लालाजी की याद में…

Summary :

श्रद्धेय लाला जगत नारायण जी का हर 9 सितंबर को शहीदी दिवस मनाया जाता है। आज उनकी याद में मेगा हैल्थ कैंप और हमारे क्लब के जरूरतमंद सदस्यों को आर्थिक सहायता और जरूरत का सामान दिया जायेगा। लाला जी अपने देश के लिए, समाज के लिए, अपने परिवार के लिए अमर मिसाल हैं। वैसे तो हर घर में अपने बुजुर्गों को आदर-सम्मान के साथ उनकी बरसी पर याद किया जाता है, हवन और दान-पुण्य किए जाते हैं, परंतु लाला जी को आज भी हम उनके अच्छे व्यवहार, उनके समाज के लिए किए गए कार्यों के लिए याद करते हैं। लाला…

श्रद्धेय लाला जगत नारायण जी का हर 9 सितंबर को शहीदी दिवस मनाया जाता है। आज उनकी याद में मेगा हैल्थ कैंप और हमारे क्लब के जरूरतमंद सदस्यों को आर्थिक सहायता और जरूरत का सामान दिया जायेगा। लाला जी अपने देश के लिए, समाज के लिए, अपने परिवार के लिए अमर मिसाल हैं। वैसे तो हर घर में अपने बुजुर्गों को आदर-सम्मान के साथ उनकी बरसी पर याद किया जाता है, हवन और दान-पुण्य किए जाते हैं, परंतु लाला जी को आज भी हम उनके अच्छे व्यवहार, उनके समाज के लिए किए गए कार्यों के लिए याद करते हैं। लाला जी निर्भीक, निडर शख्सियत थे। उन्होंने जिंदगी के सोलह साल अपने देश की आजादी के लिए जेल में काटे। अपने मां-बाप की इकलौती संतान थे। उस मां को प्रणाम, जिसने देश के लिए, समाज के लिए एक शेर पैदा किया। आज हमारा वरिष्ठ नागरिक केसरी क्लब लाला जी एवं अमर शहीद रमेश चंद्र जी को एक सच्ची श्रद्धांजलि है।
लाला जी के साथ मुझे जिंदगी में सिर्फ तीन साल मिले, परंतु उन तीन सालों ने मेरे मन-मस्तिष्क पर तीन हजार सालों के बराबर अमिट छाप छोड़ी है, जो कभी भी भुलाई नहीं जा सकती। मैं लाला जी की एकमात्र पौत्र वधू थी, जिसको उनका आशीर्वाद प्राप्त हुआ। कहते हैं, मूल से ब्याज बहुत प्यारा होता है, यानी मैं लाला जी के सबसे बड़े और चहेते पौत्र अश्विनी जी की पत्नी थी। लाला जी के और भी तीन पौत्र हैं, जिन्हें वह बहुत प्यार करते थे, पर वे उस समय छोटे थे और उनकी शादियां नहीं हुई थीं। लाला जी दहेज प्रथा के बिल्कुल खिलाफ थे, हमारे घर में जितनी भी शादियां हुई, दहेज के बगैर हुई। चाहे उनके पौत्रों की थीं या दोत्रों की, चाहे बेटों की पोती हो या बेटियों की, बेटों की। मेरी शादी में भी लाला जी और रमेश जी की सख्त हिदायत थी कि लड़की सिर्फ तीन कपड़ों में आएगी। मेरी उम्र शादी के समय सिर्फ अट्ठारह साल थी, जैसे कि शादी का हर लड़की को शौक़ होता है। मैंने किसी पिक्चर में देखकर सुंदर-सी ड्रेस और मैचिंग ज्वैलरी बनवाई, पर लाला जी की तरफ से सख्त हिदायत थी कि सादी साड़ी होनी चाहिए और एक सैट, जो मैंने शादी के समय पहना हुआ था, वह भी लाला जी ने हमारे फेरों से पहले मेरी सास से कहकर उतरवा दिया। मैंने अपने कालेज में उस समय कसम खाई थी कि दहेज लेने वाले के साथ शादी नहीं करूंगी, पर तब भी उस समय उनकी भावनाओं को इस कद्र नहीं समझ पाई थी, जितना आज समझकर श्रद्धा भाव से भर जाती हूं कि वह जो कहते थे, करके दिखाते भी थे। उनकी बातें भाषण तक सीमित नहीं थीं, वह बड़े व्यावहारिक थे।

