डीके शिवकुमार के लिए आर-पार

Summary :

‘यह कुछ तो तेरी सोहबतों का असर था कि अब जंगल में परिंदे भी मिल-जुल कर रहने लगे हैं कभी झाड़ियों में शेर छुपे होते थे यहां, अब नए दौर में हर ओर यहां इंसा ही नज़र आने लगे हैं’ जब गांधी परिवार के लाख आश्वासनों के बावजूद भी कर्नाटक के कांग्रेसी नेता व प्रदेश सरकार में उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार सीएम की कुर्सी हासिल नहीं कर पाए तो उनका विद्रोह आकार लेने लगा। भाजपा तो जैसे बस इसी मौके की ताक में थी। सबसे पहले आंध्र के पूर्व मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी डीके से मिलने बंगलुरू पहुंचे और उन्हें यह…

‘यह कुछ तो तेरी सोहबतों का असर था कि अब जंगल में परिंदे भी मिल-जुल कर रहने लगे हैं
कभी झाड़ियों में शेर छुपे होते थे यहां, अब नए दौर में हर ओर यहां इंसा ही नज़र आने लगे हैं’
जब गांधी परिवार के लाख आश्वासनों के बावजूद भी कर्नाटक के कांग्रेसी नेता व प्रदेश सरकार में उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार सीएम की कुर्सी हासिल नहीं कर पाए तो उनका विद्रोह आकार लेने लगा। भाजपा तो जैसे बस इसी मौके की ताक में थी। सबसे पहले आंध्र के पूर्व मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी डीके से मिलने बंगलुरू पहुंचे और उन्हें यह समझा पाने में कामयाब रहे कि कांग्रेस नेतृत्व सिर्फ उनका इस्तेमाल कर रहा है, (जैसे हालिया बिहार चुनाव में कांग्रेस का एक बड़ा चुनावी खर्च डीके के कंधों पर ही था) जगन के ऊपर इस वक्त मुकदमों की बाढ़ आई हुई है, सो वे महज़ दिल्ली को खुश करने व जेल जाने से बचने के लिए ही यह तमाम उपक्रम साध रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि इसके बाद डीके से संयोजन का जिम्मा येदियुरप्पा के पुत्र व कर्नाटक भाजपा के मुखिया बी.वाई. विजयेंद्र के हवाले कर दिया गया। सनद रहे कि इससे पूर्व डीके की मुलाकात भाजपा के एक बड़े नेता के साथ भी हो चुकी थी। पर डीके इस बात पर हैरान थे कि पूरी मीटिंग के दौरान नेताजी ने उनसे कोई राजनीतिक बात नहीं की, उनका हालचाल पूछा, परिवार के बारे में जानकारी ली, बच्चों के कुशलक्षेम पूछे। कुल मिलाकर डीके के लिए यह गर्मजोशी भरी एक बेहद अनौपचारिक सी मुलाकात थी। सूत्रों की मानें तो इसके बाद डीके की मुलाकात भाजपा के संगठन महामंत्री बीएल संतोष से हुई, जहां आगे के सियासी रोड मैप के बारे में विस्तार से चर्चा हुई। फिर एक दिन अचानक डीके को दिल्ली से मिलने का बुलावा आ गया।
डीके दिल्ली पहुंचे, जहां उनकी मुलाकात भाजपा के एक और बड़े नेता से आहूत थी। भाजपा के उसी नेता ने डीके को उनके धर्मसंकट से उबारते हुए कहा कि भाजपा राजनीति से काफी ऊपर है, हम कभी भी तुच्छ राजनीति की बात नहीं करते।’ फिर डीके को ऑफर दिया गया कि ‘अगर वे भाजपा के साथ आते हैं तो उन्हें केंद्र सरकार में अहम मंत्रालय से नवाजा जा सकता है और उनके भाई डीके सुरेश को भाजपा की अगुवाई वाली राज्य सरकार में डिप्टी सीएम बनाया जा सकता है।’ सनद रहे कि सुरेश बंगलुरू ग्रामीण से इस दफे का लोकसभा चुनाव हार गए थे। समझा जाता है कि डीके ने भाजपा के इस प्रस्ताव पर सोचने के लिए थोड़ा वक्त मांगा है।
सोशल मीडिया पर सरकार की नकेल
