‘जय श्री बांके बिहारी लाल की’

Summary :

अयोध्या में जब नवनिर्मित श्री राम जन्मभूमि मन्दिर के चन्दे व चढ़ावे में चोरी का मामला प्रकाश में आया था तो देशभर की केवल हिन्दू जनता ही नहीं बल्कि अन्य धर्मों के अनुयायी नागरिक भी स्तब्ध रह गये थे क्योंकि राम मन्दिर निर्माण आन्दोलन को भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय आन्दोलन कहा था और इसके लिए विश्वभर के हिन्दुओं से चन्दा जमा किया था परन्तु श्रीराम मन्दिर निर्माण से लेकर इसमें प्राण प्रतिष्ठा हो जाने के बाद जिस तरह भूमि घोटाले प्रकाश में आये और चढ़ावे में चोरी की प्रक्रिया उजागर हुई उससे भारत की धर्म प्राण जनता हैरत में…

अयोध्या में जब नवनिर्मित श्री राम जन्मभूमि मन्दिर के चन्दे व चढ़ावे में चोरी का मामला प्रकाश में आया था तो देशभर की केवल हिन्दू जनता ही नहीं बल्कि अन्य धर्मों के अनुयायी नागरिक भी स्तब्ध रह गये थे क्योंकि राम मन्दिर निर्माण आन्दोलन को भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय आन्दोलन कहा था और इसके लिए विश्वभर के हिन्दुओं से चन्दा जमा किया था परन्तु श्रीराम मन्दिर निर्माण से लेकर इसमें प्राण प्रतिष्ठा हो जाने के बाद जिस तरह भूमि घोटाले प्रकाश में आये और चढ़ावे में चोरी की प्रक्रिया उजागर हुई उससे भारत की धर्म प्राण जनता हैरत में रह गई क्योंकि इससे उसकी आस्था पर सीधा प्रहार हुआ था। भारत में सदियों पुरानी परंपरा है कि मन्दिरों में जहां धनी लोग दान देकर समाज के प्रति अपनी सेवा भावना को व्यक्त करते हैं वहीं सामान्य जनता अपनी सामर्थ्य के अनुसार ईश्वर के श्री चरणों में अपना योगदान देकर स्वयं को धन्य समझती है।
भारत में यह परम्परा निरर्थक ही नहीं है कि पुराने सेठों व व्यापारियों के बही खातों में दर्ज होने वाले वार्षिक लाभ में कुछ पैसों या आनों की पत्ती भगवान के नाम की रहती थी जिसे धर्मखाता कहा जाता था। इसमें मुख्य भाव ईश्वर अर्पण के जरिये समाज सेवा का ही रहता था क्योंकि बड़े-बड़े प्रतिष्ठित मन्दिरों में दीन-दुखियों की सेवा के लिए विभिन्न प्रयोजन जैसे मुफ्त भोजन कराने से लेकर विद्यालय स्थापित तक करने के काम किये जाते थे। अतः प्रतिष्ठित मन्दिरों में दिये गये दान पर अन्तिम अधिकार सुविधाओं से वंचित धर्म प्राण समाज का ही रहता था परन्तु भौतिक प्रगति के अंधे वर्तमान समाज ने हमें आज इतना स्वार्थी बना दिया है कि हम भगवान को अर्पित चढ़ावे में भी चोरी कर रहे हैं और खुद के धार्मिक होने का ढोंग रच रहे हैं। भारतीय समाज में मन्दिर समूचे समाज की सम्पत्ति माने जाते रहे हैं, बेशक मन्दिरों का निर्माण बड़े-बड़े राजा-महाराजा व धन्ना सेठ करवाते रहे हों परन्तु उन्होंने कभी भी इनसे होने वाली आय पर अपना अधिकार नहीं जमाया। यह बात दीगर है कि मन्दिरों की सेवा में लगे हुए पुजारियों व सेवादारों पर आय के रखरखाव की पूरी जिम्मेदारी हुआ करती थी परन्तु वे भी निर्मल मन से अतिरिक्त धन का उपयोग समाजसेवा करने में लगाते थे। इसके लिए मन्दिरों में बाकायदा सलाहकार परिषदें हुआ करती थीं, जिनका प्रबन्धन राजगुरुओं या राजपुरोहितों के हाथ में हुआ करता था। मन्दिरों में नियुक्त पुजारियों का मुख्य कार्य ठाकुर जी की विधि-विधान से सेवा करना ही हुआ करता था। यहां तक कि समाज के धनाड्य वर्ग द्वारा जो मन्दिर जमीन दान आदि करके बनाये जाते थे, उन्हें भी कानूनी तरीके से सामाजिक सम्पत्ति घोषित किया जाता था और पूजा आदि करने के लिए पुजारी के नाम की घोषणा मिल्कियत के कागजात में दर्ज होती थी। इसके चलते पुजारी की अगली पीढि़यां भी मन्दिरों में पूजा-पाठ करने का अधिकार पाती थीं लेकिन हम देख रहे हैं कि भारत के विभिन्न मन्दिरों में चढ़ावे में हेराफेरी की घटनाएं सामने आ रही हैं जिनमें श्री वृन्दावन के बांके बिहारी मन्दिर का नाम भी आ रहा है।
