‘पली है ये पतझड़ की अंधेरी कोठरी में,
मित्रता स्वयं ही न करती बहार से।
झुकना न जानती है, टूटना ही जानती है,
मेरी ये कलम नहीं कम है कटार से।’
मेरे पड़दादा पंजाब केसरी समाचार पत्र के संस्थापक और सम्पादक अमर शहीद लाला जगत नारायण जी का आज शहादत दिवस है। अपने पूर्वजों को स्मरण करना परिवार का दायित्व तो है ही साथ ही देश की एकता और अखंडता के लिए अपनी जान न्यौछावर करने वाले शहीदों के दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प लेना समाज और राष्ट्र का भी दायित्व है। 80 के दशक में जब पंजाब आतंकवाद का काला दौर झेल रहा था तब मेरे पड़दादा की 9 सितम्बर, 1981 को राष्ट्र विरोधी ताकतों ने अंधाधुंध गोलियां चलाकर हत्या कर दी थी। मेरे पड़दादा की शहादत का अनुसरण करते हुए मेरे दादा परमपूजनीय रमेश चन्द्र जी ने भी अपनी शहादत दी। मेरे पिता और पंजाब केसरी के मुख्य सम्पादक रहे श्री अश्विनी कुमार ने जीवनभर उनका अनुसरण करते हुए अपनी कलम को निर्भीक एवं ईमानदारी से चलाया। मैं आज स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता हूं कि मैं उस परिवार का अंश मात्र हूं जिसने राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुती दी।
मुझे इस बात का रंज भी है कि मैं और मेरे अनुज आकाश और अर्जुन चोपड़ा पड़दादा और दादा के स्नेह से वंचित रहे।
पूजनीय लाला जी के बारे में जितना मैंने अपने पिता श्री अश्विनी कुमार जी से जाना और उनके लिखे सम्पादकीयों का अध्ययन किया। उससे यही पाया कि लाला जगत नारायण एक शहीद थे एक हुतात्मा जिन्होंने धर्म और सत्य के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। वे सच्चे आर्य समाजी थे, वेदों और महर्षि दयानंद सरस्वती के मार्ग का अनुसरण करते थे। वे अहिंसा में विश्वास रखते थे और उन्होंने कभी भी अपने किसी भी विरोधी के विरुद्ध कोई हथियार नहीं उठाया। उनका मानना था कि कलम तलवार से अधिक शक्तिशाली है, इसलिए वे सभी धर्मों (हिंदू धर्म सहित) में व्याप्त कुप्रथाओं और वेद-विरोधी विकृतियों की आलोचना करते थे, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट करते थे कि उन्हीं धर्मों में अनेक सत्य भी समाहित हैं जो वेदों के अनुरूप हैं, इसलिए उन सत्यों को सभी को सहन करना चाहिए और उनकी सराहना करनी चाहिए। 1924 से लेकर जीवनपर्यन्त पत्रकार जगत नारायण ने जो भी लिखा, जब भी लिखा, किसी उद्देश्य के लिए तथा अपने इस सिद्धांत पर वह आयुपर्यंत चलते रहे। संघर्ष का पथ था यह संकटों भरा, चुनौतियों भरा तथा लाला जी इसी संघर्ष पथ के पथिक थे। ‘‘लाला जी उस दौर की पैदावार थे, जब राजनीति सत्ता तक नहीं, बल्कि अक्सर जेल के दरवाजे तक ले जाया करती थी और जमानतें जब्त हुआ करती थीं… और पत्रकारिता जब ‘खबर फरोशी’ नहीं ‘सरफरोशी’ हुआ करती थी। यह उस दौर की लेखनी है, जब कलम के सिपाही तलवार की धार पर चला करते थे और ऐसी कलम जुल्म तथा अन्याय के खिलाफ टकराना ही जानती है। यह ता-था-थैया की ताल पर नृत्य नहीं करती।’
विभाजन के समय जब दंगों में लाखों लोग मारे गए। महिलाओं को अपनी इज्जत बचाने के लिए अपनी जान देनी पड़ी। पाकिस्तान से आए हजारों-लाखों लोगों-शरणार्थियों की दशा बड़ी दयनीय थी। जीवन की मूलभूत जरूरतों से वे वंचित थे। सरकारी अधिकारियों का रवैया इनके प्रति सहानुभूतिपूर्ण होने की बजाय उपेक्षापूर्ण था। सुहृदयी लाला जी भला इसे कैसे सहन कर सकते थे। उन्होंने शरणार्थियों की दुर्दशा पर लेख-लिख कर प्रशासन व सरकार का ध्यान आकृष्ट किया। लाला जी ने समझ लिया था कि सिद्धांतों व आदर्शों की लड़ाई उन्हें अकेले ही लड़नी है। उन्होंने दुनिया को यह दिखाना था :
‘‘फूंकों से यह चिराग बुझाया न जाएगा।’’
पंजाब सरकार के मंत्री रहते उन्होंने परिवहन और स्कूली पुस्तकों का राष्ट्रीयकरण किया। पंजाब के तत्कालीन सत्ताधारियों ने जगत नारायण को उनके कर्त्तव्य पथ से विमुख करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने जितनी बाधाएं खड़ी करनी चाहीं, लाला जी की लौह लेखनी उतनी ही मजबूत होती चली गई। दूरदर्शी लाला जगत नारायण ने तब पंजाब में एक हिंदी समाचार पत्र पंजाब केसरी की आवश्यकता को अनुभव किया। लाला लाजपत राय उनकी श्रद्धा के केंद्र-बिंदु रहे थे। ‘‘उनका जीवन संघर्षमय जिंदगी का स्वर्णिम इतिहास है। पूरी जिंदगी उन्होंने कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। चाहे कितनी भी बड़ी विपत्ति आई, लाला जी ने उसका सामना किया। संघर्ष किया परंतु कभी झुके नहीं।’’ उन्होंने अपनी कलम से आतंकवाद का डटकर विरोध किया, तभी वह आतंकी तत्वों की गोलियों का निशाना बने। मेरी मां श्रीमती किरण चोपड़ा पूर्वजों और परिवार से संस्कार पाकर कई वर्षों से वरिष्ठ नागरिकों की सेवा में जुटी हुई हैं। हमारा पूरा परिवार आदर्शों का पालन कर रहा है। मैं आज भी सोचता हूं कि क्या इस युग में ऐसे लोग कहां मिलेंगे, ऐसे लोगों को कहां तलाश करूं जो जीवन में साहसिक और सैद्धांतिक फैसले लेते थे। परिस्थितियां कैसी भी हों मेरी कलम चलती रहे, यही प्रार्थना है। हम सब लाला जी को श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।


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