शादी के समय मैं पढ़ ही रही थी। घर में बहुत लोग थे और सब लाला जी की सेवा करते थे, परंतु क्योंकि मैं उनकी पौत्र वधू थी, यह उनका मेरे प्रति लाड था, प्यार था कि वह सुबह की पहली चाय और शाम पांच बजे चाय-पकौड़े मेरे हाथ से लेना पसंद करते थे। उनका कमरा घर के प्रवेश-द्वार के पास था। घर में कोई भी आता-जाता, उस पर उनकी नजर रहती थी और वह बहुत सावधान थे। उनकी हिदायत थी कि रात को साढ़े दस बजे से पहले सब घर में होना चाहिए।
एक बार मैं और अश्विनी जी नौ से बारह रात को पिक्चर देखने चले गए। जब बारह बजे वापस आए, तो सोचा, लाला जी सो चुके होंगे, उनको क्या पता चलेगा। हम दोनों ने अपने सैण्डल-शूज उतारे और दबे पांव उनके कमरे के आगे से सांस रोककर निकल रहे थे कि एकदम रौबीली आवाज कानों में पड़ी, ‘मिन्ना’ वह, अश्विनी को प्यार से यही बुलाते थे, ‘आ गया वोटी नूं लैके, ऐनी रात नूं,’ हमारे दोनों के पसीने छूट गए, फिर उन्होंने उसी रौब से कहा, ‘ठीक है। अगे तो ऐनी लेट वोटी नूं लैके नहीं जाना और किरण सवेरे मैनूं चाय टाइम नाल दे दई।’ देखा, कितने सावधान थे! न कहते हुए भी सब कुछ हमें समझा दिया। यही नहीं शादी मेरी दादी सास श्रीमती शांति देवी जी ने तय की थी, पर शादी के कुछ महीने पहले उनकी मृत्यु हो गई, परंतु लाला जी ने उनकी तय की गई तारीख पर हमारी शादी करवाई और जैसे ही मैंने घर में प्रवेश किया, लाला जी और रमेश जी व मेरी सास मुझे उनकी फोटो के पास ले गए। मुझे उनकी चीजें जैसे कानों की बालियां, एक चेन, साड़ी और स्लीपर सौंप दिए। साथ में लाला जी ने कहा, ‘उनकी बड़ी इच्छा थी, तुम्हें इस घर में देखने की। तुम्हारी फोटो हमेशा अपने साथ रामायण में रखे रहती थीं।
आज भी जब वरिष्ठï नागरिक क्लब की मीटिंग करते 3ोग हमसे मिलने आते हैं। लाला जी, रमेश जी, और अश्विनी जी के कार्यों को याद करके उनकी मिसाल देते हैं, तो हमारा सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है। यही कारण है कि जब मेरे बड़े बेटे ने अखबार में लिखाना शुरू किया, तो उसके नाम के साथ लाला जी को याद करते हुए हमने ‘नारायण’ जोड़ दिया, ताकि लाला जी की आने वाली पीढिय़ों के साथ उनका नाम चलता रहे और बच्चों को याद रहे कि वह किस आदर्श शख्सियत के वंश से हैं। सचमुच लाला जी एक आदर्श, एक देशभक्त थे, जिन्होंने सच्चाई पर चलते हुए देश की एकता के लिए अपनी जान दे दी। उन्हीं को सच्ची श्रद्घांजलि के रूप में हमने बुजुर्गों की व्यापक जरूरतों को समझते हुए ‘पंजाब केसरी’ की ओर से ‘वरिष्ठï नागरिक केसरी क्लब’ का गठन किया है।
आओ, हम सब मिलकर उनके बताए मार्ग पर चलने का प्रयास करें।

Kiran Chopra