वक्त-वक्त पर सोशल मीडिया पर अपनी अनोखी सियासी बाजी​िगरी से समां बांधने वाली सरकार को इस दुधारी तलवार का लगता है बखूबी इल्म हो गया है। हाल के कुछ दिनों में सोशल डिजिटल मीडिया पर जिस तरह सरकार को सवालों के घेरे में खड़ा किया गया है, यह बात अब सर्वशक्तिमान से भी हजम नहीं हो पा रही।
नतीजन सोशल मीडिया पर नकेल कसने के इरादे से केंद्र सरकार ने आईटी नियमों में एक बड़ा संशोधन कर दिया है। अब सोशल मीडिया कंपनियों को सरकारी सूचना मिलने के तीन घंटे (कभी-कभी दो घंटे) के भीतर उस आपत्तिजनक कंटेंट को अपने प्लेटफॉर्म से हटाना होगा, जबकि सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों के लिए पहले यह समय सीमा 36 घंटे की तय कर रखी थी। यह नया नियम भारत में 20 फरवरी से लागू हो जाएगा। सनद रहे कि इस समय भारत में एक अरब से ज्यादा इंटरनेट यूजर हैं। मेटा, एक्स, गूगल जैसी कंपनियों के लिए भारत सरकार का यह नया नियम उनके गले की हड्डी बन गया है, उन्हें इस समय सीमा का पालन लगभग नामुमकिन सा लग रहा है। इन कंपनियों का कहना है कि एक लंबी प्रक्रिया के बाद (जिसमें कंटेंट का रिव्यू भी शामिल है) वे ऐसे कंटेंट को अपने संबंधित प्लेटफॉर्म से हटाते हैं। इस तरह के नियमों को लेकर ये कंपनियां पहले भी भारत सरकार के समक्ष अपना विरोध दर्ज करा चुकी हैं। कंपनियां ऐसे सरकारी नियमों को ’फ्री एक्सप्रेशन’ के लिए भी खतरे की घंटी मान रही हैं, इनका कहना है कि सरकार द्वारा कंटेंट हटाने के लिए 2-3 घंटे का वक्त दिया जाना कतई व्यावहारिक नहीं है। इस टाइमलाइन को फॉलो करना ऐसी हर कंपनी अपने लिए एक बड़ी चुनौती मान रही है। सनद रहे कि केंद्र सरकार ने अपने आईटी रूल्स 2021 में भी यह संशोधन किया है। पूर्व में भी सरकार ने अपने मनमाफिक नहीं पाए जाने पर ‘टेकडाउन’ यानी कि कंटेंट हटाने के हजारों ऑर्डर दिए थे। बीते कुछ समय में कई वामपंथी मीडिया के अकाऊंट ब्लॉक किए गए हैं, सो जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में इस सरकारी टेकडाउन की तादाद में तेज वृद्धि दर्ज हो सकती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह नया सरकारी नियम भारत को उत्तर कोरिया, ईरान, रूस और चीन के बाद दुनिया के सबसे सख्त ऑनलॉइन नियामक के रूप में प्रस्तुत कर सकता है।
असम में जीत आसां नहीं सनम
यकबयक भाजपा नेतृत्व को भी ऐसा लगा है कि ‘बोल बचन’ के उनके चैंपियन मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा अब अपनी तय लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन करने लगे हैं। सो, जब सोशल मीडिया पर उनका गोली मारने वाला पोस्ट बेतरह वायरल हो गया तो भाजपा के बड़े नेता ने इसका तगड़ा संज्ञान लिया। हिमंता से अपनी सीमा में रहने को और फौरन यह पोस्ट हटाने को कहा गया। साथ ही उन्हें यह कड़ी हिदायत दी गई कि वे ख्वामखाह ही पार्टी को ‘एंटी इंकमबेंसी’ की ओर धकेल रहे हैं, साथ ही उन्हें यह ताकीद दी गई कि वे बिलावज़ह प्रदेश के 35 फीसदी मुसलमानों को गोलबंद होने का मौका दे रहे हैं और उन्हें इस बात के लिए मजबूर कर रहे हैं कि वे एक होकर कांग्रेस के पक्ष में मतदान करें। सो, सरमा को यह बताया गया कि उनका स्टैंड ‘एंटी मुस्लिम’ के बजाए ‘एंटी घुसपैठिया’ होना चाहिए, समझा जाता है कि इसके बाद ही असम के मुख्यमंत्री ने मुसलमानों को लेकर अपनी जुबान बदल ली और मौके-बे-मौके अब बांग्लादेशी घुसपैठियों को निशाने पर ले रहे हैं।
तावड़े की फडणवीस से क्यों ठनी?
