केरला से केरलम् तक का सफर

स्वतन्त्र भारत में स्थानों का नाम बदलने की एक खासी परंपरा और ताजा इतिहास रहा है जिसकी वजह मूल रूप से यह रही है कि भारत के लगभग एक हजार वर्ष लम्बे समय तक परतन्त्र रहने के कारण यहां विदेशी शासन की छाप रही। इसमें से यदि हम मुस्लिम आक्रान्ताओं के दौर-ए-हुकूमत को छोड़ भी दें तो अंग्रेजों के दो सौ वर्ष के शासन के दौरान इस देश के प्रमुख सांस्कृतिक व मूल एेतिहासिक स्थानों के नाम उनकी अपनी सुविधानुसार बदले गये। आजादी मिलने पर हमने इस तरफ ध्यान तो दिया मगर कुछ एेसे स्थानों को छोड़ दिया जिनका सम्बन्ध भारत की आधारभूत सांस्कृतिक विविधता के उन अवयवों से जुड़ता था जिसकी वजह से यह देश विभिन्न संस्कृतियों का समागम स्थल बना था।
इस सिलसिले में पहली आवाज दक्षिण भारत के राज्य तमिलनाडु से उठी थी और आन्ध्र प्रदेश का गठन हुआ था। उसके बाद उत्कल से जहां उड़ीसा का गठन हुआ और 1967 तक 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद नाम बदले पर विराम लगा रहा परन्तु स्वतन्त्र भारत में आज के तमिलनाडु राज्य को 1967 तक ‘मद्रास’ के नाम से जाना जाता था परन्तु इस वर्ष हुए आम चुनावों में राज्य विधानसभा में पहली बार क्षेत्रीय पार्टी द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम को अपार सफलता मिली और इसकी सरकार बनी जिसकी कमान स्व. सी. अन्नादुरै के हाथ में थी। उन्होंने अपने राज्य का नाम मद्रास से बदल कर तमिलनाडु करने का प्रस्ताव विधानसभा में पारित कराया जिसे तत्कालीन केन्द्र सरकार ने स्वीकृति प्रदान दी। तमिलनाडु के बाद 70 के दशक में दक्षिण के ही एक अन्य राज्य वर्तमान में कर्नाटक का नाम ‘मैसूर’ से बदल कर कर्नाटक किया गया। यह कार्य कांग्रेस पार्टी के ही नेता रहे स्व. देवराज अर्स ने किया। उहोंने क्षेत्रीय सांस्कृतिक अस्मिता के मुद्दे पर अपने राज्य का नाम बदला। केन्द्र की तत्कालीन सरकारों ने राज्य के लोगों की अपेक्षाओं को ध्यान में रखते हुए अपनी ओर से स्वीकृति देने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई। इसके बाद जब 2000 में केन्द्र में वाजपेयी सरकार ने तीन राज्यों उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश व बिहार का विभाजन किया तो तीन नये राज्यों क्रमशःउत्तरांचल, छत्तीसगढ़ व झारखण्ड का उदय हुआ। मगर 2007 में उत्तरांचल के लोगों की इच्छा को देखते हुए इस राज्य का नाम बदल कर उत्तराखंड किया गया। इसके बाद लगभग आठ वर्ष पहले ही उड़ीसा राज्य का नाम अाधिकारिक तौर पर ओडिशा किया गया। मगर इन प्रमुख राज्यों का नाम बदले जाने के साथ ही देश के प्रमुख महानगरों के नामों में भी परिवर्तन हुए हैं जैसे बम्बई का नाम बदल कर 1995 में मुम्बई किया गया और 2001 में कलकत्ता का नाम कोलकाता किया गया। इसके साथ ही तमिलनाडु की राजधानी मद्रास का नाम भी तमिल संस्कृति के प्रादुर्भाव को देखते हुए बदल कर चेन्नई कर दिया गया। