रोजगार बढ़ा लेकिन आईटी क्षेत्र दबाव में

किसी भी देश में युवाओं के लिए रोजगार एक आधारभूत जरूरत होती है और इसी आधार पर देश की समृद्धि का मूल्यांकन भी होता है। पिछले दिनों जारी सालाना सावधिक श्रम शक्ति सर्वे (पीएलएफएस) के जुलाई-जून 2022-23 के आंकड़े दिखाते हैं कि समग्र बेरोजगारी की दर 3.2 फीसदी के साथ छह वर्षों के निचले स्तर पर पहुंच गई है। अन्य चीजों के समान रहते बेरोजगारी दर में गिरावट और श्रम शक्ति भागीदारी दर में इजाफा यह बताता है कि अर्थव्यवस्था में रोजगार तैयार हो रहे हैं। यह एक आशावादी तस्वीर है। भारत की बड़ी आबादी को रोजगार आधारित अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाना होगा। भारत की आर्थिक तरक्की का आधार आईटी सैक्टर भी है। आईटी सैक्टर की आधारभूत समस्याओं को दूर करके इसके दम पर भारत दुनिया में अपनी स्थिति को मजबूत कर सकता। आईटी के दम पर भारतीय मेघा का लोहा दुनिया ने माना है और भारत काे इसको मजबूत करने पर ध्यान देना होगा। भारतीय संस्थानों में योग्य अध्यापकों और फैकल्टी का प्रावधान करके योग्य आईटी पेशेवरों को दुनिया के सामने पेश  करना हाेगा ताकि आईटी क्षेत्र में हमारी धमक बनी रहे। महामारी कोरोना के बाद सबसे बड़ी चुनौती यही थी ​िक देश में रोजगार के अवसर कैसे पैदा हों। महामारी के बाद अर्थव्यवस्था के सभी सैक्टर धीरे-धीरे पटरी पर लौट आए और वातावरण फिर से सुखद हो गया।
15 वर्ष से अधिक आयु के लोगों के लिए श्रम शक्ति भागीदारी की दर 2017-18 के 49.8 फीसदी से बढ़कर ताजा सर्वेक्षण में 57.9 फीसदी हो गई है। वर्तमान साप्ताहिक स्तर पर भी आंकड़ों में सुधार हुआ है। उदाहरण के लिए गैर कृषि क्षेत्रों की बात करें तो असंगठित माने जाने वाले प्रोपराइटरी और साझेदारी सेटअप में रोजगारशुदा लोगों का प्रतिशत 2020-21 के 71.4 फीसदी से बढ़कर ताजा सर्वेक्षण में 74.3 फीसदी हो गया है। हालांकि हालात में कुछ सुधार हुआ है लेकिन करीब 60 फीसदी कर्मचारियों के पास अपने काम का कोई लिखित अनुबंध नहीं है। असंगठित क्षेत्र के रोजगार आमतौर पर छोटे उपक्रमों में हैं जहां बड़े पैमाने पर काम नहीं होता है। नतीजतन वेतन भी काफी कम होता है। भारत में रोजगार निर्माण की बात करें तो कई दीर्घकालिक मसले हैं और ये गुणवत्ता और मात्रा दोनों क्षेत्रों में हैं।
रोजगार की गुलाबी तस्वीर के बीच आईटी सैक्टर दबाव में नजर आता है। इसे बाजार की घटनाओं, दूसरी तिमाही के नतीजों और आय अनुमान में कटौती के साथ-साथ नौकरियां देने के रुझानों में भी महसूस किया जा सकता है। कंपनियों के प्रबंधन सतर्क हैं और वित्त वर्ष 2024-25 में मांग में सुधार की उम्मीद है।
कर्मचारियों के रोजगार की बात करें तो देश की तीन बड़ी आईटी कम्पनियों ने बीते छह महीनों में कुल मिलाकर 25,000 कर्मचारियों की कमी की गई। इन कम्पनियों ने अपने राजस्व अनुमान में भी कटौत की है। इन्फोसिस और एचसीएल टेक ने वित्त वर्ष 24 के लिए राजस्व वृद्धि के अनुमान में कटौती की है। बाजार कदमों की बात करें तो निफ्टी आईटी सूचकांक पिछले महीने के दौरान 4.6 फीसदी कम हुआ। वैश्विक एक्सचेंजों पर शीर्ष 25 वैश्विक टेक कंपनियों के बाजार पूंजीकरण में जुलाई-सितंबर में 600 अरब डॉलर की कमी आई। कमजोर आर्थिक गतिविधियों और उच्च ब्याज दरों के बावजूद तकनीकी कंपनियों के शेयर आर्टिफिशिनल इंटेजिलेंस के क्षेत्र में हुए ​विकास के कारण तेज हुए।
वृद्धि की बात करें तो उसमें विनिर्माण, स्वास्थ्य सेवा और ऊर्जा क्षेत्र महत्त्वपूर्ण हैं जबकि बैंकिंग, वित्तीय सेवा और बीमा आदि क्षेत्रों के साथ उच्च प्रौद्योगिकी, दूरसंचार और खुदरा क्षेत्र में कारोबार स्थिर है।
मंदी चक्रीय कारणों से है लेकिन इसका कुछ हिस्सा ढांचागत भी हो सकता है। कई कंपनियों ने डिजिटलीकरण पूरा कर लिया है या वे उसके करीब हैं। आईटी सेवा उद्योग को शायद राजस्व के नए स्रोत तलाश करने होंगे। वृहद आर्थिक नतीजों की बात करें तो आईटी क्षेत्र में कमजोर गतिविधियां ऐसे समय में सेवा निर्यात आय को प्रभावित कर सकती हैं जब कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहने की आशंका है जिससे आयात बिल पर बोझ बढ़ेगा।
दूसरी ओर देश की मुद्रास्फीति भी देखनी होगी ताकि अन्तर्राष्ट्रीय दायित्व से बचा जा सके। कृषि के क्षेत्र में आशतीत सफलता से आयात-निर्यात में संतुलन की स्थिति बन सकती है। रोजगार के अवसर में तेजी से वृद्धि भी सम्भव है और इसी कारण 2030 तक शीर्ष-3 अर्थव्यवस्था वाला देश बन जाएगा।

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