सिख संस्थानों से सेवा करने वालों का मोह भंग

Summary :

सिखों को गुरु साहिबान से मिली प्रेरणा के चलते सिख समाज सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहता है और अक्सर देखा जाता है कि किसी भी सिख के पास कोई संस्थान या व्यक्ति सेवा के लिए गया तो वह अपनी सामर्थ्यता अनुसार सेवा में भरपूर योगदान देता है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि ज्यादातर सिख समाज गुरु जी की शिक्षा के मुताबिक अपनी कमाई में से दसवंद निकालता है जिसका इस्तेमाल जरुरतमंदों पर खर्च किया जाता है, मगर आजकल सिख संस्थानों में बढ़ते भ्रष्टाचार या फिर उनके दिए हुए दसवंद को जब वह देखते हैं कि उसका इस्तेमाल सही ढ़ंग…

सिखों को गुरु साहिबान से मिली प्रेरणा के चलते सिख समाज सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहता है और अक्सर देखा जाता है कि किसी भी सिख के पास कोई संस्थान या व्यक्ति सेवा के लिए गया तो वह अपनी सामर्थ्यता अनुसार सेवा में भरपूर योगदान देता है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि ज्यादातर सिख समाज गुरु जी की शिक्षा के मुताबिक अपनी कमाई में से दसवंद निकालता है जिसका इस्तेमाल जरुरतमंदों पर खर्च किया जाता है, मगर आजकल सिख संस्थानों में बढ़ते भ्रष्टाचार या फिर उनके दिए हुए दसवंद को जब वह देखते हैं कि उसका इस्तेमाल सही ढ़ंग से खर्च नहीं हो रहा तो उनका सेवा से विश्वास उठना स्वभाविक है। दिल्ली के प्रसिद्ध समाजसेवी एम.एम. पाल सिंह गोल्डी के साथ भी ऐसा ही एक वाक्य हुआ जिसके बाद से उन्हांेने सिख संस्थानों को सेवा देना बंद कर दिया। असल में उन्हांेने करीब 10 वर्ष पूर्व दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी को कैंसर की रोकथाम हेतु 50 लाख की लागत वाली मशीन भेंट की थी, मगर कई सालों तक उसे इस्तेमाल में ही नहीं लाया गया और धूल मिट्टी से वह खराब हो गई। एम.एम. पाल सिंह गोल्डी ऐसे अकेले व्यक्ति नहीं होंगे इनके जैसे अनेक धनाड़ सिखों के साथ इस तरह के मामले अक्सर होते रहते हैं। जालंधर के एक सिख जो अब इस संसार में नहीं है। उन्होंने 2 करोड़ के करीब का सामान एक तख्त पर भेंट किया बदले में वहां के जत्थेदार के द्वारा उन पर कानूनी केस कर दिया। इसलिए सिख संस्थानों को अपनी सोच में बदलाव लाना चाहिए और अगर कोई शख्स सेवा भावना के साथ कुछ भंेट करता है तो उसे सही इस्तेमाल में लाना चाहिए। ऐसा भी नहीं है कि सभी संस्थानों में इस तरह की घटनाएं होती हैं मगर एक-आध घटना ही विश्वास तोड़ देती है। एम.एम. पाल सिंह गोल्डी मानते हैं कि मौजूदा समय में कैंसर एक गंभीर बीमारी है और बहुत से जरुरतमंद सिख परिवार इससे जूझ रहे हैं मगर इलाज इतना महंगा रहता है जो बिना मदद के संभव नहीं है। इसलिए जब उन्हें पता चला कि सरदार इकबाल सिंह लालपुरा के सुपुत्र अजयवीर सिंह लालपुरा के प्रयासांे से पंजाब के रोपड़ में कैंसर का अस्पताल खुला है जहां जरुरतमंदों का इलाज हो सकेगा तो वह इसमें अपना योगदान देने से स्वयं को रोक नहीं पाए।
