट्रीय सीमाओं से परे चला जाता है। लेकिन इस प्रवृत्ति को भारत के संवैधानिक ढांचे, ऐतिहासिक अनुभवों और पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीति के संदर्भ में समझना जरूरी है।
इतिहास की परछाइयां: भारतीय मुसलमानों में मजहबी प्रेरणा से होने वाली राजनीतिक लामबंदी की जड़ें खिलाफत आंदोलन (1919–1924) तक जाती हैं। यह आंदोलन भारतीय राजनीति में पैन-इस्लामिक भावनाओं के प्रभाव का एक महत्वपूर्ण उदाहरण था। अली बंधुओं जैसे नेताओं ने बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शनों का नेतृत्व किया और उस दौर में हिंदू-मुस्लिम एकता की भावना को मजबूत करने के लिए महात्मा गांधी भी कुछ समय तक इस आंदोलन के साथ खड़े रहे। हालांकि आलोचकों का मानना है कि खिलाफत आंदोलन ने मजहबी निष्ठा और राष्ट्रीय हित के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया।
उनके अनुसार इस आंदोलन ने भारतीय राजनीति में आस्था-आधारित लामबंदी की एक ऐसी मिसाल स्थापित की, जिसका असर आगे चलकर भी दिखाई दिया। इसी दृष्टिकोण से आज ईरान या पश्चिम एशिया की घटनाओं पर होने वाले विरोध-प्रदर्शनों को कभी-कभी पैन-इस्लामिक एकजुटता के विस्तार के रूप में देखा जाता है, जहां मजहबी जुड़ाव क्षेत्रीय राष्ट्रवाद से ऊपर दिखाई देता है लेकिन ऐतिहासिक तुलना करते समय यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि खिलाफत आंदोलन औपनिवेशिक शासन के दौर में हुआ था, जबकि आज का भारत एक स्वतंत्र, संप्रभु और धर्मनिरपेक्ष गणराज्य है।
फिर भी कुछ विश्लेषकों का मानना है कि मजहबी पहचान को राष्ट्रवाद से ऊपर रखने की प्रवृत्ति और राजनीतिक तुष्टिकरण की राजनीति के बीज उसी दौर में पड़े, जिनका इस्तेमाल बाद के समय में मुस्लिम समाज को संगठित करने के लिए किया गया। भारत का संविधान एक ऐसे धर्मनिरपेक्ष राज्य की कल्पना करता है जो किसी मजहब को विशेष महत्व नहीं देता और न ही किसी मजहब के प्रति भेदभाव करता है। जब मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्ग विदेश में किसी शिया मजहबी नेता की हत्या के विरोध में प्रदर्शन करते हैं तो आलोचक इसे “राष्ट्र से ऊपर मजहब” की प्रवृत्ति के रूप में देखते हैं।
उनके अनुसार यह सवाल उठता है कि किसी विदेशी मजहबी नेता के लिए भारत में इतने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन क्यों होते हैं लेकिन दूसरी ओर यह भी तर्क दिया जाता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में पहचान की अभिव्यक्ति स्वाभाविक है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को दिया गया है। विवाद तब और तीखा हो जाता है जब विरोध प्रदर्शनों को चयनात्मक माना जाता है। कुछ आलोचक पूछते हैं कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार या कश्मीरी हिंदुओं के खिलाफ हिंसा जैसे मुद्दों पर इसी तरह की व्यापक लामबंदी क्यों नहीं दिखाई देती।
ऐसी तुलना इस तर्क को मजबूत करती है कि कुछ विरोध-प्रदर्शनों के पीछे सार्वभौमिक मानवीय चिंता के बजाय मजहबी प्रतीकवाद अधिक प्रभावी होता है। हालांकि सामाजिक आंदोलनों का चरित्र हमेशा एक जैसा नहीं होता। सामूहिक लामबंदी नेतृत्व, स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों, मजहबी संबद्धताओं और मीडिया की भूमिका जैसे कई कारकों से प्रभावित होती है। इसलिए इसे केवल “राष्ट्र बनाम मजहब” के सरल द्वंद्व में बांध देना भी बौद्धिक रूप से अधूरा होगा। पैन-इस्लामवाद एक राजनीतिक और मजहबी विचारधारा है जिसका उद्देश्य 19वीं सदी के अंत में पश्चिमी औपनिवेशिक शक्तियों (ब्रिटेन, फ्रांस और रूस)के खिलाफ वैश्विक मुस्लिम समुदाय को एक मंच पर लाना था।