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश में भी कई शहरों के नाम बदले गये जिनमें सबसे प्रमुख नाम इलाहाबाद व फैजाबाद हैं। इलाहाबाद का नाम प्रयागराज किया गया और फैजाबाद का अयोध्या। इसी क्रम में आठ वर्ष पहले से प. बंगाल की ममता सरकार ने अपने राज्य का नाम बदल कर ‘बांग्ला’ किये जाने का प्रस्ताव केन्द्र सरकार के पास भेज रखा है। इसी सिलसिले में पहले 2023 में और फिर 2024 में केरला राज्य की वामपंथी सरकार ने विधानसभा से प्रस्ताव पारित करा कर केन्द्र सरकार के पास भेजा कि उनके प्रदेश का नाम ‘केरलम्’ कर दिया जाये। यह प्रस्ताव तभी से केन्द्र के विचाराधीन था जिसे अब मोदी सरकार ने अपनी सहमति देकर वापस राज्य विधानसभा की स्वीकृति के लिए भेज दिया है। इसके स्वीकार हो जाने पर संसद इस पर अपनी मुहर लगा कर इसे राष्ट्रपति की अनुमति के लिए भेज देगी और इसके बाद से केरला आधिकारिक रूप से ‘केरलम्’ कहलाया जाने लगेगा। भारत में स्वतन्त्रता के बाद राज्यों के पुनर्गठन का काम 1956 में किया गया था। इसके लिए तत्कालीन प. नेहरू की सरकार ने बाकायदा एक आयोग का गठन किया था जिसने यह पाया कि इस देश में राज्यों के गठन का आधार केवल भाषा ही हो सकती है। अतः एक जैसी भाषा का प्रयोग करने वाले क्षेत्रों का समागम करके 1 नवम्बर 1956 को 15 राज्यों का गठन किया गया। केरल राज्य भी इससे पहले त्रावनकोर, कोच्चि व मालाबार के इलाकों में विभाजित था हालांकि 1949 में कोच्चि व त्रावनकोर का समागम हो गया था परन्तु राज्य पुनर्गठन आयोग ने पाया कि इन तीनों ही क्षेत्रो में मलयालम भाषा बोली जाती है अतः इन तीनों को मिला कर उसने ‘केरला’ राज्य का गठन किया। वास्तव में मलयालम भाषा में अलम् शब्द का अर्थ भू भाग से होता है। पूरे राज्य में नारियल के पेड़ों की अधिकता है अतः मलयाली भाषा के अनुसार नारियल के पेड़ों की धरती इसका तात्पर्य हुआ लेकिन नाम भी कभी अकारण नहीं बदले जाने चाहिए इनके पीछे भी वैज्ञानिक सोच का होना जरूरी होता है। यह विज्ञान उस क्षेत्र की अपनी संस्कृति और अस्मिता का होता है। इस मामले में अगर हम इलाहाबाद और फैजाबाद को लें तो हमें इन स्थानों की अस्मिता में भारतीयता की गहरी सांस्कृतिक पहचान का पता चलेगा जिनका सारगर्भित चरित्र हिन्दू संस्कृति में दर्शाया जाता है। इसी प्रकार केरला राज्य को अगर वहां की वामपंथी सरकार केरलम् कहलाना पसन्द करती है तो निश्चित रूप से वह भारत के उस सांस्कृतिक तत्व की महत्ता को स्वीकार करती है जिसके साथ इस क्षेत्र के लोगों का गहरा जुड़ाव स्वाभाविक तौर पर रहता है। इसी प्रकार जब 2001 में कलकत्ता का नाम बदल कर कोलकाता किया गया था तो वहां भी वामपंथी सरकार थी। इससे यही सिद्ध होता है कि अन्ततः वामपंथी सोच के नायकों को भी भारत की मूल सांस्कृतिक चेतना के आगे नतमस्तक होना पड़ रहा है लेकिन इसका सबसे बड़ा उदाहरण अगर कोई है तो वह 1947 में भारतीय भू भाग के दो भाग होने का है जिसमें एक हिस्से को पाकिस्तान कहा गया और दूसरे को भारत जबकि इससे पहले हिन्दोस्तान शब्द प्रचलित था। भारत इस देश की एेतिहासिक सांस्कृतिक पहचान को ही दर्शाता था जिसका उल्लेख विभिन्न पुरातन शास्त्रों व साहित्य में मिलता है।

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