भाजपा महासचिव विनोद तावड़े की संगठन दक्षता का भाजपा शीर्ष भी कायल है। शायद यही वज़ह है कि बिहार चुनाव में उनके चमकदार प्रदर्शन के इनाम के तौर पर इस बार उन्हें केरल चुनाव में एक महत्ती जिम्मेदारी सौंपी गई है। जानकार यह भी बताते हैं कि नितिन नबीन की नई टीम में भी उनके राष्ट्रीय महामंत्री का दर्जा बरकरार रहने वाला है। पर कुछ तो वज़ह है कि तावड़े के माथे पर शिकन है, उनके मन में कुछ उलझन है और वे पिछले कुछ समय से कुछ ठगा सा महसूस कर रहे हैं। भाजपा से जुड़े विश्वस्त सूत्र इसके कारणों पर से पर्दा हटाते हुए बताते हैं कि हालिया महाराष्ट्र के निकाय चुनाव में तावड़े ने अपने कोई 40 करीबी लोगों की सूची तैयार की थी जिन्हें वे मुंबई से लेकर पुणे के स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी की ओर से उम्मीदवारी दिलवाना चाहते थे। तावडे़ जब अपनी लिस्ट लेकर नई दिल्ली पहुंचे तो भाजपा नेतृत्व की ओर से उन्हें बताया गया कि इस बार महाराष्ट्र में टिकटों पर फैसला देवेंद्र फडणवीस का ही आखिरी होगा, सो यह लिस्ट मुंबई जाकर उन्हें सौंप दीजिए, तावड़े ने वैसा ही किया। पर जब उम्मीदवारों के नामों की घोषणा हुई तो उसमें तावड़े की लिस्ट से सिर्फ एक ही व्यक्ति को टिकट मिला। तावड़े भागे-भागे दिल्ली आए, बोले-मेरी लिस्ट में 15-16 लोग तो ऐसे थे कि पार्टी को उनसे बेहतर कोई उम्मीदवार ही नहीं मिल सकता है, वे जिताऊ कैंडिडेट थे, उनमें से एक तो पुणे से 2 बार के विजयी सभासद थे, उनका भी टिकट काट दिया गया।
दिल्ली ने इस पूरे मामले से हाथ झाड़ लिए, कहा-’हम हर छोटी बातों में हस्तक्षेप नहीं करते, जिनको जो जिम्मेदारी सौंपी गई है हम चाहते हैं वे बिना कोई दबाव इसका निर्वहन करें, सो आपको जो भी कहना है देवेंद्र से बात करें और हां रही बात आपकी, हम आपका पूरा ध्यान रख रहे हैं, आपको विधान परिषद में लेकर आए, राष्ट्रीय महामंत्री बनाया और अब आपको राज्यसभा देने की सोच रहे हैं।’ कहते हैं तावड़े थक हार कर अपनी मनुहार लेकर फिर से देवेंद्र फडणवीस के पास पहुंचे, पर फडणवीस ने यह कहते हुए उन्हें टरका दिया-’ किसी भी उम्मीदवार को लेकर मेरा कोई निजी पूर्वाग्रह नहीं, हमने जमीनी सर्वेक्षण को ध्यान में रखते हुए टिकट बांटे हैं, जिनका भी नाम सूची में सबसे ऊपर आया है टिकट उन्हीं को मिला है।’ अब तावड़े के पास कहने के लिए बचा क्या था।
…और अंत में
बांग्लादेश चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की बंपर जीत से यकीनन भारत की पेशानियों पर बल पड़े होंगे, क्योंकि बीएनपी के सिरमौर तारिक रहमान उसी खालिदा जिया के बेटे हैं जिसके शासन काल में (2001-2006 के बीच) भारत व बांग्लादेश के रिश्तों में सबसे ज्यादा खटास आई थी।
इस वक्त भारत व बांग्लादेश के नए पनपते रिश्तों में सबसे बड़ी रुकावट वहां की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ही हैं, तारिक खुद नहीं चाहते कि हसीना भारत में रहकर उकसावे वाली बयानबाजी करें, यही वज़ह है कि उनके प्रत्यार्पण की मांग जोर पकड़ती जा रही है। भारत कनेक्टिविटी परियोजनाओं को हर हाल में जारी रखना चाहता है, जिसके अंतर्गत असम, मेघालय और त्रिपुरा से सिलहट और ढाका से जोड़ने का नेटवर्क शामिल है। इस परियोजना के एक बड़े हिस्से को अडानी की कंपनी पूरा कर रही है, शेष एलएंडटी व एरकॉन भी इस परियोजना की हिस्सा है।

त्रिदीब रमण