इस मन्दिर को इसकी स्थापना से लेकर अब तक इसे स्वामी हरिदास के वंशजों की निजी सम्पत्ति बताया जा रहा है जो कि भारत की धार्मिक परंपराओं के अनुकूल नहीं है कि क्योंकि स्वामी हरिदास ने इसकी स्थापना धर्म प्राण जनता के कल्याण के लिए ही की थी। यह जनकल्याण की भावना ही मन्दिर के निर्माण के पीछे सदियों पूर्व रही थी क्योंकि गोस्वामी हरिदास ने इसे कभी अपनी मिल्कियत नहीं माना। मन्दिर उन्हीं श्री बांके बिहारी के नाम से प्रसिद्ध हुआ जिनकी मूर्ति उन्हें भगवत कृपा से प्राप्त हुई थी। विवाद यह है कि मन्दिर में चढ़ने वाले चढ़ावे में कुछ सेवायत हेराफेरी कर लेते हैं और चढ़ावे को मन्दिर में रखे हुए दानपात्र तक पहुंचने ही नहीं देते। मन्दिर को मिलने वाले दान का मामला सर्वोच्च न्यायालय में चल रहा है। न्यायालय पिछले वर्ष अगस्त महीने में ही चढ़ावे या दान के रखरखाव के प्रबन्धन के लिए एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति गठित कर चुका है। इस प्रबन्ध समिति ने इस बारे में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपनी वर्तमान स्थिति रिपोर्ट (स्टेटस रिपोर्ट) पेश की जिसमें उसने बताया है कि लोगों द्वारा चढ़ाये गये चढ़ावे को बीच में ही मन्दिर के कुछ सेवायत अपने पास रख लेते हैं। इसी वजह से न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री सूर्यकान्त की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने नया आदेश जारी किया है कि भक्तों द्वारा चढ़ाया गया चढ़ावा सर्व प्रथम मन्दिर के दानपात्र में पहुंचना चाहिए अथवा मन्दिर के डिजिटल खाते में जमा होना चाहिए और इसके बाद ही मन्दिर के भंडारी को प्रसाद आदि के वितरण के लिए उसमें से निर्धारित धन दिया जाना चाहिए। इससे इसी बात की पुष्टि होती है कि श्रद्धालु या भक्तजन जो भी चढ़ावा श्री बांके बिहारी जी को चढ़ाते हैं सर्व प्रथम वह उनके श्री चरणों में ही पहुंचना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश इसलिए और भी अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि भंडारी द्वारा भक्तों के चढ़ावे से भोग आदि के लिए आवश्यक धन लेने के अधिकार को पहले सिविल कोर्ट ने मान्य करार दिया था। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों की राय है कि पहले सारा धन मन्दिर के दानपात्र या बैक खाते में जाना चाहिए और फिर उसमें से भंडारी को आवश्यक धनराशि दी जानी चाहिए। इससे से भी यही सिद्ध होता है कि भक्त और भगवान के बीच किसी तीसरे प्राणी की उपस्थिति अनावश्यक है परन्तु मन्दिर की व्यवस्था देखने के लिए प्रबन्ध समिति का होना भी जरूरी होता है लेकिन वह भी मन्दिर की मालिक नहीं हो सकती अन्ततः धर्म प्राण जनता का ही मन्दिर पर पहला अधिकार होता है।

Aditya Chopra

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