जमाल अल-दीन अल-अफगानी जैसे विचारकों ने इस विचारधारा को बढ़ावा दिया। उनके अनुसार इस्लाम केवल एक मजहब नहीं बल्कि एक व्यापक सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था है जो जातीय और राष्ट्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर मुसलमानों की एकता पर जोर देती है। रुहोल्लाह खोमैनी जैसे नेताओं ने भी इसी तरह का दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, जिसमें ईरानी क्रांति को दुनिया भर के मुसलमानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बताया गया। विशेष रूप से शिया समुदायों के लिए खोमैनी मजहबी नेतृत्व और पश्चिमी प्रभाव(खासकर अमेरिका)के खिलाफ प्रतिरोध के प्रतीक बन गए लेकिन इस्लामी दुनिया खुद ही गहरे सांप्रदायिक और भू-राजनीतिक विभाजनों से घिरी हुई है।
शिया-सुन्नी मतभेद, क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धाएं और अलग-अलग देशों के राष्ट्रीय हित किसी भी एकीकृत मुस्लिम एकता की अवधारणा को जटिल बना देते हैं। ईरान और पाकिस्तान के बीच तनाव, कई सुन्नी बहुल देशों के साथ ईरान के विवाद और ईरान-इराक युद्ध जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि मुस्लिम बहुल देश भी एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हो सकते हैं। दिलचस्प तथ्य यह भी है कि कई मौकों पर ईरान ऐसे मुस्लिम देशों के खिलाफ संघर्ष की स्थिति में रहा है जो पश्चिमी देशों, विशेष रूप से अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी रखते हैं।
कुछ विश्लेषक ऐसे प्रदर्शनों को “सभ्यताओं के टकराव” की अवधारणा के संदर्भ में भी देखते हैं। एक ओर भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी विकसित कर रहा है, वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ भी उसके ऐतिहासिक और ऊर्जा-आधारित संबंध रहे हैं। इसलिए नागरिक समाज के विरोध-प्रदर्शन को सीधे-सीधे भारत की आधिकारिक विदेश नीति से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा। लोकतंत्र में विरोध और असहमति भी राजनीतिक अभिव्यक्ति का एक हिस्सा होते हैं। यह आलोचना कि कुछ बुद्धिजीवी मजहबी आधार पर होने वाले प्रदर्शनों पर चुप रहते हैं, भारत में धर्मनिरपेक्षता को लेकर चल रही व्यापक बहस का हिस्सा है।
ईरान के एक मजहबी नेता की हत्या के विरोध में भारत में हुए प्रदर्शन अंतर्राष्ट्रीय मजहबी पहचान और संवैधानिक राष्ट्रवाद के बीच मौजूद तनाव को उजागर करते हैं। खिलाफत आंदोलन जैसे ऐतिहासिक उदाहरण हमें संदर्भ जरूर देते हैं लेकिन वे वर्तमान परिस्थितियों को पूरी तरह निर्धारित नहीं करते। जहां आलोचक इन प्रदर्शनों को राष्ट्र से ऊपर मजहब रखने की प्रवृत्ति के रूप में देखते हैं, वहीं समर्थकों का तर्क है कि लोकतंत्र में सीमाओं के पार भावनात्मक एकजुटता व्यक्त करना भी नागरिक स्वतंत्रता का हिस्सा है। वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। पैन-इस्लामिक भावनाएं, सांप्रदायिक विभाजन, भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धाएं और भारतीय मुसलमानों की बहुस्तरीय पहचान, ये सभी एक साथ मौजूद हैं।
इसलिए पूरे घटनाक्रम को केवल तुष्टिकरण या सभ्यताओं के संघर्ष के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। एक गंभीर और संतुलित विश्लेषण को भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे के भीतर मजहब, राजनीति और लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं के बीच मौजूद संबंधों को समझना होगा। यथार्थवादी दृष्टिकोण से यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में भावनाओं के साथ-साथ राष्ट्रीय हित भी महत्वपूर्ण होते हैं। भारत-ईरान संबंधों के संदर्भ में यह तथ्य उल्लेखनीय है कि कश्मीर के मुद्दे पर ईरान ने कई मौकों पर भारत के रुख से असहमति जताई है। इसलिए विदेश नीति के स्तर पर भारत को अपने रणनीतिक हितों को ध्यान में रखकर ही संतुलित रुख अपनाना होगा।


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