मातृभाषा से दूर होता पंजाबी समाज : जब संसार में किसी बच्चे का जन्म होता है, तो वह सबसे पहले अपनी मां से जो भाषा सीखता है, वही उसकी मातृभाषा कहलाती है। किंतु पिछले कुछ वर्षों से पंजाब के लोग धीरे-धीरे अपनी मातृभाषा से दूर होते जा रहे हैं। अधिकांश लोग दैनिक बातचीत में राष्ट्रभाषा हिंदी का प्रयोग करने लगे हैं। पहले यह प्रवृत्ति मुख्यतः पंजाब से बाहर देखने को मिलती थी, लेकिन अब पंजाब के भीतर भी अधिकतर लोग अन्य भाषाओं को अपनी प्राथमिक संवाद भाषा बना रहे हैं। कई ऐसी संस्थाएं जिन्होंने पंजाबी भाषा के प्रचार के लिए संस्थाएं बना रखी हैं, मगर वह खुद पंजाबी से किनारा करते दिखते हैं। यदि इस स्थिति का विश्लेषण किया जाए तो इसका बड़ा कारण हमारे नेता भी हैं, जिन्होंने अपनी राजनीतिक शक्ति के लिए पंजाब के लोगों को धर्म के आधार पर बांटा और गैर-सिख समुदाय को हिंदी को अपनी मातृभाषा के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित किया। आज इसके परिणाम स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। पड़ोसी देश के पंजाब, जिसे लहंदा पंजाब कहा जाता है, में अपेक्षाकृत बेहतर पंजाबी बोली जाती है, जहां लोगों ने अपनी विरासत और भाषा को संजोकर रखा है। हमारे यहां चाहे कोई भी राजनीतिक दल सत्ता में आया हो, सभी सरकारों ने पंजाबी भाषा के साथ उपेक्षापूर्ण व्यवहार ही किया है। मातृभाषा किसी भी व्यक्ति की पहचान, संस्कृति और भावनाओं की नींव होती है। जब कोई भाषा समाप्त होती है, तो उसके साथ एक पूरी संस्कृति और ज्ञान की विरासत भी समाप्त हो जाती है।
पाकिस्तानी मौलवियों के मन में सिख गुरुओं और सिखों के प्रति जहर : समय-समय पर पाकिस्तान में विभिन्न मुस्लिम धार्मिक कार्यक्रमों की कई ऐसी वीडियो सामने आ रही हैं जिनमें सिख समुदाय और विशेष रूप से गुरु साहिबानों के बारे में कई आपत्तिजनक टिप्पणियां की जाती हैं। इसी क्रम में एक पाकिस्तानी मौलवी की ताज़ा वीडियो सार्वजनिक हुई है, जिसमें वह दावा कर रहा है कि गुरु नानक देव जी ने इस्लाम कबूल कर लिया था और मुसलमानों ने उन्हें बगदाद में दफनाकर वहां उनकी कब्र बनाई। उसने कहा कि सिखों में इतनी भी हिम्मत नहीं थी कि वह अपने नबी (गुरु) का जनाज़ा मुसलमानों से ले सकते। उसने अपने अनुयायियों के सामने यह भी दावा किया कि गुरु नानक देव जी के मुसलमान बनने के बाद गुरु गोबिंद सिंह जी और महाराजा रणजीत सिंह डर गए कि इससे सिख धर्म खतरे में पड़ जाएगा। इस कारण उन्होंने गलत और मनगढ़ंत इतिहास लिखवा दिया। इसके अलावा अन्य वीडियो में पाकिस्तान के जामिया तुर रशीद सेमिनरी कराची के प्रमुख मुफ्ती तारिक मसूद देवबंदी और कथित सूफी संत मौलाना डॉ. प्रोफेसर मुहम्मद सुलेमान उर्फ हाफिज पीर मुहम्मद सुलेमान मिसबाही अलखादमी सिखों और गुरु साहिबानों के खिलाफ प्रचार करते रहे हैं। सिखों के प्रति ज़हर उगलती यह वीडियो उक्त मौलवियों के अनुयायियों द्वारा हजारों और लाखों की संख्या में सोशल मीडिया पर साझा की जा रही हैं। सिख ब्रदसहुड इन्टरनैशनल संस्था के मुखी गुणजीत सिह बख्शी ने भारत की सरकार से मांग की है कि इस मसले को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाते हुए ऐसे लोगों के खिलाफ कार्यवाई की जानी चाहिए, वहीं पाकिस्तानी सिख समुदाय में सेे भी कुछ लोग आगे आए हैं जिन्होंने अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर उक्त वीडियो और संबंधित जानकारी साझा करते हुए पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी, शिरोमणि कमेटी और श्री अकाल तख्त साहिब से मांग की है कि इस मामले को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाया जाए और सिख समुदाय, सिख ककारों तथा गुरु साहिबानों के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणियां करने वाले पाकिस्तानी मौलवियों के खिलाफ कानून के तहत मामला दर्ज कर उन्हें मौत की सज़ा दी जाए।

Team Desk